मुजफ्फरपुर जिले के बोचहां ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले सलहा गांव के करीब 200 किसान खेती पर निर्भर हैं। किसान बताते हैं कि वे मुख्य रूप से लता (बेल या लतर) वाली सब्जियां -जैसे लौकी, घिया, परवल, सेम, टमाटर और अन्य सब्जियां उगाते हैं। इन सब्जियों की खेती के लिए किसान नई तकनीक से बने ढाठ का इस्तेमाल करते हैं। रामदयाल साहनी ऐसे किसान है जिन्होंने ढाठ का इस्तेमाल किया।
नई तकनीक से बने ढाठ की खासियत क्या है?
नई तकनीक से बने ढाठ में बांस का इस्तेमाल कम होता है। इसमें बांस का इस्तेमाल मुख्य रूप से धागे और तार को खड़ा रखने के लिए किया जाता है। तार को लगभग चार से पांच फीट नीचे तक ईंट के सहारे गाड़ा जाता है, जिसे झिट कहा जाता है।

जमीन में गड़ा हुआ तार जिसको झिट कहते हैं, ये लगभग 4 फिट नीचे गड्ढा कर के ईंट में फंसा कर गाड़ा जाता हैं (फोटो साभार: अप्सरा)
इसके ऊपर पतली रस्सी बांधी जाती है, जिसे तांत कहते हैं। इसी तांत के सहारे सब्जियों की लताएं फैलती हैं।
सलहा गांव के निवासी किसान रामदयाल साहनी ने लगभग आठ बीघा जमीन पर खेती की है। वह सिर्फ सब्जियों की खेती करते हैं। उन्होंने बताया कि इस समय उनके खेत में कद्दू, सेम, कुंदरी, परवल और अन्य सब्जियां लगी हुई हैं। ये सभी लता वाली सब्जियां हैं। वह इन सब्जियों की खेती नई तकनीक से बने ढाठ पर करते हैं।
हालांकि, किसान जमीन पर सीधे सब्जियां उगा सकते हैं या फिर पुरानी तकनीक से बने बांस के ढाठ का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। लेकिन रामदेव सहनी ने नई तकनीक से बने ढाठ को चुना। इसके पीछे कई कारण हैं।
लतर वाली सब्जियों को जमीन पर रहता है खतरा
रामदयाल साहनी बताते हैं कि जब वह जमीन पर सब्जियों की खेती करते थे, तब सब्जियों पर दाग-धब्बे लग जाते थे। इससे उनकी कीमत घट जाती थी। कई बार सब्जियां खराब हो जाती थीं, सड़ने लगती थीं और उनकी पैदावार भी प्रभावित होती थी।
जमीन पर फैली सब्जियों को तोड़ने में भी काफी दिक्कत होती है। सब्जियां नीचे होने के कारण किसानों और मजदूरों को झुककर उन्हें तोड़ना पड़ता है, जिससे कमर में दर्द होने लगता है। इसलिए मजदूर भी इस तरह सब्जियां तोड़ने में परेशानी महसूस करते हैं।
खाद डालने के समय भी दिक्कत आती है। लताएं पूरे खेत में फैल जाती हैं, जिससे उनकी जड़ों को ढूंढना मुश्किल होता है। अगर जड़ मिल भी जाए, तो दवा डालने के बाद आसपास की पत्तियों पर उसका असर दिखाई देने लगता है।
इसके अलावा, खेत में उगी घास और खरपतवार को हटाने में भी परेशानी होती है। किसानों को डर रहता है कि कहीं सफाई करते समय सब्जियों की लताएं न कट जाएं। कई बार लताएं या पौधे कट भी जाते हैं।
जमीन पर उगी सब्जी की तुलना में ढाठ पर उगी सब्जी की पैदावार अधिक
