बांदा में चल रही धीरेंद्र शास्त्री (बगेश्वर) कथावाचक की यह कथा अब सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं रह गई है। भारी भीड़ के बीच हो रही इस कथा ने धीरे-धीरे राजनीतिक रंग लेना शुरू कर दिया है। कथा के दौरान दिए गए बयानों को लेकर बाहर बहस तेज़ है और सोशल मीडिया पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं।
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को लेकर इन दिनों एक नई चर्चा ज़ोर पकड़ती जा रही है। उनके बयानों और शब्दों को सुनकर यह सवाल उठने लगा है कि क्या बाबा धीरे-धीरे सिर्फ एक कथावाचक नहीं बल्कि एक राजनीतिक चेहरे के तौर पर भी उभर रहे हैं? शायद यही वजह है कि उनके बयान अक्सर तीखे होते हैं और विवादों में घिरे रहते हैं। ऐसे बयान उन्हें लगातार सुर्ख़ियों में बनाए रखते हैं। 16 जनवरी 2026 से 20 जनवरी 2026 तक उत्तर प्रदेश के बांदा में चली उनकी कथा जिसका आज अंतिम दिन है इस चर्चा की ताज़ा मिसाल बन गई है। बांदा में कथा को लेकर जो माहौल बना उसने साफ कर दिया कि बाबा अब सिर्फ मंच तक सीमित नहीं हैं बल्कि आम लोगों की बातचीत और सोशल मीडिया बहस का बड़ा विषय बन चुके हैं।
दरअसल बांदा में चल रही धीरेंद्र शास्त्री (बगेश्वर) कथावाचक की यह कथा अब सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं रह गई है। भारी भीड़ के बीच हो रही इस कथा ने धीरे-धीरे राजनीतिक रंग लेना शुरू कर दिया है। कथा के दौरान दिए गए बयानों को लेकर बाहर बहस तेज़ है और सोशल मीडिया पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। धर्म और महिलाओं को लेकर कही गई कुछ बातों ने विवाद को और गहरा कर दिया है। ऐसे में यह पूछना लाज़मी हो जाता है कि क्या मंच से कही जा रही ये बातें सिर्फ आस्था तक सीमित हैं या इसके पीछे कोई राजनीति या बड़ा मकसद भी है? बांदा की यह कथा कोई अकेली घटना नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में लगातार इस तरह की कथाओं का आयोजन हो रहा है जहां धर्म के साथ-साथ सामाजिक और राजनीतिक मुद्दे भी सामने आ रहे हैं। सवाल यह है कि क्या कथा का उद्देश्य लोगों को जोड़ना है या फिर समाज में नई लकीरें खींचना?
पंडित धीरेंद्र शास्त्री की बच्चों और जनसंख्या पर बयान
15 जनवरी 2026 को बांदा में कथा की शुरुआत कलश यात्रा से हुई। इसी के साथ 16 जनवरी को बाबा बागेश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की कथा का पहला दिन रहा। लेकिन पहले ही दिन कथा धार्मिक चर्चा से ज़्यादा विवादों की वजह से सुर्ख़ियों में आ गई। इसी दिन बाबा बागेश्वर का एक वीडियो सामने आया जिसमें वे बच्चे पैदा करने और जनसंख्या को लेकर बयान देते नज़र आए। यह बयान कथा मंच से नहीं बल्कि पत्रकारों से बातचीत के दौरान दिया गया था।
पत्रकारों के सवाल के जवाब में बाबा ने कहा कि जब तक हिंदू समाज के बच्चों को वेद नहीं पढ़ाए जाएंगे, तब तक बच्चे “नावेद और जावेद” बनते रहेंगे। इसके साथ ही उन्होंने जनसंख्या को लेकर कहा कि सरकार भले ही “बच्चे दो ही अच्छे” की बात करती हो लेकिन वे हिंदुओं से अपनी संख्या बढ़ाने की अपील करेंगे। उनका कहना था क़ि “अगर हिंदू अपनी जनसंख्या नहीं बढ़ाएंगे तो एक-एक करके हिंदू निपटाए जाएंगे और जो बांग्लादेश में हो रहा है वही भारत में होगा।” इसी तर्क के आधार पर उन्होंने कम से कम चार बच्चे पैदा करने की बात कही।
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यहीं से कई सवाल खड़े होते हैं। पहला सवाल यह कि इस तरह के बयान किसी एक धर्म विशेष को लेकर ही क्यों दिए जाते हैं? यह बात साफ़ दिखाती है कि ऐसे बयान दूसरे धर्मों के लोगों को उकसाने से ज़्यादा धार्मिक डर और असुरक्षा की भावना को बढ़ाते हैं। देश में बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए सरकार ने परिवार नियोजन के तहत “दो बच्चे” का नियम बनाया जो सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होता है। यह अलग बात है कि इसे कौन कितना मानता है लेकिन सार्वजनिक मंच से सिर्फ हिंदुओं से चार बच्चे पैदा करने की अपील करना क्या सही है? क्या इससे समाज में धार्मिक तनाव और गहराने का खतरा नहीं बढ़ता?
