खबर लहरिया Hindi नेपाल की बाढ़ से दक्षिण एशिया क्या सीख सकता है

नेपाल की बाढ़ से दक्षिण एशिया क्या सीख सकता है

“नदियों के किनारे कोई नया निर्माण करने से पहले सरकारों को यह देखना चाहिए कि वह जगह कितनी सुरक्षित है। इससे आपदा के खतरे को कम किया जा सकता है,” डॉ. इरफान राशिद ने कहा।

जलवायु परिवर्तन एवं पर्यावरण
रिफ़त मोहिउद्दीन | 14 सितंबर, 2026

Rescue efforts in Rasuwa. Photo: X/Nepal PMO

Rescue efforts in Rasuwa. Photo: X/Nepal PMO

26 अगस्त को हिमालय में बर्फ और चट्टानों का एक बड़ा हिस्सा पहाड़ से नीचे आ गिरा। इसके बाद नेपाल में भयानक बाढ़ आई और बहुत लोगों की जान गई। रिपोर्टों के मुताबिक, 1,300 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई और 5,000 से ज़्यादा लोग अभी भी लापता हैं। इस घटना ने दिखाया कि हिमालय के बर्फीले पहाड़ों में कितने बड़े खतरे छिपे हुए हैं।

एशियन डिस्पैच की रिफ़त मोहिउद्दीन ने कश्मीर विश्वविद्यालय के डॉ. इरफान राशिद से बात की। वह जियोइनफॉर्मेटिक्स यानी उपग्रह और दूसरी तकनीकों की मदद से धरती और उसके बदलावों का अध्ययन करते हैं। वह कश्मीर विश्वविद्यालय के जियोइनफॉर्मेटिक्स विभाग के प्रमुख हैं।

बातचीत का मकसद यह समझना था कि नेपाल में क्या हुआ और दक्षिण एशिया की सरकारें ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए पहले से क्या तैयारी कर सकती हैं।

बातचीत को छोटा करके यहाँ दिया गया है:

सवाल: नेपाल में क्या हुआ? उपग्रह की तस्वीरों से हिमालय के दूसरे इलाकों के बारे में आपको क्या पता चला?

नेपाल में जो हुआ, वह झील के फटने से आई बाढ़ (GLOF) नहीं थी। वैज्ञानिक इसे “रॉक-आइस एवलांच” कहते हैं। यानी पहाड़ से चट्टान और बर्फ का एक बड़ा हिस्सा नीचे आ गिरा।

हमने भारत के कश्मीर समेत पूरे हिमालय में कई झीलों का नक्शा बनाया है। हमने यह पता लगाने की कोशिश की है कि इनमें से कौन सी झीलें ज़्यादा खतरे वाली हैं। कश्मीर में ऐसी पाँच झीलें मिली हैं, जहाँ GLOF का खतरा सबसे ज़्यादा है।

लेकिन किसी झील को “खतरनाक” कहने का मतलब यह नहीं है कि वह अभी फटने वाली है। इसका मतलब है कि कुछ खास परिस्थितियों में वह झील फट सकती है।

An old image of a dry landslide in Tuinkhola, Nepal. Photo: Wikimedia Commons/Screenshot

An old image of a dry landslide in Tuinkhola, Nepal. Photo: Wikimedia Commons/Screenshot

उदाहरण के लिए, अगर जम्मू-कश्मीर की चिरसर झील में कोई बड़ी चट्टान या बर्फ गिरती है, तो उससे झील में बहुत बड़ी लहर उठ सकती है। यह लहर झील को रोकने वाली मिट्टी और पत्थरों की दीवार को तोड़ सकती है। इसके अलावा तेज़ बारिश, जमीन के अंदर जमी बर्फ का पिघलना, पहाड़ की ढलान कितनी मजबूत है और झील को रोकने वाली दीवार कितनी मजबूत है, ये सभी चीज़ें खतरे को बढ़ा सकती हैं।

GLOF और रॉक-आइस एवलांच को अलग-अलग समझना ज़रूरी है। नेपाल में जो हुआ, वह रॉक-आइस एवलांच था। ऐसा शायद पहाड़ के अंदर की चट्टानों के कमजोर होने की वजह से हुआ। हिमालय में ऐसी घटनाएँ पहले भी हुई हैं, लेकिन नेपाल में हुई यह घटना बहुत बड़ी थी।

सवाल: सिंधु, ब्रह्मपुत्र और मेकांग जैसी नदियाँ एक देश से निकलकर दूसरे देशों तक जाती हैं। जब पहाड़ों में कोई ग्लेशियर या चट्टान टूटती है, तो नीचे रहने वाले लोगों के लिए खतरा कैसे बढ़ जाता है?

2021 में चमोली में जो हुआ था और अब नेपाल में जो हुआ, दोनों घटनाओं का असर एक से दूसरे इलाके और देश तक पहुँचा। ऐसी घटनाएँ बहुत तेज़ी से होती हैं। इसलिए नीचे रहने वाले लोगों को समय रहते चेतावनी देना मुश्किल हो जाता है।

अगर कोई गाँव घटना वाली जगह से 200 किलोमीटर दूर है, तो हो सकता है कि लोगों को कुछ समय पहले चेतावनी मिल जाए। लेकिन नेपाल में गाँव सिर्फ़ 15 किलोमीटर दूर था। वहाँ लोगों को चेतावनी देने के लिए कोई अलार्म ही नहीं बजा।

इसलिए, चाहे घटना एक देश में हो या उसका असर कई देशों तक पहुँचे, हमें ऐसी चेतावनी व्यवस्था चाहिए जिससे लोगों को सुरक्षित जगह जाने का समय मिल सके और जान बचाई जा सके।

अगर कोई घर नदी से सिर्फ़ 50-100 मीटर दूर है, तो वहाँ खतरा बहुत ज़्यादा है। लेकिन अगर घर नदी से 250 मीटर दूर है, तो लोगों और घर दोनों के बचने की संभावना ज़्यादा होती है।

सवाल: उपग्रह की तस्वीरों से कैसे पता लगाया जा सकता है कि ज़रूरी इमारतें बाढ़ के रास्ते के कितने पास बनी हैं?

यह पता लगाने के लिए कि कोई बस्ती या इमारत खतरनाक जगह पर बनाई जा रही है, बहुत जटिल जानकारी की ज़रूरत नहीं है। उपग्रह से मिले डेटा से यह आसानी से पता लगाया जा सकता है।

हम देख सकते हैं कि नदी के किनारे कौन सी जगहें खतरनाक हैं। चीन, भारत, नेपाल, भूटान, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान जैसी सरकारें इन जगहों पर एक “सुरक्षित दूरी” तय कर सकती हैं। इस दूरी के अंदर नया निर्माण करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए।

सवाल: जमीन के अंदर जमी परत यानी पर्माफ्रॉस्ट पिघलने से पहाड़ की ढलान कैसे कमजोर होती है? क्या उपग्रह यह पता लगा सकता है कि पहाड़ गिरने से पहले उसमें कुछ बदलाव हो रहा है?

हाँ। उपग्रह यह पता लगाने में मदद कर सकते हैं कि जमीन में कहाँ और कितना बदलाव हो रहा है।

एक खास तकनीक है, इंटरफेरोमेट्रिक SAR। इसकी मदद से जमीन में होने वाली बहुत छोटी हलचल का भी पता लगाया जा सकता है। इसमें कुछ बदलाव मिलीमीटर के स्तर तक पकड़े जा सकते हैं।

अगर किसी जगह की जमीन धीरे-धीरे कमजोर हो रही है और सरकारें लगातार उपग्रह से मिलने वाले डेटा को देखती रहें, तो उन्हें पहले से पता चल सकता है कि कहाँ खतरा बढ़ रहा है।

सवाल: इस नुकसान के लिए इंसानी गतिविधियाँ कितनी जिम्मेदार हैं और मौसम या जलवायु का कितना असर है?

अगर आप पश्चिमी हिमालय, भूटान या नेपाल जैसे इलाकों को देखें, तो पिछले कुछ वर्षों में वहाँ बहुत निर्माण हुआ है। इनमें से काफी निर्माण नदियों के किनारे हुआ है।

इससे बहुत से लोग खतरे में आ गए हैं, क्योंकि ऐसी जगहों पर बाढ़ या पहाड़ से मलबा आने पर लोगों को बचने के लिए बहुत कम समय मिलता है।

View of the Himalayan range from Kalinchowk in Nepal. Photo: Wikimedia Commons/Screenshot

View of the Himalayan range from Kalinchowk in Nepal. Photo: Wikimedia Commons/Screenshot

सरकारें इलाकों को खतरे के हिसाब से अलग-अलग हिस्सों में बाँट सकती हैं, जैसे “बहुत खतरनाक”, “कम खतरनाक” और “कम जोखिम वाला”। इसके बाद यह तय किया जा सकता है कि किन जगहों पर लोगों को बसने या नया निर्माण करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

यह पहला कदम होना चाहिए।

सवाल: क्या एशिया के नेताओं को आपदा के बाद मदद करने के बजाय, आपदा आने से पहले ही तैयारी करनी चाहिए?

