आज 16 दिसंबर है, आप सभी को पता है कि आज क्या है? आज हमारी सबसे बड़ी विजय और सबसे बड़ी असफलता का दिन है। मैं इस संपादकीय को लिखने बैठी, तो मैंने खुद में महसूस किया कि मैं किस पर लिखूं? सबसे बड़ी विजय पर या सबसे बड़ी असफलता पर? और किस मुद्दे पर अपने दिलोदिमाग को सहनशीलता दिलाऊं? ये मुझे खुद से अपने ऊपर सवाल है, तो आपको तो जरूर होगा?
संपादकीय: मीरा देवी की कलम से…
बांदा की चौखट पर निर्भया का दर्द
फिर ऐसे में ये सवाल उठता है कि आप इन दोनों में से किस दिन के लिए अपने दिलोदिमाग में सहनशीलता रखेंगे? यह राय दिल्ली के किसी वातानुकूलित कमरे से नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के बांदा जिले की उस ज़मीन पर बैठकर लिख रही हूं जहां सूखा, बाढ़, अशिक्षा, असुविधाएं, गैर बराबरी और अन्याय की मार बहुत गहरी है। फिर भी विजय दिवस का जश्न मनाते हुए, मैं लड़कियों व महिलाओं के इंसाफ और हित के लिए ही लिखूंगी क्योंकि इस ज़मीन पर बैठकर 16 दिसंबर 2012 के बाद बने कड़े कानूनों की सच्चाई बिल्कुल अलग दिखती है।
हमारे देश के इतिहास में 16 दिसंबर नाम की यह तारीख हमेशा दो गहरे घाव लेकर आएगी। एक गर्व का प्रतीक (1971 विजय दिवस) और दूसरा राष्ट्रीय शर्म (2012 निर्भया) का प्रतीक। 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सैनिकों ने भारत की सेना के सामने आत्मसमर्पण किया था। इसके साथ ही पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश के रूप में आज़ाद हुआ था। 16 दिसंबर को हर साल बांग्लादेश और भारत में विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। एक ओर हमने दिखाया कि हम अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए कितने ताकतवर हैं। दूसरी ओर यह तारीख हमें याद दिलाती है कि हम अपने नागरिकों और खासकर महिलाओं की गरिमा और सम्मान की रक्षा के लिए कितने कमजोर हैं। निर्भया कांड के बाद 2013 में जो कानूनी बदलाव आया (पोस्को को मज़बूती, सज़ा की कठोरता, एफआईआर न लिखने वाले पुलिस पर कार्रवाई) वह आज भी ग्रामीण भारत की चौखट तक पहुंचने से पहले दम तोड़ रहा है। निर्भया कांड के बाद आप ने उस कानून का पालन होते देखा, जो 2013 में बना? अगर नहीं देखा तो आगे आपको कोई उम्मीद है?
सवाल यहीं से शुरू होता है कि क्या हमने निर्भया के नाम पर केवल क़ानूनों का पुलिंदा तैयार किया या हमने उस संस्थागत ढांचे को भी बदल दिया जो इन कानूनों को लागू करता है?
क्रूरता की हद – कानून क्यों हुआ बेअसर?
2013 का कानून यौन हिंसा को रोकने के लिए आया था लेकिन हाल की घटनाएं बताती हैं कि क्रूरता का स्तर कम होने के बजाय और बढ़ गया है। 1971 में हमने बाहरी दुश्मन पर जीत हासिल की लेकिन आज हम समाज के भीतर पल रही इस क्रूरता के सामने हार रहे हैं।
- मासूमियत पर क्रूरता का हमला: POCSO (पोस्को) कानून को बच्चों की सुरक्षा के लिए सबसे कड़ा माना जाता है। फिर भी हमारे ही बांदा जिले में 3 साल की मासूम लड़की के साथ 4 जून 2025 को बलात्कार का मामला सामने आया और अस्पताल में 8 दिन इलाज चलने के बाद उसकी मौत हो गई। इलाज के दौरान अस्पताल में उसकी मौत 12 जून 2025 को हो गई।
- बिहार के पटना जिले में 10 साल की लड़की को बहला-फुसलाकर बुलाने के बाद दुष्कर्म किया गया और फिर उसका शव एक पेड़ से लटका मिला। यह घटना 28 अगस्त 2025 की है. POCSO (पोस्को) कानून की कठोरता इस क्रूरता को क्यों नहीं रोक पाई?
