खबर लहरिया Hindi Patna News: इस्लामगंज गांव में 500 घरों में नाव, जीविका का एकमात्र साधन लकड़ी की नाव 

Patna News: इस्लामगंज गांव में 500 घरों में नाव, जीविका का एकमात्र साधन लकड़ी की नाव 

पटना के इस्लामगंज गांव में नाव सिर्फ नदी पार करने का साधन नहीं है। यहां नाव रोजी-रोटी है, पहचान है और मुसीबत के समय उम्मीद भी। पांच पीढ़ियों से नाव के सहारे जिंदगी गुजार रहे इस गांव के लोगों के लिए लकड़ी की यह नाव किसी बेशकीमती चीज से कम नहीं।

किनारे लगी नाव (फोटो साभार: सुमन)

 रिपोर्ट – सुमन, लेखन – सुचित्रा 

यह उस गांव की कहानी है जहां सड़क खत्म होने के बाद नाव रास्ता बन जाती है। बरसात में जब घरों के आसपास पानी भर जाता है, जब सड़कें डूब जाती हैं और शहर से संपर्क टूट जाता है, तब यही नाव लोगों को जरूरी सामान लाने, इलाज के लिए जाने और दूसरे गांवों तक पहुंचने में मदद करती है।

लकड़ी की नाव, जीवन का आधार 

पटना जिले के मनेर ब्लॉक के इस्लामगंज गांव में प्रवेश करते ही एक अलग ही तस्वीर दिखाई देती है। गांव के लगभग हर घर के दरवाजे पर एक नाव खड़ी नजर आती है। कहीं नाव को मरम्मत किया जा रहा है, तो कहीं उसकी पुताई चल रही है। पहली नजर में यह दृश्य किसी नदी किनारे बसे सामान्य गांव जैसा लग सकता है, लेकिन यहां नाव केवल आने-जाने का साधन नहीं, बल्कि पूरे गांव की जिंदगी का आधार है। नाव लकड़ी की होती है और आमतौर पर हाथ से चलाई जाती है। कुछ नावों में मोटर भी लगाई जाती है।

गांव में रहने वाले साहनी समुदाय के परिवार पीढ़ियों से नाव चलाने, मछली पकड़ने और उसे बाजार में बेचकर अपना घर चलाते आए हैं। महिलाएं बताती हैं कि जब चारों तरफ पानी ही पानी होता है, तब नाव पर सामान रखकर ही कई जरूरी काम किए जाते हैं। उनके लिए नाव कोई साधारण साधन नहीं है। यह संकट के समय उनका भरोसा है।

 

नाव बनी रोजगार का सहारा 

ग्रामीण बताते हैं कि उनके लिए नाव लकड़ी का टुकड़ा नहीं, बल्कि रोजगार, परिवार और भविष्य का सहारा है। इसलामगंज से हल्दी छपरा और हाथी टोला तक नाव चलती है। आसपास के गांवों की दूरी आमतौर पर करीब एक से डेढ़ किलोमीटर तक होती है। हालांकि, जरूरतमंद लोगों से कई बार पैसे नहीं लिए जाते और सामान को भी मुफ्त में ले जाया जाता है।

हर घर के दरवाजे पर नाव, यही गांव की पहचान

ग्रामीणों के मुताबिक, गांव में करीब 500 घर हैं और लगभग हर घर में नाव है। यहां के लोगों का कहना है कि नाव उनके लिए किसी पूजा की वस्तु से कम नहीं है, क्योंकि उनके जीवन का बड़ा हिस्सा इसी से जुड़ा हुआ है।

बाढ़ के समय में आवगमन के लिए नाव 

बिहार में इस समय कुछ दिनों से लगातार बारिश हो रही है। इसलामगंज गांव की सबसे बड़ी समस्या है हर साल आने वाली बाढ़ और जलभराव। बरसात के दिनों में चारों तरफ पानी फैल जाता है। 

गांव के युवा पिंटू कुमार बताते हैं कि प्रशासन की ओर से गांव से 5 से 6 नावें मंगाई जाती हैं, जिन्हें अलग-अलग इलाकों में लोगों की मदद के लिए भेजा जाता है। इसके बदले नाविकों को दूरी और क्षेत्र के हिसाब से किराया दिया जाता है। प्रशासन की ओर से प्रति व्यक्ति करीब 10 रुपये तक किराया मिलता है, जबकि स्थानीय स्तर पर गांव से आने-जाने वाले लोगों से प्रति व्यक्ति 5 रुपये लिए जाते हैं। हालांकि, सामान ले जाने का कोई अतिरिक्त पैसा नहीं लिया जाता।