दूसरा और उतना ही अहम सवाल महिलाओं को लेकर है। जब भी बच्चों की संख्या की बात होती है तो ज़िम्मेदारी सीधे महिलाओं पर डाल दी जाती है। क्या महिलाएं सिर्फ बच्चा पैदा करने की मशीन हैं? बच्चों को जन्म देना, पालना और उनकी परवरिश करना ये सब शारीरिक और मानसिक रूप से महिलाओं पर असर डालता है लेकिन ऐसे बयानों में महिलाओं की सेहत उनकी इच्छा और उनके अधिकारों की कोई बात नहीं होती। जनसंख्या बढ़ाने या घटाने की चर्चा में पुरुषों की भूमिका और महिलाओं की सहमति पर सवाल क्यों नहीं उठते?
हिंदू राष्ट्र बनाने का ऐलान
बांदा में बाबा बागेश्वर की कथा का दूसरा दिन भी पहले दिन की तरह ही विवादों में घिरा रहा। कथा के साथ-साथ मंच एक तरह से राजनीतिक दरबार में बदलता दिखाई दिया। बाबा बागेश्वर हिंदू धर्म के प्रचार पर ज़ोर देते नज़र आए और इसी क्रम में दूसरे धर्मों को लेकर भी बयान दिए। उन्होंने कहा कि लोगों को यह समझना चाहिए कि “दुनिया का सबसे प्राचीन धर्म सनातन धर्म है। इसके बाद उन्होंने अलग-अलग देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि दुनिया में 65 से ज़्यादा देश इस्लामिक हैं, 95 से ज़्यादा देश ईसाई हैं, एक देश यहूदियों का है और एक देश बौद्धों का, तो कम से कम भारत को हिंदू राष्ट्र बना देना चाहिए।”
यहीं से एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। भारत की पहचान हमेशा से विविधता और आपसी सह-अस्तित्व रही है। यह देश इसलिए जाना जाता है कि यहां अलग-अलग धर्म, जाति और भाषाओं के लोग साथ रहते हैं। भारत किसी एक धर्म से नहीं बल्कि संविधान से चलता है जहां सबको बराबरी का हक़ मिला है। ऐसे में सार्वजनिक मंच से खुले तौर पर भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की बात कहना क्या इस संविधानिक सोच से टकराता नहीं है?
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इस तरह के बयानों से यह भी सवाल उठता है कि क्या धार्मिक मंचों का इस्तेमाल अब धर्म से ज़्यादा राजनीतिक सोच फैलाने के लिए किया जा रहा है। आस्था के नाम पर जब किसी एक धर्म को बाकी सब से ऊपर रखने की बात होती है तो क्या यह समाज को जोड़ने का काम करती है या नई दरारें पैदा करती है? इसी के साथ बाबा बागेशवर ने “भारत हिंदू राष्ट्र बनेगा यह संकल्प हमारा है” का भजन भी गाते हुए दिखे।
“पूरी दुनिया में नारी की पूजा नहीं की जाती” धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री
बांदा में कथा के दौरान बाबा बागेश्वर ने यह भी कहा कि पूरी दुनिया में कहीं भी स्त्रियों की पूजा नहीं होती जबकि सनातन धर्म में नारी को पूज्य माना गया है। उन्होंने दावा किया कि दूसरे मज़हबों में स्त्रियों को भोग की वस्तु समझा गया जबकि सनातन परंपरा में नारी को देवी का दर्जा मिला है और इसी बात पर उन्हें गर्व है लेकिन इस बयान के बाद एक ज़रूरी सवाल खड़ा होता है। अगर इस देश में सच में महिलाओं को पूजा जाता है तो फिर हर घंटे किसी न किसी महिला या बच्ची के साथ बलात्कार की ख़बरें क्यों सामने आती हैं? अयोध्या जैसे मंदिर में भी एक लड़की का बलात्कार कर दिया।
देश में हालात यह हैं कि न आठ महीने की बच्ची सुरक्षित है और न ही सत्तर साल की बुज़ुर्ग महिला। यौन हिंसा, घरेलू हिंसा और महिलाओं पर होने वाले अत्याचार के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। हर तीसरे घर में महिलाएं किसी न किसी तरह की हिंसा झेल रही हैं कई बार हालात इतने खराब हो जाते हैं कि उन्हें आत्महत्या तक का रास्ता चुनना पड़ता है। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि किताबों या कथाओं में महिलाओं को क्या कहा गया है सवाल यह है कि समाज में महिलाओं के साथ व्यवहार कैसा है। अगर नारी सच में पूज्य है, तो फिर सुरक्षा, सम्मान और बराबरी क्यों आज भी एक संघर्ष बना हुआ है?