Bihar, Patna: परिजनों का आरोप, 10 साल की लड़की को बहला-फुसलाकर बुलाया, फिर बलात्कार कर हत्या
- जातिगत और सामूहिक हिंसा: 24 अक्टूबर 2025 को बांदा जिले में एक वाल्मीकि नाबालिग लड़की को घर में बंधक बनाकर बलात्कार और हत्या का दिल दहलाने वाला मामला सामने आया।
- इसी तरह पटना में एक नाबालिग दलित लड़की के साथ दुष्कर्म और डकैती के बाद इलाज के दौरान अस्पताल में उसकी मौत हो गई। घटना 26 मई 2025 की है जहां मुजफ्फरपुर स्थित कुढ़नी थाना क्षेत्र के गांव में एक 10 वर्षीय नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार किया गया था और उसे गंभीर हालत में पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (पीएमसीएच) लाया गया था। अस्पताल में इलाज के लिए इंतजार करते हुए छः दिन तक मौत से जूझने के बाद 31 मई को लड़की की मौत हो गई।
Patna: नाबालिग दलित लड़की के साथ बलात्कार और फिर इलाज में देरी होने से हुई अस्पताल में मौत
ये हमारे हज़ारों रिपोर्टों में कुछ ही उदाहरण हैं। ये घटनाएं दिखाती हैं कि क्रूरता का यह स्तर क्यों जारी है। अपराधी जानते हैं कि न्याय मिलने में देर होगी और अगर वे स्थानीय सत्ता का हिस्सा हैं तो वे बच निकलेंगे। जब निर्भया के दोषियों को सज़ा मिलने में सात साल से ज़्यादा लगे तो ग्रामीण अपराधियों को कानून का डर क्यों होगा? पुलिस, प्रशासन और मीडिया से दूर या फिर गंभीरता न लेने की वजह से एक तरह निर्भया से भी गंभीर मामले होते ही रहते हैं। डर, दबाव और बदनामी के चलते ज्यादातर मामले वहीं के वही दब कर रह जाते हैं।
संस्थागत विफलता – न्याय की जगह अन्याय की दुकान
निर्भया के बाद सबसे बड़ा वादा जवाबदेही का था लेकिन ज़मीनी सच्चाई में पुलिस और न्याय पालिका ने ही कानून का उपहास किया है।
पुलिस की आपराधिक लापरवाही और वसूली
2013 में भारतीय दंड संहिता की धारा 166A जोड़ी गई, जिसके तहत महिलाओं से जुड़े गंभीर अपराधों में एफआईआर दर्ज न करना पुलिस के लिए दंडनीय अपराध है। इसका उद्देश्य पुलिस की जवाबदेही तय करना था, फिर भी इस प्रावधान के बावजूद व्यवहार में पुलिस का रवैया पूरी तरह नहीं बदला है।
- भ्रष्टाचार का बोलबाला:
- अक्टूबर 2025 में बांदा जिले में एक नाबालिग लड़की के लापता होने का मामला सामने आया है। लड़की को ढूंढने के लिए परिजनों द्वारा पुलिस से गुहार लगाई गई, लेकिन परिजनों का आरोप है कि गिरवां और अतर्रा थाने की पुलिस ने कार्रवाई के नाम पर उनसे कई हजार रुपये ले लिए। लड़की के माता-पिता और दादी का कहना है कि पुलिस ने मदद करने के बजाय पैसों की मांग की। परिजनों का आरोप है कि यहां न्याय अधिकार से नहीं, बल्कि पैसों के बल पर मिलता है।
UP Banda: लापता लड़की ढूढ़ने के लिए पुलिस ने मांगे 50 हजार-आरोप
