खबर लहरिया Blog लखनऊ : बुर्का पहने स्विगी डिलीवरी का बैग टांगे महिला की कहानी | Viral Pic

लखनऊ : बुर्का पहने स्विगी डिलीवरी का बैग टांगे महिला की कहानी | Viral Pic

स्विगी डिलीवरी का बैग टांगे हुई महिला का नाम रिज़वाना है। वह लखनऊ शहर से हैं व एक गरीब परिवार से आती हैं। लखनऊ के जगतनारायण रोड के जनता नगरी में उनका एक कमरे का घर है।

पीठ पर स्विगी डिलीवरी का बैग लटकाये हुए बुर्का पहनी महिला की फोटो इस समय सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रही है। जानकारी के अनुसार, बुर्का पहनी हुई वायरल हो रही महिला का नाम रिज़वाना है। रिज़वाना, लखनऊ शहर से है। वह एक गरीब परिवार से आती हैं। लखनऊ के जगतनारायण रोड के जनता नगरी में उनका एक कमरे का घर है।

रिज़वाना स्विगी डिलीवरी का बैग टांगे डिस्पोजेबल सामान लोगों तक पहुंचाती है।

रिज़वाना की कहानी से इस समय हर कोई प्रेरित हो रहा है तो कई लोगों ने इसे झूठा भी बताया। हालांकि, मीडिया को दिए इंटरव्यू के बाद चीज़ें साफ़ हो गयी।

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यह है रिज़वाना की कहानी

वैसे तो वह स्विगी के लिए काम नहीं करतीं। बता दें, स्विगी एक ऑनलाइन खाद्य वितरण चेन है। उन्होंने बस डिस्पोजेबल सामान वितरित करने के लिए ब्रांड के नाम से बैग खरीदा है। आगे बताया कि उनका बैग फट गया था जिसकी वजह से उन्होंने स्विगी बैग खरीदने का फैसला किया।

रिजवाना ने समाचार एजेंसी एएनआई को बताया, “मैं डिस्पोजेबल कटलरी बेचती हूं, डोर-टू-डोर और स्थानीय दुकानों पर जाती हूं। मैं सामान को एक बैग में ले जाती थी जो खराब हो गया था। फिर मैंने इस ‘स्विगी’ बैग को 50 रुपये में खरीदा।”

रिज़वाना पर है बच्चों की ज़िम्मेदारी

मीडिया को दिए इंटरव्यू में रिज़वाना ने बताया कि रिक्शा चलाने वाले उसके पति ने उसे तीन साल पहले छोड़ दिया था। वह चार बच्चों की माँ हैं। चार बच्चों में से उन्होंने अपनी सबसे बड़ी बेटी की शादी दो साल पहले की थी।

अब, रिजवाना के पास अपने और तीन अन्य बच्चों – बुशरा (19 वर्ष), नशरा (7 वर्ष) और बेटे मोहम्मद यासीन की ज़िम्मेदारी है।

एएनआई से बात करते हुए, रिजवाना ने कहा कि उनके लिए काम करना बहुत ज़रूरी था क्योंकि वह चाहती है कि उनके बच्चे पढ़े।

कमाई से नहीं होती ज़्यादा बचत

एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार रिज़वाना ने बताया, “मैंने हाल ही में अपनी छोटी बेटी को एक स्कूल में दाखिला दिलाया है, और अगले साल अपने बेटे को दाखिला दिलवाऊंगी। डिलीवरी के काम के साथ-साथ, मैं अधिक कमाई के लिए घरेलू सहायिका के रूप में भी काम करती हूँ। मैं लगभग 6-7 किलोमीटर पैदल चलती हूँ, लेकिन काम पर किसी भी दिन के अंत में मेरी कुल बचत लगभग 60-70 रुपये ही होती है।”

जीविका और उसके लिए मेहनत करना कभी आसान नहीं होता लेकिन अगर फैसला कर लिया जाए, जरिया ढूंढ़ लिया जाए तो रास्ते बनते रहते हैं। लखनऊ की रिज़वाना ने भी अपने लिए जीविका का जरिया बनाया और आज जब उनकी कहानी सामने आई तो दुनिया उनके फैसले, उनकी हिम्मत की तारीफ करती हुई भी नज़र आ रही है।

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