खबर लहरिया Blog MP: गांव में नेटवर्क और संसाधनो की कमी के बाद भी लोग रहते हैं खुश

MP: गांव में नेटवर्क और संसाधनो की कमी के बाद भी लोग रहते हैं खुश

                                            

मध्य प्रदेश के पन्ना जिले और छतरपुर जिले में आज भी कई ऐसे गांव हैं जहां लोगों के हाथों में मोबाइल फ़ोन तो है लेकिन नेटवर्क का कोई भरोसा नहीं है। कभी नेटवर्क मिल जाता है तो कभी गायब हो जाता है। यहां लोगों को एक फ़ोन करने या ‘हेलो’ बोलने के लिए घर से बाहर निकलकर पहाड़ी, खेत या मेड़ या सड़क किनारे किसी उंची जगह तक जाना पड़ता है जहां कभी कभार मोबाइल में दो लाइन नेटवर्क दिखाई दे जाए। 

रिपोर्ट – गीता 

गांव (फोटो साभार: गीता)

शहरों में लोग थोड़ी देर इंटरनेट धीमा होने पर परेशान हो जाते हैं, लोग मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया में जैसे खो से गए हैं या फिर अब उसे जीवन का अहम हिस्सा मान लिया है जिसके बिना किसी भी तरह का काम नहीं किया जाता लेकिन इन गांवों के लोगों ने बिना नेटवर्क के ही अपनी ज़िंदगी जीना सिख लिया है। इन्होंने मोबाइल और इंटरनेट को अपने आम जीवन के अंदर आदत बन कर रहने नहीं दिया है। यहां रिश्ते सिर्फ मोबाइल और सोशल मीडिया पर नहीं चलते बल्कि लोग आमने सामने बैठ कर खुलकर बातें करते हैं, हंसते हैं और एक दूसरे का हाल पूछते हैं। 

शाम होते ही गांव के चौपालों में बुजुर्ग जुटने लगते हैं। बच्चे पेड़ों के नीचे धूल-मिट्टी में खेलते नजर आते हैं। महिलाएं आपस में आंगन में बैठ कर बात और हंसी ठिठोली करते नजर आती हैं। यहां सुविधाओं की कमी जरुर है गांव की ज़िंदगी में अपनेपन सादगी और सुकून की एक अलग ही मिठास देखने को मिलती है। 

फोटो साभार: गीता

सुबह की पहली किरण से ही लोगों के जिंदगी में घुलती है सौंधी खुशबू 

मै 4 सालों से अपनी सहेलियों के साथ इस‌ क्षेत्र में कवरेज के लिए आ रही हूं मैंने बहुत करीब से देखा और‌ महसूस किया है यहां पर सुबह सूरज की पहली किरण खेतों पर पड़ती है। जंगलों से  दुर-दुर तक पक्षियों की आवाज आती है और हवा में मिट्टी की सौंधी खुशबू घुली रहती है जिसका इन गांवों के लोग काम के साथ-साथ मजे से आनंद लेते हैं। यहां पर शहरों की तरह हर पल लोगों के फोन की घंटियां नहीं बजतीं। कोई लगातार फोन कि स्क्रीन में नहीं झांकता। लोग एक-दूसरे की आंखों में देखकर बात करते हैं।

नेटवर्क के लिए गर्मी और धूप भी मुस्कुराते हुए कटती है 

13 मई 2026 को जब हम‌ गये तो सुकवहा गांव में एक आदमी आसमान में तेज लाल सूरज कि तपती गर्मी और हाथ में फोन लिए सड़क पर नेटवर्क खोज रहा था। जैसे ही एक लाइन नेटवर्क कि आती उसके चेहरे पर मुस्कान फैल जाती है। उस एक मिनट की बातचीत की कीमत वह सबसे ज्यादा समझता था क्योंकि वह भी कहीं बाहर से आया था अपने रिश्तेदारी में और उसकी बात अपने घर पर नहीं हो पा रही थी। इसी बीच हम लोग भी नेटवर्क ना मिलने से परेशान थे और हम भी उसको बार-बार बोले जा रहे थे कि अपने फोन से वह हमारा एक नंबर लगा दे ताकि हम जिस से बात करने गए हैं उनसे हमारा संपर्क हो सके।