रामदयाल साहनी बताते हैं कि जमीन पर फैली सब्जियों की तुलना में ढाठ पर उगाई गई सब्जियों की पैदावार बेहतर होती है। उनके मुताबिक, जमीन पर उगाई गई सब्जियों को एक सीजन में लगभग चार बार तोड़ा जा सकता है, जबकि ढाठ पर उगाई गई सब्जियों को पांच से छह बार तक तोड़ने का मौका मिल सकता है।
पुरानी तकनीक वाले बांस के ढाठ में ज्यादा आती है लागत
पहले किसान सब्जियों की लताओं को सहारा देने के लिए बांस से ढाठ बनाते थे। इस तकनीक में बांस का ज्यादा इस्तेमाल होता है। किसानों के मुताबिक, अब बांस महंगे मिलते हैं। एक बांस की कीमत लगभग 150 रुपये है।
पुरानी तकनीक से बने ढाठ को हर साल दोबारा बनाना पड़ता है, जिससे इसकी लागत बढ़ जाती है। बारिश या तूफान आने पर इनके गिरने का खतरा भी रहता है। अगर ढाठ गिर जाता है, तो फसल को नुकसान हो सकता है।
इस पारंपरिक ढाठ को बनाने में मुख्य रूप से बांस का इस्तेमाल किया जाता है। मजबूती के लिए थोड़ी-बहुत रस्सी बांधी जाती है और ऊपर बांस की छोटी-छोटी टहनियां रख दी जाती हैं, जिनके सहारे सब्जियों की लताएं फैलती हैं।
रामदयाल साहनी बताते हैं कि ढाठ को मजबूती से बनाया जाए, तो इसका इस्तेमाल कम से कम तीन साल तक किया जा सकता है। अगर अच्छी गुणवत्ता वाली तांत की रस्सी इस्तेमाल की जाए, तो इसे पांच साल तक भी आसानी से चलाया जा सकता है। इससे किसानों को हर साल नया ढाठ बनाने की जरूरत नहीं पड़ती और बार-बार होने वाला खर्च बचता है।
हालांकि, इस तकनीक से एक बीघा खेत में ढाठ बनाने की लागत लगभग 50 से 60 हजार रुपये आती है। इसमें तांत, रस्सी, तार और मजदूरी सहित सभी खर्च शामिल हैं।
साइकिल की दुकान छोड़कर खेती करने लगे रामदेव सहनी
रामदयाल साहनी बताते हैं कि वह लगभग 20 साल से इस तरह सब्जियों की खेती कर रहे हैं। इससे पहले वह साइकिल की दुकान चलाते थे, जो अच्छी चल रही थी। लेकिन उनके साथ काम करने वाले उनके भतीजे और दो अन्य लोगों ने काम छोड़ दिया। इसके बाद वह अकेले दुकान नहीं संभाल पा रहे थे और उन्हें नुकसान होने लगा। फिर उन्होंने दुकान छोड़कर खेती करने का फैसला किया।
उनके पास पहले से अपनी जमीन बहुत कम थी। इसलिए उन्होंने आसपास के गांवों के किसानों से जमीन पट्टे पर लेकर खेती शुरू की।
रामदेव बताते हैं कि एक सीजन में ढाठ बनाने, सब्जियां लगाने, खाद डालने और मजदूरों को मजदूरी देने तक में लगभग 70 से 80 हजार रुपये खर्च हो जाते हैं। सब्जियां बेचने से मिलने वाली आमदनी खर्च की लगभग दोगुनी हो सकती है। हालांकि, वह कहते हैं कि खेती में मुनाफा पूरी तरह किस्मत और मौसम पर भी निर्भर करता है। कई बार आमदनी लागत से दोगुनी हो जाती है, तो कभी इतना ही पैसा वापस आता है, जितना खर्च हुआ था। कई बार फसल खराब होने से पूरी लागत डूब जाती है और एक भी पैसा वापस नहीं मिलता।
रामदयाल साहनी के खेत से कई लोगों को मिलता है रोजगार
रामदयाल साहनी के खेत में काम करने वाले एक मजदूर बताते हैं कि जब से वह खेती कर रहे हैं, तब से रामदयाल के साथ काम कर रहे हैं। रामदयाल आसपास की लगभग 10 महिलाओं और चार से पांच पुरुषों को रोजाना रोजगार देते हैं।
