खबर लहरिया Hindi Chitrakoot News: चित्रकूट के सरकारी अस्पताल में इलाज के नाम पर वसूली के आरोप, ऑपरेशन के लिए 15 से 20 हजार रुपये मांगने का दावा

Chitrakoot News: चित्रकूट के सरकारी अस्पताल में इलाज के नाम पर वसूली के आरोप, ऑपरेशन के लिए 15 से 20 हजार रुपये मांगने का दावा

सरकारी अस्पताल गरीब और जरूरतमंद परिवारों के लिए इलाज की सबसे बड़ी उम्मीद होते हैं। खासकर प्रसव के समय परिवार इस भरोसे के साथ अस्पताल पहुंचता है कि जच्चा-बच्चा को सुरक्षित इलाज मिलेगा और इसके लिए उन्हें भारी रकम नहीं देनी पड़ेगी। लेकिन चित्रकूट के जिला अस्पताल सोनपुर से प्रसव और ऑपरेशन के नाम पर मरीजों से पैसे लिए जाने के आरोप सामने आए हैं।

यूपी के चित्रकूट जिले का सरकारी अस्पताल (फोटो साभार: नाज़नी)

रिपोर्ट – नाज़नी रिजवी, लेखन – सुचित्रा 

खबर लहरिया की रिपोर्टर इस मामले की जाँच के लिए चित्रकूट के जिला अस्पताल सोनेपुर पहुंची। वहां इलाज के लिए आए कई मरीजों और महिलाओं ने डॉक्टरों पर पैसा मांगने का आरोप लगाया है। 

सरकारी अस्पताल में 10 से 15 हजार तक रुपए मांगने का आरोप 

आशा कार्यकर्ताओं ने पहचान गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि ऑपरेशन के नाम पर 10 से 15 हजार, कहीं-कहीं 20 हजार रुपये तक मांगे जाते हैं। सामान्य प्रसव के लिए भी तीन से चार हजार रुपये लिए जाने की बात बताई। सरकारी अस्पताल में यह कोई नई बात नहीं है। उनका आरोप है कि जब महिला को प्रसव के लिए अंदर ले जाया जाता है और परिवार पहले से ही डरा हुआ होता है, उस समय उन्हें बताया जाता है कि ऑपरेशन में इतना पैसा लगेगा। कई बार यह भी कहा जाता है कि बाहर निजी अस्पताल में इससे ज्यादा खर्च आएगा। ऐसे समय में परिवार जच्चा-बच्चा की सुरक्षा के डर से पैसे देने को मजबूर हो जाता है। 

जच्चा बच्चा वार्ड में एक आशा कार्यकर्ता ने बताया कि डॉक्टर रफीक दस हजार तक लेते हैं। ग़रीब है तो 6 से 7 हज़ार में भी मान जाते हैं और मरीज की स्थिति देखकर रकम कम-ज्यादा कर देते हैं।  वहीं आशा कार्यकर्ता का आरोप है कि डॉक्टर श्वेता मिश्रा 15 से 20 हजार रुपये तक मांगती है। न देने पर महिलाएं चाहे जितना दर्द में हों तड़पती रहें, उनका इलाज नहीं किया जाता, यहां तक वो (डॉक्टर) एक टेबलट न देती हैं न बाहर से लिखती हैं। आगे ये कहा पैसे नहीं देने पर मरीज को डराया जाता है और छुट्टी करने दूसरे अस्पताल रेफर करने की धमकी दी जाती है। 

जच्चा बच्चा विभाग/लेबर रूम: सरकारी अस्पताल में जहां बच्चे डिलवरी के लिए ले जाया जाता है (फोटो साभार: नाज़नी)

प्रसव के लिए सरकारी अस्पताल आई महिलाओं का दर्द 

कंठीपुर की रहने वाली आरती 13 सितंबर 2026 की शाम करीब पांच बजे जिला सरकारी अस्पताल सोनेपुर पहुंची थीं। उनके साथ कंठीपुर की आशा कार्यकर्ता लक्ष्मी भी थीं।  रातभर उन्हें प्रसव पीड़ा होती रही। बच्चे का कुछ हिस्सा बाहर आने लगा था और नाल भी बाहर निकल आई थी। सुबह करीब साढ़े तीन बजे डॉक्टरों ने बताया कि यहां डिलीवरी नहीं हो पाएगी और उन्हें प्रयागराज ले जाना होगा। अस्पताल की ओर से बच्चे के गले में नाल फंसे होने की बात कही गई। परिवार उन्हें लेकर जानकीकुंड जा रहा था, लेकिन रास्ते में ही बच्चे का जन्म हो गया। इसके बाद वे वापस जिला अस्पताल आए, लेकिन बच्चे को बचाया नहीं जा सका।

