खबर लहरिया Blog खुद को पहचानने की कश्मकश एक प्यार ऐसा भी! क्या छोटे शहरों में कबूल होगा ये प्यार?

खुद को पहचानने की कश्मकश एक प्यार ऐसा भी! क्या छोटे शहरों में कबूल होगा ये प्यार?

‘लगातार शादी के दबाव से परेशान हो कर दीपक ने  एक दिन अपनी माँ से कहा कि मुझे लड़कियों में कोई रूचि नहीं है। आप जानना चाहेंगे कि इसके बदले में मेरी माँ ने क्या मुझे करारा जवाब दिया? उन्होंने कहा फिर तुम्हें लड़के क्यों पसंद हैं?’

दीपक ने हल्के से हंसते हुए कहा कि जब उसने अपनी माँ को बताया कि वह विचित्र है तब यह बताने का प्रयास किस तरह असफल रहा। परन्तु उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद के नज़दीक जगतपुरा गाँव में उसने स्वयं को समझने एवं स्वीकारने के बारे में बताया।

उसने बताया कि उसे ख़ुद को बेहतर तरीक़े से समझने में इलाहाबाद स्थित ‘इलाहबाद क्वियर सोलिडैरिटी प्रतिरोधक गठबंधन और आरएक्यूएस, कलाकार-एक्टिविस्ट समूह जो एलजीबीटी समुदाय के लिंग संबंधी, लैंगिकता और मानसिक स्वास्थ्य पर काम करता है ने मदद की।

दीपक ने बचपन का अधिकतर समय अपनी नानी के घर जगतपुरा में बिताया। वह ऐसा घर था जहाँ सिर्फ महिलाएं ही घर में थीं और उसके आसपास भी सभी हमउम्र बच्चों में सिर्फ लड़कियाँ थीं। दीपक बताता है कि ‘बचपन से मैने ख़ुद को लड़कियों जैसा ही अधिक पाया।’

दीपक जब अपने पिता के घर लौटा तब भी उसमें वहीं भावनाएं रहीं। यहाँ तक कि उसने अपने व्यवहार का विश्लेषण किया तब पाया कि ‘जब मैं बड़ा हुआ तब मैने महसूस किया कि मुझे लड़कों की ओर देखना पसंद आता है जैसे लड़कों को लड़कियों की ओर देखना पसंद आता है।’ उसने बताया ‘कक्षा 12 में पढ़ने वाला मेरा एक गहरा मित्र था। हम दोनों एक-दूसरे की परवाह किया करते थे। हमने एक-दूसरे को गले लगाया और कभी-कभी चूमा भी। यह मेरे साथ पहली बार था मगर मैंने इसे स्वीकार नहीं किया और यहाँ तक कि मैं समझ भी नहीं सका कि मैं कैसा महसूस कर रहा था।’

उसकी आवाज़ थोड़ी हकलाई।

भारत के स्कूल एजुकेशन सिस्टम में सैक्स एजूकेशन का कोई विकल्प नहीं है फिर भी बायलोजी कक्षा की पढ़ाई ने स्वंय को समझने की यात्रा में मेरी थोड़ी मदद की। ‘प्रजनन (रिप्रोडक्शन) के अध्याय में समलैंगिकता पर बहुत छोटा सा अंश था।’ उसने याद करते हुए कहा ‘इसमें बहुत छोटी और सांकेतिक सामग्री थी मगर इसे पढ़ने के बाद मैने इस पर गंभीरता से सोचा। यह पहली बार था जब मुझे लगा कि शायद कहीं इस बारे में कुछ सामग्री हो जिससे मैं अपने आप को बेहतर समझ सकूं। जो मुझे समझा सके कि मैं कौन हूँ। यह विचार आते ही इस विषय में ओर अधिक जानने की जिज्ञासा मेरे अंदर पैदा हो गई।’

दीपक जब अपने माता-पिता के घर से इलाहाबाद रहने के लिए आया तब उसके पास फोन था। इसका मतलब यह हुआ कि वह इंटरनेट से जुडा हुआ था जहाँ वह इस मुद्दे पर आगे के लिए जानकारी जुटा रहा था। ‘अपने पूरे जीवन में मैं अपने आप से सवाल करता था कि यह मेरे साथ ही क्यों हुआ? मैं ऐसा क्यों हूँ? और आख़िरकार मैने जाना कि ऐसा मैं अकेला नहीं हूँ।’