मजदूर बताते हैं कि करीब छह साल पहले रामदयाल ने पहली बार नई तकनीक वाला ढाठ बनवाया था। इसके लिए उन्होंने समस्तीपुर जिले से कारीगर बुलवाए थे। कारीगरों ने प्रति कट्ठा एक हजार रुपये मजदूरी ली थी। इसके अलावा, उनके एक दिन के खाने-पीने की पूरी व्यवस्था भी की गई थी।
कारीगरों को ढाठ बनाते हुए देखने के बाद मजदूरों ने इस तकनीक को समझा और अगली बार खुद ही ढाठ बनाना शुरू कर दिया। अब यही मजदूर आसपास के गांवों में भी इस तकनीक से ढाठ बना रहे हैं।
मजदूरों के मुताबिक, आसपास के गांवों में भी इसी तरह सब्जियों की खेती होती है। बोचहां और गायघाट ब्लॉक में बड़ी संख्या में किसान सब्जियां उगाते हैं।
सलहा गांव की सब्जियां दूसरे राज्यों तक जाती हैं
सलहा गांव में उगाई जाने वाली सब्जियां शरीफुद्दीनपुर की सब्जी मंडी में पहुंचती हैं। वहां से इन्हें अलग-अलग मंडियों और जिलों में भेजा जाता है। यहां की सब्जियां सिर्फ बिहार के अलग-अलग जिलों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि बिहार से बाहर दूसरे राज्यों में भी भेजी जाती हैं।
गांव के दूसरे लोगों ने अपनाई ढाठ की तकनीक
मनोज सहनी की पत्नी बताती हैं कि पहले गांव में सिर्फ एक व्यक्ति सब्जियों की खेती करता था। उसे देखकर धीरे-धीरे दूसरे किसान भी सब्जियों की खेती की ओर बढ़ने लगे। आज गांव के ज्यादातर परिवार खेती पर निर्भर हैं। पहले वह खुद खेत में काम करती थीं। सब्जियां तोड़ने के साथ-साथ खेत में जमीन पर उगी घास भी हटाती थीं। धीरे-धीरे समय बदला और खेती से आमदनी होने लगी।
ढाठ तकनीक से किसानों को उम्मीद
मुजफ्फरपुर जिले के मुरौल प्रखंड के देदोल गांव के निवासी शंभू सहनी लगभग 30 साल से खेती कर रहे हैं। वह बताते हैं कि पहले वह जमीन पर सब्जियां उगाते थे, जिसमें काफी मेहनत करनी पड़ती थी। ढाठ पर खेती करने से मेहनत कम लगती है। इसमें दवा का छिड़काव करना आसान होता है और सब्जियां भी अच्छी निकलती हैं। सब्जियों पर दाग-धब्बे कम होते हैं और वे लंबी व सीधी होती हैं।
हालांकि, इस बार पहली बार उन्होंने इस तकनीक से खेती की थी और उन्हें नुकसान उठाना पड़ा। उन्होंने करेले की खेती की थी, लेकिन मौसम सही नहीं रहने और दवा का ज्यादा छिड़काव होने के कारण उनकी पूरी फसल खराब हो गई।
इसके बाद उन्होंने उसी ढाठ पर लौकी उगाई है। लौकी की फसल अच्छी है और अब उन्हें इससे मुनाफा होने की उम्मीद है।
रामदयाल साहनी का अनुभव बताता है कि नई तकनीक से खेती करने में मेहनत कम हो सकती है और सब्जियों की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है, लेकिन मौसम और फसल की देखभाल का असर पैदावार और आमदनी पर बना रहता है।
रिपोर्ट व लेखन – अप्सरा, एडिट – सुचित्रा
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