खबर लहरिया Blog कालिंजर दुर्ग: सावन में इतिहास और आस्था का यादगार सफर, क्या है खास इस क़िले में?  

कालिंजर दुर्ग: सावन में इतिहास और आस्था का यादगार सफर, क्या है खास इस क़िले में?  

बांदा के बुंदेलखंड में स्थित्त कालिंजर दुर्ग जिसे सिर्फ पत्थरों से बनी पुरानी इमारत कहना शायद सही नहीं होगा। ये कालिंजर दुर्ग सदियों पुराने इतिहास, युद्धों, और उस दौर की शानदार कला की कहानी अपने भीतर समेटे हुए है। दुर्ग की दीवारों और यहां मौजूद प्राचीन मंदिरों को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह जगह अपने समय में कितनी प्रचलित रही होगी। 

रिपोर्ट – गीता देवी, लेखन – रचना 

कालिंजर दुर्ग (फोटो साभार: गीता देवी)

इस कालिंजर दुर्ग का सुंदर सफर गीता देवी ने तय किया है जिसे लिख तो मैं रही हूँ पर इसे आप गीता देवी की तरह ही पढ़ना। 

सावन और बारिश के दिनों में कालिंजर दुर्ग का नजारा और भी खूबसूरत हो जाता है। दुर्ग के आसपास पहाड़ियाँ हरियाली से ढँक जाती हैं और मौसम सुहाना हो जाता है। बारिश के बाद पहाड़ों और किलों के बीच फैली हरियाली इसकी ख़ूबसूरती और बढ़ा देती है। ऐसे मौसम में कालिंजर घूमना इतिहास और आस्था को एक साथ महसूस करने जैसा है। 

समुद्र तल से करीब 800 से 1200 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह दुर्ग बुंदेलखंड के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों में गिना जाता है। ‘कालिंजर’ नाम का अर्थ ही है ‘काल का विनाश करने वाला’। कालिंजर का इतिहास भी उतना ही समृद्ध है। अलग-अलग समय में इस दुर्ग पर कई राजवंशों का शासन रहा। गुप्त, चंदेल और बाद में मुगल शासकों के दौर में भी इसका महत्व बना रहा। खासकर 9वीं से 13वीं शताब्दी के बीच कालिंजर चंदेल वंश का एक प्रमुख केंद्र था। दुर्ग की मजबूत दीवारें, पुराने मंदिर, शिलालेख और पत्थरों पर की गई नक्काशी आज भी उस दौर की स्थापत्य कला की झलक दिखाती हैं।

कालिंजर किले और खूबसूरत नज़ारे (फोटो साभार: गीता देवी)                             

सावन में जब चारों तरफ हरियाली होती है और बादलों के बीच कालिंजर की पहाड़ियां दिखाई देती हैं तब यहां का इतिहास और प्रकृति एक-दूसरे से जुड़ते हुए नजर आते हैं। 

कालिंजर किले की खूबसूरती लोगों को अपनी ओर खींचती है

कालिंजर किले की ऊंची पहाड़ी, चारों तरफ फैली हरियाली और शांत माहौल यहां आने वाले लोगों को अपनी ओर खींचता है। कालिंजर के रहने वाले मोहन के अनुसार किला ऊंची पहाड़ी पर बना एक सुंदर और अजेय दुर्ग है। वह रोज सुबह किले आते हैं और दिनभर यहीं रहते हैं। गीता देवी ने एक मोहन नाम के व्यक्ति से बात किया जो वहीं के रहने वाले हैं। वे बताते हैं कि किले को दूर से देखने पर ही इसकी खूबसूरती का अंदाजा हो जाता है। यहां का शांत वातावरण और आसपास का प्राकृतिक नजारा उन्हें बार-बार यहां आने के लिए मजबूर करता है। यही वजह है कि वह हर दिन यहां चले आते हैं।

कालिंजर दुर्ग का क़िला (फोटो साभार: गीता देवी)                        

अब ऐतिहासिक कालिंजर किले तक पहुंचना हुआ आसान

एक समय था जब कालिंजर किले तक पहुंचना लोगों के लिए थोड़ा मुश्किल माना जाता था। अब यहां आने-जाने की सुविधा पहले से बेहतर हो गई है। रास्ता आसान होने के साथ पर्यटकों के लिए गाइड की सुविधा भी उपलब्ध है। इससे बाहर से आने वाले लोगों को किले को समझने और इसके इतिहास को करीब से जानने में मदद मिल रही है।

कमासिन से कालिंजर घूमने आईं कमला बताती हैं कि वह तीसरी बार किला देखने आई हैं। इससे पहले वह पिछले साल कार्तिक मेले के दौरान यहां आई थीं। उनका कहना है कि पहले किले तक पहुंचने का रास्ता थोड़ा मुश्किल लगता था अब रास्ता काफी आसान हो गया है। इसलिए यहां आने में पहले जैसी परेशानी नहीं होती।

वहीं फतेहपुर से आई एक फैमिली पहली बार कालिंजर किला देखने पहुंची है। परिवार के लोगों ने बताया कि उन्होंने किले के इतिहास और इसकी खूबसूरती के बारे में लोगों से काफी सुना था। सोशल मीडिया पर भी किले की तस्वीरें और वीडियो देखने के बाद यहां आने का मन बनाया। यहां पहुंचने के बाद उन्हें लगा कि कालिंजर जितना उन्होंने तस्वीरों और वीडियो में देखा था असल में उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत है।   

