खबर लहरिया Hindi “जंगल के बिना हम अधूरे हो गए”  सुमन का अपना अनुभव 

“जंगल के बिना हम अधूरे हो गए”  सुमन का अपना अनुभव 

सुमन जो जिसका बचपन जंगलों के आसपास और जंगलों से साथ बीती। पर गांव में विस्थापन के बाद सब कुछ बदल गया। सुमन जंगल से जुड़ी अपनी उन्ही सारी अनुभवों को याद करती है। 

जंगल और उसके बीच कच्चा रास्ता (फोटो साभार: सुमन)

मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के मझौली गांव की सुमन गौड़ अपने पुराने गांव और जंगल से जुड़ी यादों को साझा करती हैं। कैसे जंगल उनके परिवार की जरूरतों को पूरा करता था और गांव के लोगों के एक साथ मिलने-जुलने की जगह भी था। लेकिन गांव के विस्थापन के बाद उनकी जिंदगी बदल गई। आज भी उन्हें अपने पुराने घर, पेड़ों और जंगल की याद आती है। सुमन के लिए जंगल से दूर होना अपने जीवन के एक हिस्से को पीछे छोड़ देने जैसा है।

याद करते हुए कहती है हमारा पुराना गांव जंगल के बहुत करीब था। जंगल हमारे लिए सिर्फ पेड़-पौधों की जगह नहीं था हमारा जीवन वहीं से चलता था। गांव में कई लोग खेती नहीं करते थे। जंगल से हमें बहुत कुछ मिल जाता था। महुआ बेचकर गेहूं खरीद लेते थे, चरवा से चावल, गुली से तेल और तेंदूपत्ता बेचकर पैसे मिल जाते थे। खाना बनाने के लिए लकड़ी भी जंगल से ही आती थी।

तब हमें बहुत ज्यादा चिंता नहीं करनी पड़ती थी। जंगल था तो लगता था कि जीवन चल जाएगा।

मुझे आज भी जंगल में खड़ा वह इमली का पेड़ याद है। वह हमारे गांव से करीब छह-सात किलोमीटर दूर था। गांव के बड़े-बुजुर्ग वहां जाते थे। जंगल में हमारे देवी-देवताओं के स्थान भी थे। पूजा के लिए गांव के सभी लोग साथ जाते थे बच्चे, बड़े, बुजुर्ग, महिलाएं और पुरुष। वहां पूरा माहौल किसी पिकनिक जैसा लगता था। सब लोग साथ रहते, खाना बनाते और दिन बिताते थे। वह समय आज भी मुझे याद आता है।

हमारे पुराने घर के आंगन में भी एक बहुत बड़ा पेड़ था। उसकी छाया आंगन से लेकर बाहर सड़क तक रहती थी। वह पेड़ हमारे परिवार और पूरे मोहल्ले की जिंदगी का हिस्सा था। उसमें हम बच्चे झूला डालते थे। महिलाएं और पुरुष उसकी छांव में बैठते थे और बच्चे वहीं खेलते थे।

कभी कोई सामान बेचने वाला गांव में आता तो उसी पेड़ के नीचे रुकता था। मोहल्ले की महिलाएं वहां इकट्ठा होकर सामान खरीदती थीं। उस पेड़ के नीचे हमारा पूरा मोहल्ला जैसे एक साथ बैठता था। उस पेड़ का नाम चंदन और जंगल जलेबी था।

सब कुछ सही चल रहा था फिर अचानक गांव का विस्थापन हो गया है। विस्थापन के बाद सबसे बड़ा बदलाव हमारी खेती और रोज़मर्रा की जिंदगी में आया। अब पहले जैसा जंगल हमारे आसपास नहीं है। अब अक्सर मन में यही सवाल आता है क्या करेंगे, कहां जाएंगे और क्या खाएंगे?

हमें जंगल से दूर रहना अच्छा नहीं लगता। वहां के पेड़, पशु-पक्षी और जानवर बहुत याद आते हैं। जंगल हमारे लिए सिर्फ कमाई या जरूरत की जगह नहीं था। वहां हमारी यादें थीं, हमारे देवी-देवता थे, हमारे पेड़ थे और हमारा साथ था।

आज भी जब मैं जंगल की तरफ जाती हूं तो पुराना गांव याद आता है। मुझे लगता है जैसे उस जंगल में मेरा एक हिस्सा अब भी रह गया है। अगर मुझे आज अपने पुराने गांव में वापस जाने का मौका मिले तो सबसे पहले मैं अपना पुराना घर देखना चाहूंगी। फिर उस पेड़ को देखना चाहूंगी, जिसकी छांव में हमारा बचपन बीता था।

चम्बल एकेडमी फेलो – सुमन / लेखन 

एडिट – रचना 

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