शिक्षा पर बयान
पत्रकारों से बातचीत के दौरान एक पत्रकार ने बाबा बागेश्वर से सवाल किया कि बांदा और आसपास के जिलों से बड़ी संख्या में युवा पलायन कर रहे हैं ऐसे में क्या वे अपनी कथा या दिव्य दरबार के माध्यम से सरकार और युवाओं को कोई संदेश देना चाहते हैं? इस सवाल के जवाब में बाबा बागेश्वर ने कहा कि कथा पांच दिनों की है और दिव्य दरबार एक दिन का लेकिन देश के लिए उनका संदेश साफ़ है। उन्होंने कहा कि देश में हिंदू-मुसलमान या जातिवाद फैलाने के बजाय नेताओं को देश और युवाओं के भविष्य के बारे में सोचना चाहिए। चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी को मिलकर बेरोज़गारी जैसे बड़े मुद्दे पर काम करना चाहिए। बाबा ने बेरोज़गारी को देश की सबसे बड़ी समस्या बताया और कहा कि इसे खत्म करने के लिए सरकार और समाज दोनों को कदम उठाने होंगे।
बाबा बागेश्वर ने शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि देश में शराब सस्ती है और दवाइयां महंगी शिक्षा इतनी कठिन हो गई है कि आम आदमी के बच्चे पीछे छूट जाते हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि हर नेता के लिए अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाना अनिवार्य होना चाहिए तभी सरकारी शिक्षा की हालत सुधरेगी। उनका कहना था कि नेताओं के बच्चे अच्छे हॉस्टल और स्कूलों में पढ़ते हैं जबकि आम लोगों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़कर जैसे-तैसे आगे बढ़ते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा नीति में सुधार ज़रूरी है लेकिन यह काम सिर्फ सरकार का नहीं है समाज को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।
दिव्य दरबार, आस्था और अंधविश्वास के बीच सवाल
18 जनवरी 2026 को कथा के दौरान दिव्य दरबार का आयोजन भी किया गया। इस कार्यक्रम में बाबा बागेश्वर द्वारा एक चिट्ठी निकाली जाती है जिसमें कुछ लोगों के नाम होते हैं और उसी के आधार पर उनके भविष्य और समस्याओं के बारे में बताया जाता है। हालात यह हैं कि पेट दर्द जैसी आम बीमारियों के लिए भी लोग डॉक्टर के पास जाने के बजाय बाबा के दरबार में पहुंच रहे हैं। कई बाबाओं पर अंधविश्वास फैलाने के आरोप पहले भी लगते रहे हैं इसके बावजूद बांदा में बड़ी संख्या में लोग घंटों लाइन में खड़े नज़र आए। इस आयोजन को लेकर कार्यक्रम के संयोजक और भाजपा नेता प्रवीण सिंह का कहना है कि कथा से रोज़गार पैदा हो रहा है और धर्म के ज़रिए लोगों को कमाई का मौका मिल रहा है। उनके मुताबिक कथा स्थल के आसपास लोगों ने दुकानें लगा रखी हैं फूल, नारियल और अन्य पूजा सामग्री बिक रही है लेकिन सवाल यह है कि क्या इसे स्थायी या टिकाऊ रोज़गार कहा जा सकता है? पांच दिन की कथा के बाद ये दुकानें और ये आमदनी कहां जाएगी इस पर कोई जवाब नहीं है।
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लोगों से बात – चीत