आख़िरकार दीपक की खोज उसे आरएक्यूएस तक ले आई और उसने जाना कि कि ट्रांसजेंड़र का मतलब क्या होता है। उसने बताया कि ‘मैं नहीं जानता था कि ट्रांसजेंडर कौन होते हैं। मैं समझता था कि वे सिर्फ किन्नर या थर्ड जेंडर होते हैं। यह समाज में एक तरह की गाली है।’

आरएक्यूएस के संस्थापक तोशी और धर्मेश ने दीपक को बताया कि ‘ट्रांसजेंड़र’ का अर्थ व्यापक है। दीपक ने बताया कि ‘उन्होंने मुझे इस विषय की गहरी जानकारी दी जिससे मैं अपने आपको बेहतर शब्दों से पहचान सका।’ वह कहता है कि ‘अगर मैं एक लड़की हूँ जो लड़के के शरीर में क़ैद हूँ तो मैं एक ट्रांसजेंडर हूँ। आख़िरकार मैं समझ सका कि मैं कौन हूँ और अब मुझे इस बात को स्वीकार करने में कोई परेशानी नहीं है।’

धर्मेश और तोशी ने चार साल पहले इलाहाबाद में एलजीबीटी समुदाय के लोगों के लिए एक सुरक्षित मंच के तौर पर आरएक्यूएस की स्थापना की। तोशी ने बताया ‘मैने महसूस किया कि हमारे बारे में और हमारी लैंगिकता के बारे में स्वतंत्रता पूर्वक बात करने के लिए इससे पहले कोई मंच नहीं था।’

यह दीपक जैसे लोगों के लिए एक रहस्य को जानने जैसा था। ‘लोग मुझे कहते थे कि मैं एक पुरुष हूँ इसीलिए मुझे ख़ास तरीक़े से व्यवहार नहीं करना चाहिए या अलग तरह से हाथ नहीं हिलाने चाहिएं और अलग तरह से बात नहीं करनी चाहिए। मुझे बहुत सारे कमेंट्स मिलते हैं कि मैं कैसे लड़कियों की तरह नाचता हूँ। इस तरह की फब्तियों से तंग आ कर मैने नाचना ही छोड़ दिया जबकि नृत्य करना मुझे बहुत पसंद है।’

वह कहता है, ‘अब मैं जानता हूँ कि लोग जिस तरह की भद्दी टिप्पणियाँ करते हैं उनसे कैसे निपटना है। अब उनकी कही बातें मुझे परेशान नहीं करतीं। यहाँ तक कि मेरी माँ ने भी मुझे हिजड़ा होने की गाली दी। हाँ जब आपकी अपनी माँ इस तरह की बात कहती हैं…. यक़ीनन बुरा लगता है।’

 

आरएक्यूएस की ओर से मिलने वाले सहयोग और समर्थन के कारण दीपक कहता है कि वह अपने जीवन में ईमानदारी और साहस का वसीयतनामा छोड़ कर जाएगा। वह मुस्कुराते हुए कहता है, ‘आरएक्यूएस ने मुझे मेरी पहचान की ताक़त दी है।’

वह कहता है कि मेरी बूआ मेरी शुभचिंतक और मित्र हैं। उन पर मुझे पूरा विश्वास है। वे जजमेंटल नहीं हैं और वे हर हाल में साथ देती हैं। एक बार जब वह घर में था और देर रात किसी मित्र से फोन पर बात कर रहा था, उसके फोन को किसी लड़की के साथ रोमांस के तरह समझ लिया गया था। ऐसे समय में उसकी बूआ ने उस वाक़ये को अफवाह बनने से बचाया।

दीपक ने बताया ‘मेरी बूआ ने मेरी माँ को बताया कि मुझे लड़कियों में कोई रूचि नहीं है। मुझे लगता है कि मेरी मां को उस समय बहुत बुरा लगा क्योंकि उन्होंने बाहर के किसी व्यक्ति से ऐसा पहली बार सुना था।’
उसने तुरंत अपनी माँ का बचाव करते हुए कहा ‘मैं फिर भी थोड़ा-बहुत जानता हूँ दुनिया के बारे में पर वो कुछ नहीं जानतीं। मैं उन्हें ऐसा कुछ नहीं कहूँगा जिससे उन्हें दुख हो इसीलिए मैं उनको कुछ नहीं बताऊंगा।’