- लापरवाही का परिणाम: ऐसा भी मामला हमने कवरेज किया कि बांदा के पैलानी थाने में 19 साल की लड़की से दुष्कर्म होने के बाद भी आरोपी जान से मारने की धमकी दे रहा है। पुलिस की यह लापरवाही 2013 में स्थापित न्याय न दिला पाने का सीधा उल्लंघन है। शिकायतकर्ता के अनुसार 31 जुलाई 2025 कि रात लगभग 11 बजे वह पेशाब करने बहार निकली जहां से उसे गांव के ही 2 लड़को ने अगवा किया और फिर उसके साथ बलात्कार किया। साथ ही किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी दी जिस डर से लड़की ने तालाब में कूद आत्महत्या करने की भी कोशिश की जहाँ से लोगों ने उसे बचा लिया।
UP Banda: पहले बलात्कार किया फिर जान से मारने की धमकी दे रहा, शिकायतकर्ता
न्यायिक परिभाषाओं में संवेदनशीलता का अभाव
फास्ट-ट्रैक कोर्ट: तेज सुनवाई कोर्ट (फास्ट-ट्रैक कोर्ट) का विचार इसलिए लाया गया था ताकि जल्दी न्याय मिले और मामलों में सालों की देरी न हो। यह सोच अपने आप में अच्छी और ज़रूरी है लेकिन सवाल यह है कि सिर्फ़ तेज़ी से फैसला देना ही काफी है या न्याय की गुणवत्ता भी उतनी ही मज़बूत होनी चाहिए?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 17 मार्च 2025 को एक मामले में सुनवाई करते हुए टिप्पणी की थी कि किसी नाबालिग लड़की के प्राइवेट पार्ट को छूना या उसके पजामे का नाड़ा खींचना बलात्कार के प्रयास की कानूनी श्रेणी में नहीं आता। ऐसे फैसले समाज में गलत संदेश देते हैं और सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न को बढ़ावा दे सकते हैं। आज भी महिलाओं के कपड़ों पर टिप्पणी करना, यात्रा के दौरान शरीर को छूना, आंख मारना, सीटी बजाना और यहां तक कि उनके सामने अश्लील वीडियो देखना जैसी घटनाएं आम हैं। ये सब कानूनन अपराध हैं लेकिन इस तरह के फैसलों से ऐसा लगता है मानो ऐसे हरकतों को हल्के में लिया जा रहा है। हमारे रिपोर्टर खुद कई बार ऐसे हमलों के शिकार हुए हैं और रोज़मर्रा की रिपोर्टिंग के दौरान आम महिलाओं से भी ऐसी गंभीर बातें सुनते हैं जो यह दिखाता है कि समस्या कितनी गंभीर और बड़ी है।
संस्थागत उत्पीड़न और क्रूरता
हिंसा केवल बाहरी नहीं है बल्कि संस्थाओं के भीतर भी है। वाराणसी कारागार में 2025 में एक एसोसिएट डीआईजी जेलर को उनके ही वरिष्ठ अधिकारी द्वारा गालियां और प्रताड़ना सहनी पड़ रही थी जिसका खुलासा वहां की सीनियर महिला अधिकारी ने किया। जब जेल विभाग, पुलिस प्रशासन और न्यायालय जैसी संस्थाओं में महिला अधिकारी ही सुरक्षित नहीं हैं तो आम नागरिक की सुरक्षा पर भरोसा करना मुश्किल हो जाता है। इस खुलासे ने धर्म नगरी की जेल की पोल खोल दी और सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी। हमारे रिपोर्टरों ने ऐसी कई चौंकाने वाली घटनाओं को उजागर किया है जो यह दिखाती हैं कि सुरक्षा और न्याय के नाम पर बनी इन प्रमुख संस्थाओं में भी गंभीर कमियां मौजूद हैं।
सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक असंवेदनशीलता
कानून की विफलता केवल पुलिस या न्यायालय तक सीमित नहीं है बल्कि यह उस सामाजिक विचारधारा का हिस्सा है जिसका नेतृत्व प्रभावशाली हस्तियां करती हैं।
बड़े-बड़े धर्मगुरु और इलज़ाम उल्टा ज़ख्म खाए लोगों पर, ये कैसी बेदर्दी?