कालिंजर को देखने पहुंचे लोग (फोटो साभार: गीता देवी)                                 

किले की नक्काशीदार दीवारें, अलग-अलग तरह के महल, पुराने तालाब, मंदिर और आसपास का प्राकृतिक नजारा उन्हें काफी पसंद आया। गाइड जगह-जगह रुककर पुराने महलों, मूर्तियों, इमारतों और पत्थरों पर बनी नक्काशी के बारे में जानकारी देते हैं। इससे बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए किले की कला और इतिहास को समझना आसान हो जाता है।

चंदेलों की राजधानी और बुंदेलखंड का गौरव है कालिंजर

कालिंजर का इतिहास सदियों पुराना है। मध्यकाल में चंदेल शासकों के दौर में इस दुर्ग को खास पहचान मिली। चंदेलों ने बुंदेलखंड में कई मंदिरों, किलों और दूसरी ऐतिहासिक इमारतों का निर्माण कराया। इसी दौर में कालिंजर भी उनके लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। कालिंजर के रहने वाले अरविंद छिरौलिहा बताते हैं कि कालिंजर दुर्ग की बनावट और मजबूती ऐसी थी कि इसे जीतना किसी भी शासक के लिए आसान नहीं था। ऊंची पहाड़ी पर बना यह किला चारों तरफ से प्राकृतिक सुरक्षा से घिरा हुआ था। इसकी मजबूत दीवारें और किले की बनावट दुश्मनों के लिए बड़ी चुनौती थीं। यही वजह है कि कालिंजर का जिक्र इतिहास में कई बार एक मजबूत और महत्वपूर्ण दुर्ग के तौर पर मिलता है।अरविंद कहते हैं कि कालिंजर बुंदेलखंड के इतिहास और गौरव की पहचान है।     

कालिंजर पोस्टर (फोटो साभार: गीता देवी)                                        

यहां शेरशाह सूरी की आखिरी लड़ाई हुई 

अरविंद बताते हैं कि कालिंजर के इतिहास से जुड़ी सबसे चर्चित घटनाओं में शेरशाह सूरी का हमला भी शामिल है। साल 1545 में शेरशाह सूरी ने कालिंजर दुर्ग पर कब्जा करने के लिए यहां आक्रमण किया था। इस घटना ने कालिंजर को इतिहास के उन महत्वपूर्ण दुर्गों में शामिल कर दिया जहां सत्ता के लिए कई बड़े संघर्ष हुए।

लेकिन कालिंजर की पहचान सिर्फ इसके युद्धों और राजाओं से नहीं है। यहां मौजूद नीलकंठ महादेव मंदिर भी इस जगह को खास बनाता है। खासकर सावन के महीने में मंदिर और किले को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। कार्तिक के दौरान भी यहां आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है।

मंदिर के आस-पास आज भी दिखती है प्राचीन शिल्पकला

कालिंजर की यात्रा सिर्फ एक किला देखने तक सीमित नहीं रहती।खासकर नीलकंठ आसपास मौजूद प्राचीन शिल्पकला और पत्थरों पर बनी आकृतियां इस जगह के पुराने इतिहास की झलक दिखाती हैं।

मंदिर के आसपास जगह-जगह पत्थरों पर की गई नक्काशी, पुरानी आकृतियां और इमारतों के अवशेष दिखाई देते हैं। इन्हें देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि सदियों पहले यहां के कारीगर पत्थरों पर कितनी बारीकी से काम करते थे। यही प्राचीन कला कालिंजर को बाकी ऐतिहासिक जगहों से अलग पहचान देती है।   

प्राचीन शिल्पकला (फोटो साभार: गीता देवी)                              

किले में आज क्या-क्या देखने को मिलता है

कालिंजर किले के भीतर आज भी कई ऐसे ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल मौजूद हैं जो यहां आने वाले लोगों का ध्यान खींचते हैं। इनमें नीलकंठ मंदिर, सीता सेज, पाताल गंगा, बुड्ढी-बुड्ढा तालाब, कोटि तीर्थ, शनिचरी तलैया, मृगधारा और रंग महल जैसे कई स्थान शामिल हैं। कालिंजर को सिर्फ एक पुराने किले के तौर पर देखना इसके इतिहास को छोटा कर देना होगा। यह बुंदेलखंड की पहचान, चंदेलों की विरासत और भारतीय इतिहास की कई महत्वपूर्ण घटनाओं का गवाह रहा है। इसकी दीवारों, मंदिरों, तालाबों और प्राचीन इमारतों में आज भी उस पुराने काल की कहानी दिखाई देती है।

“मैं भी हर साल जाती हूं कालिंजर किला घूमने” 

रिपोर्टर गीता देवी – “खबर लहरिया रिपोर्टर गीता देवी ने अपना यादगार अनुभव साझा करते हुए कहा कि वह हर साल कार्तिक पूर्णिमा के समय 5 दिन लगने वाले मेले का कबरेज करने और घूमने जाती है। इस मेले दुर-दुर से बड़ी-बड़ी दुकानें और लाखों कि संख्या में लोग घूमने आते हैं।”  

 

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