भारतीय समाज होमोफोबिया के लिए आक्रामक है और ऐसी सिनेमा में पेश की गई छवि की वजह से और ज्यादा हो रहा है। इंडियन पीनल एक्ट की धारा 377 के अंतर्गत 150 वर्ष पहले सेक्स एक्टिविटी को ‘प्रकृति के नियम के विरुद्ध’ कहा गया था, उसे हाल ही में हटाया गया।

धारा 377 के कारण दर्शकों तक एलजीबीटी समुदाय के लोगों पर पुलिस और प्रशासन अपहरण एवं बलात्कार जैसे आरोप लगा कर उन्हें परेशान करता रहा। यहाँ तक कि किसी पुरुष के पूर्व में रह चुके पार्टनर द्वारा किया गया बलात्कार भी अनरिपोर्टेड़ रहता था।

पूर्व में बने कानून के हटाए जाने से पहले इस तरह के केस में अभियुक्त सिर्फ लीगल सलाह ले सकते थे। वे समाज में खुले तौर पर इस तरह के केस नहीं लड़ पाते थे। यदि इस तरह का कोई केस कोर्ट में आ भी जाता था तब भी वह ‘गुमनाम’ ही रहता था। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर धारा 377 को असंवैधानिक घोषित कर के हटाया गया। इससे एक दो लिंग के वयस्कों के साथ को सामाजिक कलंक के तौर पर देखा जाना ग़लत माना जाएगा।

इसके बावजूद सामाजिक कलंक एक अलग ही कहानी है। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के एक विद्यार्थी किशन मौर्य ने बताया कि किस तरह एक विचित्र पहचान रखने वाले ‘कपल’ को उनकी सैक्चुअल पहचान की वजह से घर देने से मना कर दिया गया। ‘मकान मालिक ने कहा कि यदि सुप्रीम कोर्ट ने कोई अजब कानून पास कर दिया है तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट से ही कमरा माँगना चाहिए।’

एलजीबीटी समुदाय के प्रति समाज में तिरस्कार का माहौल वर्षों से अनेक स्तर पर रहा है। इसमें महिलाओं को लेस्बियन या क्विर (विचित्र) के तौर पर कैसे देखा जाता है, यह भी शामिल है। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की छात्रा नेहा कहती हैं, ‘समाज इसे कुप्रथा कहता है। यह वर्षों पुरानी मानसिकता है जो रातों-रात बदल नहीं सकती। यह हमारी जिम्मेदारी है। हमारी पीढ़ी का उत्तरदायित्व है कि हम हर प्रकार के लोगों को स्वीकारें, उन्हें सम्मान दें। हमें एलजीबीटी समुदाय के लोगों के लिए लड़ाई लड़नी होगी। अपने समाज की छोटी मानसिकता को दूर करने के लिए उन लोगों को हर तरह के उत्तरदायित्व और काम देने होंगे।’

सत्यम राज संघर्ष जो इसी युनिवर्सिटी से पढ़े हैं उन्होंने समीक्षा करते हुए बताया कि एलजीबीटी समुदाय के प्रति समाज के व्यवहार को पाखंड कहा। वे कहते हैं की ‘सनातन धर्म में अर्द्धनारीश्वर को हम पूजते हैं परन्तु वास्तव में यदि कोई उसी तरह का व्यक्ति दिख जाता है तब हम उसका मज़ाक उड़ाते हैं। वह कहते हैं, ‘ कानून बदल गए हैं परन्तु हमारी मानसिकता नहीं बदली।’

अब दीपक के चेहरे पर मुस्कान है। वह कहता है, ‘मेरे पास सही शब्द भी नहीं है जिससे मैं बता सकूं कि जब मैने जाना कि मैं क्या हूँ, उस समय मुझे कैसा लगा। मुझे लगता है कि इस जानकारी से पहले मुझे लगता था कि मैं अंधेरे में था।

 

वैलेंटाइन्स के इस मौसम में एक प्यार ऐसा भी | भाग 1 | Valentines Special