फिलहाल पानी भरने के कारण इसलामगंज का सड़क संपर्क भी प्रभावित है। ऐसे में नाव ही लोगों के आने-जाने का मुख्य साधन बनी हुई है। यहां से मुख्य रूप से इसलामगंज से हल्दी छपरा और इसलामगंज से हाथी टोला तक नावें चलती हैं।

नाविक के लिए बरसात का समय सबसे भारी 

ग्रामीणों के लिए बरसात का मौसम एक बड़ी विडंबना भी लेकर आता है। एक तरफ इसी समय नाव की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, लेकिन दूसरी तरफ तेज बहाव और ज्यादा पानी के कारण मछली पकड़ना जोखिम भरा हो जाता है।करीब तीन से चार महीने तक नदी में मछली पकड़ने का काम बंद रहता है। इन महीनों में वे घर पर रहकर नाव की मरम्मत करते हैं। यानी जिस नाव से वे करीब आठ महीने तक अपना परिवार चलाते हैं, उन्हीं चार महीनों में उसी नाव को अगले मौसम के लिए तैयार करते हैं।

लकड़ी की नाव की मरम्मत करने का तरीका 

बरसात का मौसम यहां के नाविकों के लिए केवल चुनौती लेकर नहीं आता, बल्कि नाव की मरम्मत का समय भी होता है। नदी किनारे बुजुर्ग सुरेंद्र साहनी और उपेंद्र साहनी जैसे लोग नावों की मरम्मत में जुटे नजर आते हैं। उनके लिए यह कोई सामान्य काम नहीं, बल्कि वर्षों पुरानी परंपरा है।

नाव की मरमम्त करते उपेंद्र साहनी (फोटो साभार: सुमन)

उपेंद्र साहनी बताते हैं कि नाव को पहले नदी में ले जाकर पानी में भिगोया जाता है। इसके बाद उसे बाहर निकालकर कपड़े से अच्छी तरह साफ किया जाता है और धूप में सुखाया जाता है। फिर नाव को ध्यान से देखा जाता है कि कहीं लकड़ी टूट तो नहीं गई, कहीं लोहे का हिस्सा खराब तो नहीं हुआ। जहां जरूरत होती है, वहां लकड़ी और लोहे की मरम्मत की जाती है। इसके बाद नाव की पुताई होती है।

लकड़ी की नाव की पुताई कैसे करें 

नाव को लंबे समय तक पानी से बचाने के लिए ग्रामीण एक खास मिश्रण का इस्तेमाल करते हैं। एक मटकी में अलकतरा लिया जाता है और उसमें गाड़ी से निकला खराब तेल मिलाया जाता है। तैयार मिश्रण को सूती कपड़े की मदद से नाव के कोने-कोने पर लगाया जाता है। इससे नाव चमकने लगती है और उसकी लकड़ी को पानी के कारण जल्दी सड़ने से बचाने में मदद मिलती है। नाव के आगे और पीछे समेत पूरी सतह पर इसकी पुताई की जाती है।यह काम हर साल बरसात के दौरान किया जाता है।

पूजा के बाद फिर नदी की ओर लौटती हैं नावें

मरम्मत और पुताई के बाद नावों की पूजा की जाती है। ग्रामीण बताते हैं कि रक्षाबंधन के बाद सभी नावों को एक जगह इकट्ठा किया जाता है। कथा और पूजा होती है और इसके बाद नावों को सुरक्षित रखा जाता है। जब पानी कम होने लगता है और नदी का बहाव सामान्य होता है, तब यही नावें फिर गंगा की ओर निकल पड़ती हैं। वहां नाविक मछली पकड़ते हैं। फिर मछलियों को बाजार में बेचते हैं और उससे होने वाली कमाई से परिवार का खर्च चलता है। उपेंद्र साहनी कहते हैं कि यही नाव उनकी रोजी-रोटी है और यही उनके जीवन का सहारा भी।

युवाओं ने भी थामी पुरखों की नाव

पिंटू साहनी और कुंदन साहनी जैसे युवा भी अपने बुजुर्गों की इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। यहां नाव चलाना केवल एक काम नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही विरासत है।

ग्रामीण बताते हैं कि गांव के पुरुष नाव चलाना जानते हैं। हालांकि, महिलाओं ने नाव चलाना नहीं सीखा है। पुरुषों का कहना है कि उन्होंने बचपन से अपने परिवार के लोगों को नाव चलाते देखा और उसी के साथ यह हुनर भी सीख लिया।

नाव चलाने का काम दिखाता है कि आज भी गांव की बड़ी आबादी की रोजी-रोटी नदी पर निर्भर है और बरसात के दौरान गांव का सड़क संपर्क टूट जाना उनकी मजबूरी को और बढ़ा देता है। शायद इसलिए इसलामगंज में हर घर के दरवाजे पर खड़ी नाव को देखकर सिर्फ एक नाव नजर नहीं आती। 

 

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