छतरपुर जिले में केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत बांध और नहरों का निर्माण किया जा रहा है जिसका वहां के ग्रामीण विरोध कर रहे हैं। इस आंदोलन की असली ताकत गाँव की महिलाएँ हैं। आसपास के लगभग बीस गाँवों की महिलाओं ने एकजुट होकर इस परियोजना का विरोध किया और लगातार धरना-प्रदर्शन कर इसे आगे बढ़ने से रोक रखा है।
देश के कई राज्यों से विस्थापन की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। कहीं बांध बन रहे हैं तो कहीं कोयला खदानें खोली जा रही हैं। छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों में लोग अपने घर और जमीन बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कहा जाता है कि उन्हें मुआवजा मिलेगा या दूसरी जगह बसाया जाएगा लेकिन हकीकत अक्सर इससे अलग होती है। कई बार ग्रामीण जमीन देने से इनकार करते हैं तो उनके सामने या तो बुलडोजर खड़ा कर दिया जाता है या फिर पुलिस बल का इस्तेमाल होता है। अब मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले से भी ऐसा ही मामला सामने आया है।
केन-बेतवा परियोजना से गांवों पर खतरा
छतरपुर जिले में केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत बांध और नहरों का निर्माण किया जा रहा है। इस परियोजना की वजह से कई गांव डूब क्षेत्र में आ रहे हैं। विजावर ब्लॉक के ढोड़न गांव समेत पलकोहा और खरियानी जैसे गांवों को विस्थापित किया जाना है। ये सभी गांव पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर एरिया के पास बसे हैं। प्रशासन का कहना है कि लोगों को मुआवजा दिया जाएगा लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें अब तक जमीन के बदले जमीन और स्थायी पुनर्वास की कोई साफ योजना नहीं बताई गई है।
मुआवजे को लेकर बढ़ा टकराव
ग्रामीणों का कहना है कि कुछ लोगों को मुआवजा मिला है लेकिन कई परिवार अब भी इंतजार कर रहे हैं। दैनिक भास्कर के अनुसार प्रशासन ने पहले नया गांव बसाने का भरोसा दिया था जहां स्कूल, पानी और बिजली जैसी सुविधाएं होंगी लेकिन अब प्रति परिवार 12 लाख रुपये देकर मामला खत्म करने की कोशिश की जा रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि मुआवजे का आकलन भी एक जैसा नहीं किया गया है। एक जैसे घरों की कीमत अलग-अलग लगाई गई है जिससे लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। प्रभावित परिवार प्रति व्यक्ति 25 लाख रुपये और बाजार भाव के अनुसार मुआवजे की मांग कर रहे हैं।
इस आंदोलन की असली ताकत गाँव की महिलाएँ हैं। आसपास के लगभग बीस गाँवों की महिलाओं ने एकजुट होकर इस परियोजना का विरोध किया और लगातार धरना-प्रदर्शन कर इसे आगे बढ़ने से रोक रखा है।अपने हक और भविष्य की सुरक्षा के लिए खड़ी ये महिलाएँ अब संघर्ष की सबसे मजबूत आवाज़ बन चुकी हैं।
महिलाओं ने रोका काम, बढ़ा आंदोलन
पूरा विवाद 6 फरवरी से शुरू हुआ जब परियोजना से प्रभावित महिलाओं ने बांध का काम रुकवा दिया। उनका कहना था कि जब तक मुआवजा और पुनर्वास की साफ गारंटी नहीं मिलेगी तब तक निर्माण कार्य नहीं होने दिया जाएगा। तीन दिन बाद 9 फरवरी को आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। पहले कहा गया कि उनसे पूछताछ होगी लेकिन बाद में उन्हें जेल भेज दिया गया। इसके बाद 20 से ज्यादा गांवों के लोग आंदोलन में शामिल हो गए और हजारों की संख्या में ग्रामीण जिनमें अधिकतर महिलाएं थीं विजावर तहसील कार्यालय पहुंचकर धरने पर बैठ गए।
बता दें यह मामला साल 2022 से चल रहा है। उस दौरान रिपोर्टिंग करने पर पता लगा कि गांव पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में आने वाले गांवों में से एक है। ये गांव केन बेतवा लिंक परियोजना के तहत बनने वाले बांध के क्षेत्र के किनारे बसे हैं। महिलाओं, पुरुषों और विभागीय स्तर पर बात भी करी। ज्यादातर लोग विस्थापित होने के लिए तैयार तो थे लेकिन उनकी भी कुछ शर्तें थीं। अगर सरकार उन शर्तों के आधार पर लोगों का विस्थापन करती है तो उनको कोई आपत्ति नहीं होगी। इस विस्थापन की वजह से वहां का किसी भी तरह का विकास नहीं हो रहा है। शासन प्रशासन के लिए अच्छा खासा बहाना भी है विकास कार्य न कराने को लेकर।
साठ साल की बुजुर्ग जानकीबाई ने बताया था कि तीन चार पीढ़ी बीत गईं गांव को बसे हुए तब से विस्थापन की बात चल रही है। अब फर्क ये है कि पहले जंगल विभाग वाले कहते थे और अब डीएम, एसडीएम कह रहे हैं। हम चले जायेंगे लेकिन पहले मुआवजा चाहिये। हमारी भूमिधरी जमीन है कैसे छोड़े। सरकार भगा रही है तो जाना ही पड़ेगा वरना अपना घर बार जमीन छोड़कर जाने का मन नहीं कर रहा है। दसिया बताई हैं कि इतनी अच्छी खेती को कैसे छोड़े। बहुत अच्छी फसल होती है क्योंकि हमारे खेतों में केन नदी की उपजाऊ मिट्टी आती है। सबसे ज्यादा राई मतलब सरसो की पैदावार होती है। चार हिस्सेदार के बीच आठ एकड़ खेती है। साल भर के खाने को हो जाता है।
मध्यप्रदेश: केन बेतवा लिंक परियोजना के कारण लोगों का विस्थापन पैसों का लालच या मजबूरी
रात में लाठीचार्ज और वाटर कैनन
दैनिक भास्कर के अनुसार प्रशासन ने पहले आश्वासन दिया था कि अमित भटनागर को कल सुबह रिहा कर दिया जाएगा लेकिन रात में अचानक पुलिस ने धरना हटाने के लिए लाठीचार्ज कर दिया। इसके बाद वाटर कैनन का भी इस्तेमाल किया गया जिससे महिलाएं और बच्चे पूरी तरह भीग गए। ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया और दूर तक खदेड़ा गया। कई महिलाओं ने गालियां देने और मारपीट करने के भी आरोप लगाए हैं। दूसरी ओर पुलिस का कहना है कि प्रदर्शन उग्र हो रहा था और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए हल्का बल प्रयोग किया गया।
रिहाई के बाद भी जारी विरोध
लगभग चार से पांच दिन जेल में रहने के बाद अमित भटनागर को रिहा कर दिया गया है। रिहाई के बाद उन्होंने कहा कि केन-बेतवा परियोजना से पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है और लाखों पेड़ काटे जा रहे हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बांध के डूब क्षेत्र में करीब 25 गांव प्रभावित हो रहे हैं और विस्थापन कानून 2013 का पालन नहीं किया जा रहा। ग्रामीणों का कहना है कि यह आंदोलन बांध के खिलाफ नहीं बल्कि अधूरे वादों और गलत मुआवजा नीति के खिलाफ है। प्रशासन ने वीडियो फुटेज के आधार पर लोगों की पहचान कर कार्रवाई की बात कही है लेकिन गांवों में अब भी डर और नाराजगी का माहौल बना हुआ है।
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