फोटो साभार: गीता                                              

इन गांवों में संसाधन कम हैं अस्पताल दूर हैं, सड़कें नहीं हैं, नेटवर्क कमजोर है लेकिन यहां लोगों के भीतर हौसला बहुत है। यहां पर समय शहरों कि तरह भागता नहीं बहता है। इन गांवों की रातों में सचमुच शांती होती हैं। न ट्रैफिक का शोर न लगातार बजते मोबाइल। सिर्फ झींगुरों की आवाज पेड़ों से गुजरती ठंडी हवा और चांदनी रात में आसमान से टिमटिमाते तारे ही नजर आते हैं।

चिड़ियों की आवाज़, दूर बहते पानी की सरसराहट और पेड़ों के बीच से आती हवा जैसे कह रही हो डरो

फोटो साभार: गीता                       

13 मई को हम लोग केन-बेतवा लिंक परियोजना पर चल रहे विरोध कि कवरेज के लिए ढोडन और पलकोंवा गांव की ओर बांदा से सुबह 5 बजे निकले थे। जैसे ही हम लोग छतरपुर जिले के सुकवहा घाटियों के बीच पहुंचे, हम चारो लोगों के मोबाइल का नेटवर्क मानो हमसे रूठ सा गया। गाड़ी में हम चार लोग थे और जंगल की उस खामोशी में सिर्फ हमारी सांसें और पहियों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। वन विभाग की चौकी में अपना परिचय देकर किसी तरह हम लोग पलकोंवा गांव के लिए जंगल के रास्ते भीतर घुसे लेकिन जंगल के भीतर घुसते ही ड्राइवर का हौसला टुटने लगा। 

फिर हमने ड्राइवर से बोला गाड़ी मोड़ो और चलो वहीं रोड पर जहां पर थोड़ा सा नेटवर्क आता है और एक व्यक्ति फोन पर धूप में बैठे बात कर रहा था।

जब हम वापस आ रहे थे तो एक महिला और पुरुष खेत में खड़े होकर हाथ में फोन को ऊंचाई से टांगे नेटवर्क आने का इंतजार कर रहे थे। ऐसी कई तस्वीरें देखी हैं हमने वहां पर जब लोग बात करने के लिए नेटवर्क का इंतजार करते हैं।

शायद यही इन गांवों की सबसे बड़ी खूबसूरती है।

शहरों में लोग मोबाइल, लैपटॉप और टीवी जैसे डिजिटल उपकरणों में पैसे खर्च करते हैं लेकिन इन गांवों में उस जिंदगी को जी रहे हैं जो प्रकृति के करीब है। यहां अकेलापन कम और अपनापन ज्यादा है।

कभी-कभी लगता है कि नेटवर्क अन्य संसाधनों की कमी ने इन गांवों से कुछ छीन लिया जिसके वह हकदार हैं। उन्हें भी वह सारी सुख सुविधाएं मिलनी चाहिए जो अन्य गांवों और शहरों के लोगों के मिलती है लेकिन फिर ऐसा भी लगता है कि उनके पास नेटवर्क और संसाधन भले ही काम है गांव में जंगल और नंदी पहाड़ियों के बीच छोटे-छोटे छप्पर वाले घरों में रहते हैं पर फिर भी वो गांव और वहां के लोग शहरों से खुबसूरत जगह पर है। भले ही उनको वे चमक- धमक नहीं मिल रही लेकिन बदले में उन्हें एक ऐसी शांति और सुकून मिला है जो अब बड़े शहरों में कहीं खो चुकी है। यहां जिंदगी धीमी है पर सच्ची है जहां मोबाइल का नेटवर्क कमजोर है लेकिन इंसानों के बीच का रिश्ता आज भी बहुत मजबूत है। इसीलिए यहां लोग कम साधनों में भी मुस्कुराना जानते हैं।

 

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