आजकल घरों की रसोई आधुनिक उपकरणों से भर गई हैं और लोग पारंपरिक स्टील या एल्युमीनियम के बर्तनों की जगह नॉन-स्टिक बर्तनों का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। ये बर्तन खाना जलने या चिपकने से बचाते हैं, लेकिन इनके इस्तेमाल से स्वास्थ्य भी खतरे में पड़ सकता है। ऐसे में मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल आपको बचा सकता है।
रिपोर्ट – श्यामकली, लेखन – सुचित्रा
मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाने का इस्तेमाल पुराने समय से किया जाता रहा है। आज भी कई जगह ऐसी है जहां इनका इस्तेमाल किया जाता है। मिट्टी के बर्तन का अपना एक स्वाद होता है और मिट्टी की अपनी ही एक खुशबू, महक होती है। आप ने मिट्टी के बर्तन से बनी कुल्हड़ चाय तो जरूर पी होगी। चाय का नाम पढ़ते ही आपको वो कुल्हड़ वाली चाय की याद आ गई न? बिहार, यूपी, दिल्ली के अलग अलग हिस्सों में ये मिट्टी के बर्तन बनाये जाते हैं और यह खाना बनाने के इस्तेमाल भी किए जाते हैं। मिट्टी के बर्तन में स्वाद ही नहीं बल्कि ये स्वास्थ्य के लिए भी काफी फायदेमंद होता है। हम बात करेंगे यूपी के महोबा की, जहां के लोग इन मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाते हैं।
ग्रामीण हो या शहर, मिट्टी के बर्तन आसानी से हर जगह मिल जाते हैं। इसके रोजगार ने काफी विस्तार किया है यहाँ तक की अब यह ऑनलाइन भी मिलते हैं। बाजार में अधिकतर गर्मियों के मौसम में मिट्टी के घड़े और मिट्टी की बोतल ज्यादा बिकते हैं और खरीदे जाते हैं। मिट्टी के बर्तन सस्ते भी होते हैं और लोगों की जेब पर भी कम बोझ पड़ता है। फ्रीज न हो तो लोग घड़े में ही पानी ठंडा करके पीते हैं। बाजार में इन बर्तनों के आलावा मिट्टी का भगोना, मटका (घड़ा), थाली, कटोरी, गिलास, दही हांडी, मसाला पॉट सभी मिलते हैं।
जैतपुर बाजार में मिट्टी के बर्तन की मांग
जिला महोबा के ब्लॉक जैतपुर के बाजार की आशा रानी बताती हैं कि यहाँ मिट्टी के बर्तन काफी प्रसिद्ध हैं और लोग इन्हें दूर-दराज के इलाकों तक ले जाते हैं। हालांकि, ये बर्तन पतले होते हैं, इसलिए इन्हें ले जाते समय बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है, क्योंकि इनके टूटने का खतरा रहता है। इसलिए लोग इन्हें अच्छी तरह सुरक्षित रखकर घर तक पहुंचाते हैं।
उन्होंने बताया कि मिट्टी के बर्तन घर लाने के बाद उन्हें तुरंत इस्तेमाल नहीं किया जाता। पहले उनमें लगभग दो दिन तक पानी भरकर रखा जाता है, खासकर उन बर्तनों में जिनमें खाना बनाना होता है। इसके बाद ही उनमें खाना बनाना शुरू किया जाता है।
जितना पुराना मिट्टी का बर्तन उतना मजबूत
आशा ने बताया कि जितना पुराना मिट्टी का बर्तन हो जाता है, वह उतना ही मजबूत और टिकाऊ हो जाता है, और आसानी से टूटता नहीं है। यह भी जरूरी है कि मिट्टी के बर्तनों को इस्तेमाल करने से पहले अच्छी तरह पानी से भिगोया जाए। इसके बाद ही उन्हें आग पर रखा जाए, क्योंकि अगर सूखे बर्तन को सीधे आग पर रख दिया जाए तो उसके टूटने का खतरा रहता है।
महोबा जिला के गांव कमलापुर की रहने वाले प्रभु बताते हैं कि “हमारे यहां मिट्टी के बर्तन आसानी से मिल जाते हैं और मिट्टी के बर्तन में ही ज्यादातर गांव देहात में खाना बनाया जाता है।”
मिट्टी के बर्तन में कम खर्च स्वाद ज्यादा
शोभा बताती हैं कि बाजार में मिट्टी के बर्तन बाकी बर्तनों के मुकाबले सस्ते मिलते हैं। बाजार में एक तवा 15रुपए है वहीं छोटी कढ़ाई 100 रुपए की। उन्होंने बताया कि इसपर खाना जल्दी भी बनता है और तेल मसाला भी कम खर्च होता है। वे कहती हैं “मिट्टी के बर्तन को गर्म होने में थोड़ा समय लगता है। लेकिन एक बार जब ये अच्छे से गर्म हो जाते हैं, तो खाना जल्दी पकने लगता है। मिट्टी के बर्तन में बना खाना ज्यादा स्वादिष्ट होता है और इसमें तेल-मसाले की भी बहुत कम जरूरत पड़ती है। वे बताती हैं कि मिट्टी के बर्तन तेल को अपने अंदर सोख लेते हैं, इसलिए बाद में कम तेल में भी खाना बन जाता है। चाहे दाल बनानी हो या सब्जी, इसमें ज्यादा तेल डालने की जरूरत नहीं होती।
मिट्टी के बर्तन में नॉन वेज बनान ज्यादा स्वादिष्ट
प्रभा बताती हैं कि पहले उनकी माँ मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाती थीं। उन्हें देखकर ही अब वे भी मिट्टी के बर्तन खरीदकर खाना बनाती हैं। इन बर्तनों में दाल, चावल, सब्ज़ी से लेकर मांस और मछली तक हर तरह का खाना बनाया जाता है। उनके अनुसार, मिट्टी के बर्तनों में बने खाने का स्वाद अलग और अधिक अच्छा होता है, जबकि लोहे या स्टील (सिल्वर) की कढ़ाई में बने खाने का स्वाद थोड़ा अलग होता है। इसलिए उन्हें मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाना पसंद है। चिकन हांडी तो बहुत प्रसिद्ध नाम है आप ने भी बिहार का चम्पारण मीट सुना होगा। यह विशेष तौर पर मिट्टी की हांडी में बनाया जाता है और यह बिकता भी बहुत महंगा है। बिहार हो या यूपी बर्तन तो वही है मिट्टी का। जब ये बनता है तो सब उँगलियाँ चाटने लगते हैं। जब इस मिट्टी के बर्तन में चिकन या मछली बनाई जाती है तो उसका स्वाद तो कोई भूल ही नहीं सकता।
वे यह भी बताती हैं कि मिट्टी के बर्तन आमतौर पर चूल्हे पर ही इस्तेमाल किए जाते हैं। गैस चूल्हे पर इन्हें कम ही चढ़ाया जाता है, क्योंकि लोगों का मानना है कि मिट्टी के बर्तन गैस पर ज्यादा समय लेते हैं और गैस की खपत भी ज्यादा हो सकती है।
मिट्टी के तवे रोटी का स्वाद
मिट्टी के तवे पर बनी रोटी खाने में बहुत स्वादिष्ट होती है। इसकी खास बात यह है कि न सिर्फ स्वाद अच्छा होता है, बल्कि रोटी आसानी से जलती भी नहीं है। मिट्टी का तवा थोड़ा मोटा होता है, जिससे रोटी धीरे-धीरे और अच्छे से पकती है, और जलने की संभावना कम रहती है।
साथ ही, मिट्टी के तवे पर बनी रोटी देखने में भी अच्छी लगती है। इसे खाने से कोई नुकसान नहीं होता, बल्कि लोग इसे आराम से ज्यादा भी खा लेते हैं।
कुछ लोगों का मानना है कि गैस पर बनी रोटी खाने से कभी-कभी पेट भारी लग सकता है या पाचन ठीक नहीं रहता। इसलिए वे अन्य खाना चाहे किसी भी बर्तन में बना लें, लेकिन रोटी हमेशा मिट्टी के तवे पर ही बनाना पसंद करते हैं।
महोबा जिले में पीढ़ी दर पीढ़ी मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाने की परंपरा चली आ रही है और आज भी गांवों में सुबह-शाम इसी तरह खाना बनाया जाता है। यहां की महिलाएं मिट्टी के बर्तनों और मिट्टी के चूल्हे का इस्तेमाल करती हैं, जिसमें लकड़ी और कंडों (उपलों) से खाना पकाया जाता है।
गांव के लोगों का मानना है कि मिट्टी के बर्तनों में बना खाना स्वाद में अधिक अच्छा होता है। यही कारण है कि आज भी इस परंपरा को बनाए रखा गया है।
मिट्टी के बर्तन में खाना बनाना स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट में सामने आया कि मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाने से भोजन में मिट्टी में मौजूद कैल्शियम, फास्फोरस, मैग्नीशियम और आयरन जैसे आवश्यक तत्व शामिल हो जाते हैं, जो हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए सहायक होते हैं। इसके विपरीत, प्लास्टिक या स्टील के बर्तनों में खाना पकाने से ये पोषक तत्व कम हो जाते हैं, साथ ही हानिकारक रसायन भी निकलते हैं जो गुर्दे और यकृत (आंत) के कार्यों को प्रभावित करते हैं। इसके अलावा, मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाने से तेल का उपयोग कम होता है और अम्लता कम होती है, जिससे कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम होता है।
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और राष्ट्रीय पोषण संस्थान (एनआईएन) ने भारतीयों के लिए आहार संबंधी दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिनमें मिट्टी के बर्तनों की सुरक्षा और फायदों पर जोर दिया गया है।
यदि आप हमको सपोर्ट करना चाहते है तो हमारी ग्रामीण नारीवादी स्वतंत्र पत्रकारिता का समर्थन करें और हमारे प्रोडक्ट KL हटके का सब्सक्रिप्शन लें’




