मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के ईशा नगर ब्लॉक के पठारा गांव की 20 साल की लड़की छत से गिर गई। जिसका नाम पुष्पा यादव है। ये घटना 20 अगस्त 2026 को हुई थी। अब परिवार वालों का आरोप है कि ज़िला अस्पताल के डॉक्टर (राकेश कुमार मिश्रा) ने लड़की का सही तरीके से इलाज नहीं किया। परिवार के मुताबिक पैर में लगे संक्रमण के बावजूद इलाज में देरी की गई। आख़िरकार 28 अगस्त 2026 को भोपाल में पुष्पा का पैरा काटना पड़ा। डॉक्टर ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा है कि परिवार समय से इलाज के लिए वापस नहीं आया था।
रिपोर्ट – अलीमा, लेखन – रचना
20 अगस्त को छत गिरने के बाद अस्पताल पहुंची पुष्पा
खबर लहरिया के रिपोर्टिंग के दौरान लड़की के पिता बालमुकुंद ने बताया कि उनकी बेटी पुष्पा 20 अगस्त 2026 को छत से गिर गई थी। इसके बाद परिवार उसे इलाज के लिए ज़िला अस्पताल छतरपुर ले कर गए। वहां पदस्थ डॉक्टर राकेश कुमार मिश्रा ने पुष्पा के पैर में प्लास्टर बांधा। पुष्पा के पैर की हड्डी टूट गई थी। फिर डॉक्टर द्वारा सात दिन बाद आने के लिए कहा गया।
परिवार के मुताबिक प्लास्टर लगाने के अगले दिन से ही पुष्पा के पैर में काफी ज़्यादा दर्द और तकलीफ़ होने लगी। इसके बाद वे डॉक्टर के पास जाकर बेटी की तकलीफ़ बताते रहे लेकिन उन्हें पेन किलर दे कर सात दिन बाद आने को कहा गया। परिवार का कहना था कि उन्हें भरोसा था कि डॉक्टर सही इलाज कर रहे हैं और दवाई से लड़की का दर्द ठीक हो जाएगा।
बालमुकुंद का ये भी आरोप है कि डॉक्टर ने ज़िला अस्पताल में पदस्थ होने के बावजूद उनसे इलाज के लिए 10 हजार रुपए लिए थे, और प्लास्टर भी सही से नहीं बांधा था।
6 दिन बाद पैर की हालत बिगड़ने लगी
6 दिन बाद यानी 25 अगस्त को जब पुष्पा की हालत ज़्यादा बिगड़ गई तो परिवार उसे दोबारा डॉक्टर के पास ले कर गया। इस दौरान डॉक्टर ने प्लास्टर खोला और पैर की हालत देखी। परिवार का आरोप है कि डॉक्टर ने कहा कि अब वे कुछ नहीं कर सकते और लड़की को बाहर ले जाने को कहा।
इसके बाद परिवार पुष्पा को ग्वालियर लेकर गए। वहां डॉक्टर ने उन्हें भोपाल रेफर कर दिया। 28 अगस्त को भोपाल के डॉक्टर द्वारा बताया गया कि संक्रमण ज़्यादा बढ़ गया है। अगर पैर नहीं काटा गया तो आगे शरीर में भी फैल सकता है। इसके बाद इलाज के दौरान पुष्पा के पैर काटने पड़े।
परिवार के मुताबिक भोपाल में पुष्पा का इलाज आयुष्मान कार्ड के ज़रिए हुआ। हालाँकि छतरपुर से भोपाल जाने के लिए उन्होंने निजी गाड़ी की हुई थी और इसमें करीब डेढ़ लाख रुपए खर्च हुए। अभी पुष्पा को हर 15 दिन में इलाज के लिए जाना पड़ता है।
परिवार समय पर इलाज कराने नहीं आए – डॉक्टर
डॉक्टर राकेश कुमार मिश्रा से बात करने पर उन्होंने परिवार के आरोपों से इनकार किया है। उनके हिसाब से पुष्पा 20 अगस्त को शाम करीब चार बजे उनके पास आई थी। उन्होंने तुरंत उनके पैर में प्लास्टर लगाया था। उनको अस्पताल में भर्ती करवाने के लिए कहा गया था, लेकिन उसके माता-पिता और परिवार के अन्य लोग भर्ती कराने के लिए तैयार नहीं थे।
परिवार के सहूलियत को देखते हुए उन्हें घर जाने को कह दिया गया। कुछ दिक्कत होने में वापस भर्ती करा दें कहा गया।
डॉक्टर का कहना है कि वे पूरे सात दिन बाद अस्पताल आए थे और जब पुष्पा का पैरा खोला गया तो उसका पैरा कला पड़ चुका था। डॉक्टर द्वारा लड़की के मां से पूछा गया कि पुष्पा का पैर काला कैसे पड़ा तो उन्होंने कहा कि कुछ कीड़ा काटा हुआ है। पैर में काफी संक्रमण काफी बढ़ चुका था इसलिए उन्होंने परिवार को पुष्पा को बाहर रेफर करने को कहा था।
सीएमएचओ बोले – जांच के बाद होगी कार्यवाही
इस मामले में ज़िला अस्पताल के सीएमएचओ आर. पी. गुप्ता से बात की गई जहां उनका कहना था कि उन्हें पहले इस मामले की जानकारी नहीं थी। अब परिवार के ओर से जो आरोप लगाया गया है उसकी जानकरी मिली है। इस मामले की जांच की जा रही है। अगर डॉक्टर के खिलाफ लापरवाही साबित होती है तो कार्यवाही की जाएगी। उन्होंने बताया कि लड़की की ओर से सहायता राशि की भी मांग की जा रही है और उस पर भी जांच के बाद फैसला लिया जाएगा।
पुष्पा बोली – समय पर इलाज होता तो पैर नहीं कटता
पुष्पा यादव ने खबर लहरिया को बताया कि छत से गिरने के बाद पैर में गंभीर चोट आई थी। ज़िला अस्पताल में प्लास्टर लगाने के बाद ही पैर में बेतहाशा दर्द शुरू हुआ था। फिर उसी दौरान पैर की हालत बिगड़ने लगी। पुष्पा का आरोप है कि समय पर अगर सही इलाज होता तो उसके पैर अभी सही सलामत होते।
पुष्पा का कहना है कि 20 साल की ऊम्र में उन्हें अपनी ज़िंदगी नए तरीके से शुरू करनी पड़ेगी। “मेरी ज़िंदगी तो बर्बाद की हर दो डॉक्टर ने। न मैं चल सकती हूं और न ही कहीं जा सकती हूं। अब मैं मोहताज हो गई हूं। आज एक छोटी से लापरवाही के कारण उसकी ज़िंदगी बदल गई।
पुष्पा ने मांग किया है कि अगर जांच में डॉक्टर की लापरवाही सामने आती है तो उनके खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाए।
फ़िलहाल डॉक्टर और परिवार के आरोप अलग-अलग हैं। अगस्त से अक्टूबर का महीना शुरू हो गया है लेकिन अभी तक कोई तेज कार्यवाही नहीं हुई है।
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