निर्भया के बाद देश की मांग थी कि समाज महिलाओं के प्रति सम्मानजनक व्यवहार स्थापित करे लेकिन धार्मिक गुरुओं के बयान इस मांग को खारिज करते हैं।
अनिरुद्धाचार्य और रामभद्राचार्य जैसे प्रतिष्ठित गुरुओं ने महिलाओं के कपड़े, व्यवहार या उनकी भूमिका पर जो आपत्तिजनक टिप्पणियां की हैं वे सीधे तौर पर 2013 के कानून द्वारा स्थापित सम्मान और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन हैं। ऐसे बयान पितृसत्तात्मक सोच को बढ़ावा देते हैं और अप्रत्यक्ष रूप से जख्म खाए लोगों को दोषी ठहराने की संस्कृति को मज़बूत करते हैं।
Objectionable Statements on women: कुछ धर्म गुरु और नेताओं ने दिया महिलाओं पर आपत्तिजनत बयान
पटना में एक महिला को ‘डायन’ कहकर बेरहमी से पीटा गया। यह घटना दिखाती है कि 2013 का कानून भी सदियों पुराने अंधविश्वासों और सामूहिक क्रूरता के सामने निष्क्रिय साबित हो रहा है। बिहार में डायन प्रथा आज भी पैर पसारे हुए है और हमने लगातार कई मामलों की कवरेज की है जिनमें से पटना का मामला सबसे चौंकाने वाला है। ऐसे समाज में महिलाएं अपने जीवन के लिए सुरक्षित नहीं हैं। बड़े-बड़े तांत्रिक जब किसी महिला को डायन घोषित कर देते हैं और समाज उनकी बात मान लेता है तो महिलाओं को सरे आम ज़िंदा जला दिया जाता है या कुल्हाड़ी से हमला कर दिया जाता है। पीड़ित अपने ही जीते जी खुद को मृत समझ बैठती हैं। इसे शब्दों में बयान करना भी मुश्किल है क्योंकि उस दर्द को केवल महसूस किया जा सकता है। यह वही तांत्रिक और धार्मिक बाबा हैं जिनका धंधा मौजूदा सरकार की निगरानी में फल-फूल रहा है। बिहार में हमने इस डायन प्रथा की कई घटनाओं की रिपोर्टिंग की है और इस विषय पर राउंडटेबल में गहन चर्चा भी की है जिससे यह साफ़ हो जाता है कि यह केवल व्यक्तिगत कुप्रथा नहीं बल्कि समाज और प्रशासन की सहनशीलता की विफलता का परिणाम है।
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ऑनलाइन ट्रोलिंग और यौन उत्पीड़न
आज के डिजिटल युग में महिलाओं के खिलाफ ऑनलाइन ट्रोलिंग और यौन उत्पीड़न गंभीर समस्या बन गई है। सोशल मीडिया पर महिलाओं को अपमानित करना, अश्लील कमेंट करना, उनका व्यक्तिगत डेटा लीक करना और धमकी देना आम बात हो गई है। भारत में इस तरह के अपराधों से निपटने के लिए आईटी एक्ट 2000 बनाया गया था जिसका उद्देश्य डिजिटल लेन-देन को सुरक्षित बनाना, साइबर अपराधों को रोकना और ऑनलाइन दस्तावेजों को वैधता देना है। 2013 में इस कानून में संशोधन कर महिलाओं और बच्चों के खिलाफ ऑनलाइन ट्रोलिंग, हिंसा और यौन उत्पीड़न के लिए सख्त प्रावधान जोड़े गए। इसके बावजूद कई मामलों में ऑनलाइन उत्पीड़न पर कार्रवाई धीमी रहती है। यह दिखाता है कि कानून होने के बावजूद महिलाओं की सुरक्षा और उनका सम्मान डिजिटल दुनिया में पर्याप्त रूप से सुनिश्चित नहीं किया जा रहा है और सामाजिक मानसिकता में बदलाव की अब भी गंभीर जरूरत है।
