कुल कचरा बीनने वालों में 84.5 प्रतिशत लोग अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग समुदायों से हैं। वहीं सामान्य श्रेणी के समुदायों से आने वाले लोगों की हिस्सेदारी 10.7 प्रतिशत है।
द हिंदू के खबर अनुसार केंद्र सरकार ने 3 फरवरी को पहली बार देशभर में कचरा बीनने वालों की गणना से जुड़े आंकड़े जारी किए हैं। इन आंकड़ों से पता चलता है कि देशभर में कचरा बीनने वालों में बड़ी संख्या सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों से आती है। कुल कचरा बीनने वालों में 84.5 प्रतिशत लोग अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग समुदायों से हैं। वहीं सामान्य श्रेणी के समुदायों से आने वाले लोगों की हिस्सेदारी 10.7 प्रतिशत है। यह जानकारी सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत की गई। जारी आंकड़ों के अनुसार शहरी इलाकों में 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अब तक कुल 1.52 लाख कचरा बीनने वालों का प्रोफाइल तैयार कर उन्हें प्रमाणित किया जा चुका है। यह प्रक्रिया पूरे देश में चल रही है और आने वाले समय में इसमें और लोगों को जोड़ा जाना है।
‘नमस्ते’ योजना और इसका उद्देश्य
यह गणना मंत्रालय की ‘नमस्ते’ (NAMASTE) योजना के तहत की जा रही है। इस योजना के अंतर्गत सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई करने वाले कर्मियों और कचरा बीनने वालों की पहचान की जा रही है। सरकार का कहना है कि इसका मकसद इन कामगारों को शहरी स्थानीय निकायों द्वारा औपचारिक मान्यता दिलाना है ताकि उन्हें सुरक्षा उपकरण दिए जा सकें और उनका काम सुरक्षित बनाया जा सके। इस योजना का मुख्य लक्ष्य सीवर और सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई से होने वाली मौतों को पूरी तरह खत्म करना है।
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क्या है नमस्ते योजना
नमस्ते (NAMASTE – National Action for Mechanised Sanitation Ecosystem) योजना भारत सरकार की एक केंद्रीय योजना है जिसका मकसद सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई को पूरी तरह मशीनों से कराना है। यह योजना 2023-24 में शुरू की गई थी ताकि खतरनाक सफाई की प्रथा खत्म हो। सफाई कर्मियों को सुरक्षा उपकरण और स्वास्थ्य बीमा मिले। उन्हें प्रशिक्षण दिया जाए और उनके लिए सुरक्षित व सम्मानजनक रोजगार के अवसर बनाए जा सकें।
महिलाओं, पुरुषों और सामाजिक वर्गों की स्थिति
आँकड़ों के अनुसार 23 जनवरी तक प्रोफाइल किए गए कुल 1.52 लाख कचरा बीनने वालों में से 48.7 प्रतिशत महिलाएं (74,427), 51.3 प्रतिशत पुरुष (78,374) और 0.007 प्रतिशत ट्रांसजेंडर (12) हैं। सामाजिक वर्गों के आधार पर देखें तो इनमें सबसे ज्यादा 60.3 प्रतिशत लोग अनुसूचित जाति समुदाय से हैं जिनकी संख्या 92,089 है। इसके अलावा 13.7 प्रतिशतओबीसी समुदाय (20,954) और 10.5 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति समुदाय (करीब 16 हजार से अधिक) से हैं। वहीं सामान्य श्रेणी के समुदायों से आने वाले कचरा बीनने वालों की संख्या 16,329 है, जो कुल का 10.7 प्रतिशत है। कुल मिलाकर राष्ट्रीय स्तर पर 84.5 प्रतिशत कचरा बीनने वाले एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों से आते हैं।
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कुछ राज्यों में अलग तस्वीर
हालांकि राज्य और केंद्र शासित प्रदेश स्तर पर तस्वीर हर जगह एक जैसी नहीं है। दिल्ली और गोवा जैसे कुछ इलाकों में सामान्य श्रेणी के कचरा बीनने वालों की संख्या एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों से आने वालों से ज्यादा पाई गई है। दिल्ली में प्रोफाइल किए गए 6,500 से अधिक कचरा बीनने वालों में से 4,289 सामान्य श्रेणी से हैं। इसी तरह गोवा में कुल 1,286 प्रोफाइल किए गए कामगारों में से 729 सामान्य श्रेणी के समुदायों से हैं। पश्चिम बंगाल में भी प्रोफाइल और सत्यापित किए गए कामगारों में 42.4 प्रतिशत सामान्य श्रेणी के बताए गए हैं। इसके अलावा 7,402 कामगारों को ‘अन्य’ श्रेणी में रखा गया है जिसकी जानकारी संसद में एक सवाल के जवाब में दी गई।
सीवर कर्मी और मौतों के आंकड़े
‘नमस्ते’ योजना के तहत अब तक करीब 89,000 सीवर में उतरकर काम करने वाले और सेप्टिक टैंक की सफाई करने वाले कर्मियों की भी पहचान की जा चुकी है। इनमें से 95.8 प्रतिशत पुरुष हैं। दिसंबर 2024 तक के आंकड़ों के अनुसार इन कर्मियों में 91.95 प्रतिशत एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों से आते हैं जबकि लगभग 8.05 प्रतिशत सामान्य श्रेणी के समुदायों से हैं। लोकसभा में दिए गए एक अन्य जवाब में सरकार ने बताया कि साल 2014 से अब तक सीवर और सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई के दौरान देशभर में कुल 859 लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें से 43 मौतें केवल साल 2025 में दर्ज की गई हैं।
ये आंकड़े दिखाते हैं कि सफाई से जुड़े खतरनाक काम आज भी बड़ी संख्या में सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लोग कर रहे हैं और इस दिशा में सुरक्षा व पुनर्वास के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत बनी हुई है।
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