कथा स्थल पर खबर लहरिया की टीम ने ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान वहां मौजूद लोगों से बातचीत की। विश्व हिंदू महासंघ के प्रदेश मंत्री रमेश सिंह सोनी ने दावा किया कि यह कार्यक्रम बाबा का नहीं बल्कि संघ का आयोजन था और पंडित धीरेंद्र शास्त्री इसमें मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे। उनके अनुसार कथा में हिंदू एकता पर ज़ोर दिया गया जिसे वे ज़रूरी मानते हैं। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज आज भी ब्राह्मण, दलित और छत्रिय जैसी जातिगत पहचानों में बंटा हुआ है जबकि दूसरे धर्मों के लोग खुद को एक कौम के रूप में देखते हैं। ऐसे में उनका तर्क है कि हिंदुओं को भी एकजुट होकर अपनी पहचान मजबूत करनी चाहिए।
हालांकि हिंदू समाज में जाति और वर्ग की यह संरचना कोई नई नहीं है बल्कि धार्मिक ग्रंथों में ही वर्ण व्यवस्था का ज़िक्र मिलता है जहां समाज को चार वर्गों में बांटने की बात कही गई है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब धार्मिक ग्रंथों में ही यह विभाजन मौजूद रहा है तो आज हिंदू समाज में जातिगत बंटवारे के लिए केवल सामाजिक व्यवहार को ज़िम्मेदार ठहराना कितना सही है। यह बहस हिंदू एकता की बात के साथ-साथ उस ऐतिहासिक ढांचे पर भी सवाल खड़े करती है जिसने समाज को सदियों से अलग-अलग वर्गों में बांट कर रखा है। बातचीत में ज़्यादातर लोग बागेश्वर की कथा और उनके बयानों से सहमति जताते नज़र आए। मौके पर मौजूद सक्षम गुप्ता ने कहा, “हमारा सौभाग्य है कि हमारी धरती पर आकर बाबा ने हमें सौभाग्य की बात बताई।”
तीसरे दिन दिव्य दरबार और कन्या विवाह की घोषणा
18 जनवरी 2026 को कथा के तीसरे दिन बाबा बागेश्वर की कथा के दौरान दिव्य दरबार का आयोजन किया गया। इस मौके पर कथा स्थल से यह जानकारी भी दी गई कि 15 फरवरी 2026 को बागेश्वर धाम में सामूहिक कन्या विवाह का आयोजन किया जाएगा। बताया गया कि कथा और इससे जुड़े आयोजनों में मिलने वाले दान से करीब 300 कन्याओं का विवाह कराया जाएगा।
दिव्य दरबार के दौरान कथा स्थल पर एक अलग दृश्य भी देखने को मिला। कई युवक और युवतियां विवाह के कपड़ों में पंडाल के नीचे मौजूद दिखाई दिए। हालांकि यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि उनकी शादी उसी स्थल पर कराई जा रही थी या वे किसी अन्य कार्यक्रम के लिए वहां मौजूद थे। आयोजन को लेकर मंच से की गई घोषणाओं और पंडाल में दिखे इन जोड़ों ने कथा के तीसरे दिन को चर्चा में ला दिया।
आज कथा का समापन
आज बांदा में बाबा बागेश्वर की इस पांच दिनों की कथा का अंतिम दिन है। इन पांच दिनों में यह कथा सिर्फ धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रही बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और वैचारिक बहस का विषय बन गई। बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी यह दिखाती है कि बाबा का प्रभाव आम जनता के बीच गहरा है और उनकी बातों को समर्थन भी मिल रहा है। साथ ही बच्चों, महिलाओं, जनसंख्या, रोज़गार और हिंदू एकता जैसे मुद्दों पर दिए गए बयानों ने कई सवाल भी खड़े किए।
कथा के दौरान आस्था, उम्मीद और सामाजिक सरोकारों की बातें सामने आईं तो वहीं कुछ बयानों को लेकर असहमति और चिंता भी दिखी। यह कथा एक ओर लोगों के विश्वास और भावनाओं को जोड़ती नज़र आई दूसरी ओर इसने यह सोचने पर भी मजबूर किया कि धार्मिक मंचों से कही गई बातों का समाज पर क्या असर पड़ता है। कथा का मंच आज भले ही शांत हो जाए लेकिन इन पांच दिनों में उठे सवाल और चर्चाएं आगे भी बनी रहने की संभावना है।
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