आरती का सवाल है कि अगर सरकारी अस्पताल में प्रसव कराना संभव नहीं था तो उन्हें पहले ही क्यों नहीं बताया गया। अल्ट्रासाउंड में पहले से ही बच्चे के गले में नाल फंसी होने की जानकारी थी। इसके बावजूद उन्हें रातभर अस्पताल में रखा गया और जब बच्चा बाहर आने लगा, तब रेफर किया गया। अगर उन्हें समय रहते किसी दूसरे अस्पताल जाने की सलाह दी जाती तो शायद वह समय पर इलाज करा पातीं। बच्चे की मौत के बाद उन्हें अपनी जान को लेकर भी डर लग रहा था।

आशा कार्यकर्ता ने कहा- रेफर के बाद एंबुलेंस की व्यवस्था में लगा समय

आरती को अस्पताल लेकर जाने वाली आशा कार्यकर्ता लक्ष्मी ने बताया कि 13 सितंबर की शाम करीब छह बजे आरती को सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। आरती के परिवार में उस समय कोई व्यक्ति मौजूद नहीं था। परिवार को बुलाने और प्रयागराज जाने की तैयारी में समय लगा। एंबुलेंस की व्यवस्था करने में करीब एक घंटे का समय लगा और सुबह करीब चार बजे वे जानकीकुंड के लिए निकले। रास्ते में बच्चे का जन्म हो गया।

लक्ष्मी का आरोप है कि वापस अस्पताल आने के बाद बच्चे में जान नहीं थी। अस्पताल में नाल काटने और जरूरी प्रक्रिया किए जाने के बावजूद किसी दस्तावेज में उनका या आरती का नाम दर्ज नहीं किया गया। उनके पास बतौर प्रमाण सिर्फ रेफर का कागज है।

ये भी देखें – महोबा : सरकारी अस्पताल में डॉक्टर नहीं, बढ़ी मरीज़ों की संख्या

लक्ष्मी ने यह भी आरोप लगाया कि जब उन्होंने इस मामले की शिकायत अपने शिवरामपुर समुदाय स्वास्थ्य के अधीक्षक राजीव से की तो अस्पताल में फोन करने के बाद वहां मौजूद दाईयों ने उनके साथ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। उन्हें (लक्ष्मी) अभी करीब एक साल से नौकरी में हैं और उन्हें अपनी नौकरी को लेकर डर भी है। उनका आरोप है कि पहले भी एक महिला के साथ इसी तरह की स्थिति हुई थी और उसका बच्चा भी अस्पताल के बाहर पैदा हुआ था।

आरती के मामले के अलावा जिला अस्पताल के जच्चा-बच्चा वार्ड में भर्ती महिलाओं के परिजनों और आशा बहुओं ने भी पैसे लिए जाने के आरोप लगाए हैं।

मरीजों ने बताया- इलाज के लिए किसी तरह पैसे जुटाए

कादरगंज की रहने वाली कुसमा ने बताया कि उनसे भी पैसे लिए गए थे। हालांकि उन्हें यह जानकारी नहीं है कि कितनी रकम दी गई, क्योंकि पैसे उनके पति ने दिए थे।

आनंदपुर की रहने वाली शिवानी (पत्नी प्रेम पटेल) ने बताया कि उनसे चार हजार रुपये नकद और 10 हजार रुपये ऑनलाइन लिए गए। उनका आरोप है कि पैसे न देने पर धमकी दी जाती थी। उनका कहना है कि उस समय जच्चा-बच्चा की सुरक्षा सबसे जरूरी थी इसलिए किसी तरह पैसे का इंतजाम करके देने पड़े।

लखनपुर की रहने वाली कुसुमकली के भाई सिद्धकुमार ने 15 हजार रुपये लिए जाने की बात कही है।