इसके लिए दक्षिण एशिया की सभी सरकारों को मिलकर काम करना होगा। इसके लिए उन्हें:

  • लोगों को खतरनाक नदी किनारों से हटाकर सुरक्षित जगहों पर बसाना होगा।
  • इसके लिए पैसा, समय और सही योजना बनानी होगी।
  • सरकार के अलग-अलग विभागों और नेताओं को साथ मिलकर काम करना होगा।

जो लोग पहले से ऐसी जगहों पर रह रहे हैं, उन्हें अचानक हटाना आसान नहीं है। लेकिन नए निर्माण के लिए यह ज़रूर देखा जाना चाहिए कि वह जगह सुरक्षित है या नहीं।

सबसे अच्छा तरीका यही है कि नदियों के बिल्कुल किनारे निर्माण करने से बचा जाए।

सवाल: क्या वैज्ञानिकों की दी हुई जानकारी अभी भी सही तरीके से शहर बनाने वालों और सरकारी विभागों तक नहीं पहुँच रही है?

विज्ञान, सरकार और समाज के बीच अभी भी सही तालमेल नहीं है। वैज्ञानिक जो रिसर्च करते हैं और जो पेपर प्रकाशित करते हैं, उन्हें बहुत कम लोग पढ़ते या समझते हैं।

लेकिन अब हमारे ग्रुप का ग्लेशियल बाढ़ पर प्रकाशित एक नया पेपर और IIT के दूसरे ग्रुपों की रिसर्च सरकार का ध्यान खींच रही है।

फिर भी इसके लिए लंबे समय की सोच ज़रूरी है। हमें 20-30 साल आगे की योजना बनानी होगी, ताकि वैज्ञानिक रिसर्च का इस्तेमाल समाज की सुरक्षा के लिए किया जा सके।

इस मामले में हम अभी भी पीछे हैं। चाहे भारत हो, नेपाल हो या दक्षिण एशिया का कोई और देश, वैज्ञानिक जानकारी को सरकारी योजनाओं और निर्माण से जोड़ने के लिए अभी बहुत काम करना बाकी है।

सवाल: अगर नेपाल की यह घटना एक बड़ी चेतावनी है, तो एशिया के नेताओं को सबसे पहले क्या बदलना चाहिए?

छोटी और लंबी अवधि, दोनों के लिए योजनाएँ पहले से मौजूद हैं। नेताओं के पास भी काफी जानकारी है। मुझे नहीं पता कि इन योजनाओं पर तेज़ी से काम क्यों नहीं हो रहा।

नेपाल, चमोली और साउथ ल्होनक जैसी घटनाओं ने सोशल मीडिया पर भी काफी ध्यान खींचा है।

भारत में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय और सरकार अब ऐसे खतरनाक इलाकों में निर्माण को लेकर वैज्ञानिक आधार पर नीतियाँ बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।

यह एक अच्छी शुरुआत है। लेकिन ये सारे काम रातों-रात नहीं किए जा सकते। हम किसी घटना के बारे में जल्दी जानकारी जुटा सकते हैं और यह समझ सकते हैं कि वह कैसे हुई। लेकिन उसका स्थायी समाधान एक-दो महीने में नहीं निकलेगा।

हम नेपाल जैसी घटना को एक-दो महीने में समझ सकते हैं और उसके सही आँकड़े जुटा सकते हैं। लेकिन वैज्ञानिकों के पास ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं है जिससे रातों-रात समाधान मिल जाए।

पहाड़ी इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित रखने के लिए हमें लंबे समय की योजना बनाकर काम करना होगा।

नोट: यह इंटरव्यू मूल रूप से एशियन डिस्पैच द्वारा 14 सितंबर, 2026 को इंग्लिश में प्रकाशित की गई थी और अनुमति के साथ पुनः प्रकाशित की गई है। खबर लहरिया द्वारा इसका अनुवाद हिंदी में किया गया है। 

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