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राजनीतिक असंवेदनशीलता
राजनीतिक असंवेदनशीलता मध्यप्रदेश यह साफ दिखाता है कि नेताओं के ऐसे असंवेदनशील बोल कानून की नीयत को कमजोर कर देते हैं और कई बार न्याय के लिए सबसे बड़ी अदालतों को बीच में उतरना पड़ता है। विजय शाह ने 12 मई 2025 को रायकुंडा गांव, इंदौर ग्रामीण जिले में आयोजित एक कार्यक्रम में सार्वजनिक सभा को संबोधित किया था और उन्होंने अपने भाषण में कर्नल सोफिया कुरैशी को “आतंकवादियों की बहन” बोला था। नेता ने अपने भाषण में कहा ” जिन्होंने हमारे बेटियों के सिन्दूर उजड़े थे, उन लोगों को हमने उन्हीं की बहन भेज करके हमने उनकी ऐसी की तैसी की। इस बयान को महिलाओं के प्रति असंवेदनशील और आपत्तिजनक माना गया और इसके बाद सोशल मीडिया और जनता में व्यापक आलोचना हुई। ऐसे बयान स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि राजनीतिक असंवेदनशीलता महिलाओं के सम्मान और कानून की भावना दोनों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।
न्याय के लिए हमारी अपील
- FIR न लिखने या रिश्वत मांगने वाले पुलिसकर्मियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसलों पर न्यायिक प्रणाली को आत्म मंथन करना चाहिए। न्यायिक अधिकारियों और वकीलों का जेंडर के आधार पर संवेदनशीलता प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाना चाहिए।
- रक्षा बजट की तरह ही फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं, वन स्टॉप सेंटरों और पुलिस प्रशिक्षण को राष्ट्रीय प्राथमिकता का दर्जा मिलना चाहिए।
- धार्मिक और राजनीतिक पार्टियों और नेताओं को महिलाओं की गरिमा के खिलाफ बयान देने से रोकने के लिए मज़बूत नैतिक और सामाजिक दबाव बनाना होगा।
निर्भया का संघर्ष केवल दोषियों को सजा देने, एनकाउंटर करने या बुलडोज़र कार्रवाई तक सीमित नहीं था। यह संघर्ष हर महिला की गरिमा, सम्मान, न्याय और बिना डरे जीवन जीने के अधिकार के लिए था। 16 दिसंबर हमें यह दोहरी जिम्मेदारी याद दिलाता है – पहला कि देश की सीमाओं पर मजबूती बनाए रखना और दूसरा समाज में संवेदनशीलता बनाए रखना। हम हर साल 16 दिसंबर को 1971 की जीत पर गर्व करेंगे लेकिन हमारा देश तब तक पूरी तरह सम्मानित नहीं होगा जब तक हम निर्भया के बाद सामने आई असफलताओं और समाज में मौजूद अन्याय को ठीक नहीं कर लेते। सच्चा विजय दिवस तब आएगा जब हम न केवल बाहरी दुश्मनों से सुरक्षित होंगे बल्कि अपने समाज के भीतर अन्याय के खिलाफ निर्णायक जीत भी हासिल करेंगे।
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