वहीं कर्वी मिशन रोड की रहने वाली संध्या दुबे ने बताया कि उनकी बेटी का 11 सितंबर 2026 को ऑपरेशन से प्रसव हुआ था। अस्पताल की दाईयों ने उनसे चार हजार रुपये लिए लेकिन बच्ची सुरक्षित थी इसलिए उन्होंने इसे ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया और खुशी में पैसे दे दिए।

आशा कार्यकर्ता का कहना है कि अस्पताल में इस तरह के आरोप कोई नई बात नहीं हैं। जब महिला प्रसव पीड़ा में होती है और परिवार पहले से ही परेशान और डरा हुआ होता है, तब उन्हें ऑपरेशन की जरूरत बताकर पैसे मांगे जाते हैं। निजी अस्पताल में जहां लाखो पैसे लिए जाते हैं ऐसे में जच्चा-बच्चा की सुरक्षा के डर से परिवार पैसे देने के लिए तैयार हो जाता है।

सरकारी अस्पताल में जहां डिलवरी के बाद महिला को शिफ्ट किया जाता है (फोटो साभार: नाज़नी)

डॉक्टर आरोपों से अनजान 

डॉक्टर महिला रोग विशेषज्ञ  रफीक ने आरोपों पर कहा कि अभी तक उनके ऊपर इस तरह के आरोप नहीं लगे थे। उन्होंने कहा कि जिस समय आरती की डिलीवरी हुई, उस समय वह छुट्टी पर थे। अगर आरती के मामले में कोई समस्या थी तो उस समय ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर को बुलाया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि सामान्य तौर पर ऐसा कोई केस आने पर डॉक्टर को बुलाया जाता है।

डॉक्टर रफीक ने कहा कि अब जो आरोप लगाए गए हैं, उनकी जांच होगी और आगे क्या कार्रवाई करनी है, इसका फैसला अधिकारी करेंगे।

तीन सदस्यीय जांच टीम बनाई

चित्रकूट के सीएमओ महेंद्र कुमार ने 15 सितम्बर 2026 को बताया कि अस्पताल में मरीजों से पैसे लिए जाने की शिकायत मिली है। मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय टीम गठित की गई है और जांच की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इसमें समय लगेगा। उन्होंने कहा कि अगर जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

उन्होंने यह भी बताया कि अस्पताल में डॉक्टरों की कमी एक बड़ी समस्या है। चित्रकूट में सर्जन डॉक्टरों की संख्या भी कम है और जिला अस्पताल में केवल दो सर्जन हैं। ऐसे में कार्रवाई के तौर पर किसी डॉक्टर को हटाना या दूसरी जगह भेजना भी व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है।

सरकारी अस्पताल में स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल 

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि मरीजों से पैसे लिए गए या नहीं। सवाल यह भी है कि सरकारी अस्पताल में आने वाले गरीब परिवारों को समय पर सही जानकारी, इलाज और सुरक्षित रेफर क्यों नहीं मिल पाता? 

आरती का मामला बताता है कि प्रसव जैसी आपात स्थिति में कुछ घंटों की देरी भी परिवार के लिए कितनी भारी पड़ सकती है। अगर अस्पताल में प्रसव संभव नहीं था तो परिवार को समय रहते दूसरे अस्पताल भेजना जरूरी था। वहीं, मरीजों से पैसे लिए जाने के आरोप सही पाए जाते हैं तो यह सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

फिलहाल सवाल यह है कि सरकारी अस्पताल में, जहां गरीब परिवार मुफ्त इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, वहां अगर इलाज के नाम पर पैसे मांगे जाने के आरोप सही पाए जाते हैं तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? जांच पूरी होने के बाद ही यह साफ होगा कि मरीजों और आशा कार्यकर्ता की ओर से लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है और आरती के मामले में अस्पताल की तरफ से इलाज और रेफर करने में क्या प्रक्रिया अपनाई गई थी।

ऐसे मामले पहली बार चर्चा में नहीं आए हैं। चित्रकूट के सरकारी अस्पताल में आए दिन इस तरह के मामले सामने आते रहते हैं। क्या कभी यह अस्पताल मरीजों को सही इलाज और भरोसा दे पाएगा?

 

यदि आप हमको सपोर्ट करना चाहते है तो हमारी ग्रामीण नारीवादी स्वतंत्र पत्रकारिता का समर्थन करें और हमारे प्रोडक्ट KL हटके का सब्सक्रिप्शन लें’

If you want to support  our rural fearless feminist Journalism, subscribe to our  premium product KL Hatke

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *