लोगों ने बताया कि वे कई दिनों से यही स्थिति देख रही हैं और इसी कारण अधिकतर महिलाएं शौच के लिए बाहर जाने को मजबूर हो जाती हैं। उनका कहना है कि यह गंदगी डिलीवरी कराने वाली महिलाओं और उनके नवजात बच्चों के स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकती है।
रिपोर्टिंग – सुनीता देवी, लेखन – रचना
देश में हर साल स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए करोड़ों रुपये का बजट पास किया जाता है। सरकारी अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में साफ – सफाई, दवाइयों और मरीजों की सुविधाओं के लिए अलग-अलग मदों में पैसा दिया जाता है लेकिन हकीकत कई जगहों पर इससे बिल्कुल उलट नजर आती है।
दरअसल उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले के शंकरगढ़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की स्थिति भी कुछ ऐसी ही बताई जा रही है जहां गंदगी और अव्यवस्था से मरीजों को परेशानी झेलनी पड़ रही है।
“मजबूरी में बाहर जाना पड़ रहा”
स्थानीय महिलाओं से अस्पताल की स्थिति पर बात करने पर उन्होंने बताया कि अस्पताल के शौचालय अक्सर बहुत गंदे रहते हैं। गांव भेलाव की रहने वाली सीमा का कहना है कि वह डिलीवरी के लिए अस्पताल गई थी। जब वह शौच के लिए शौचालय के अंदर गईं, तो वहां की हालत इतनी बदतर थी कि नाक दबाकर जाना पड़ा। शौचालय की सीट पर फैली गंदगी के कारण ठीक से बैठना तो दूर पैर रखना तक मुश्किल हो गया।
वहीं रानी नाम की महिला ने बताया कि वे कई दिनों से यही स्थिति देख रही हैं और इसी कारण अधिकतर महिलाएं शौच के लिए बाहर जाने को मजबूर हो जाती हैं। उनका कहना है कि यह गंदगी डिलीवरी कराने वाली महिलाओं और उनके नवजात बच्चों के स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकती है।
पीने के पानी और आसपास की गंदगी पर सवाल
महिलाओं ने यह भी बताया कि जहां पीने का पानी रखा गया है वहां भी सफाई नहीं है। लोग वहां पान-गुटखा खाकर थूक देते हैं। ऐसी जगह से पानी पीने में डर लगता है। उनका कहना है कि अगर पानी पीने की जगह साफ नहीं होगी तो मरीजों को संक्रमण का खतरा बना रहेगा। अस्पताल परिसर में फैली गंदगी देखकर खाना खाने का मन नहीं होता है।
बिस्तर और चादर बदलने के नियमों का पालन नहीं
बेमरा गांव की सुमन बताती हैं कि उनका ऑपरेशन के ज़रिये प्रसव हुआ है और वे कई दिनों से अस्पताल में भर्ती हैं। उनका कहना है कि अस्पताल में बेड की सफाई को लेकर रोज़ अलग-अलग चादर बिछाने का नियम है, लेकिन यहां बार-बार वही चादर दोबारा बिछा दी जाती है।
अकौरिया गांव की संगीता ने बताया कि “नियम के अनुसार अलग-अलग दिनों में अलग रंग की चादर होनी चाहिए जैसे सोमवार को सफेद या गुलाबी, मंगलवार को हल्का हरा, बुधवार को हरा, गुरुवार को पीला, शुक्रवार को बैंगनी, शनिवार को नीला और रविवार को हल्का सफेद लेकिन अस्पताल में इस नियम का पालन नहीं किया जा रहा है जिससे साफ-सफाई पर सवाल उठते हैं।”
डॉक्टर का पक्ष, रोज सफाई होती है, लेकिन संसाधन कम हैं
इस मामले पर मेडिकल ऑफिसर डॉक्टर अनुज सिंह का कहना है कि अस्पताल में रोज सुबह और शाम सफाई कराई जाती है। उन्होंने बताया कि यहां सरकारी सफाई कर्मचारी नहीं हैं बल्कि दो निजी सफाई कर्मी रखे गए हैं।
डॉक्टर का कहना है कि कई बार गांव से आने वाले लोग पानी की जगह पर थूक देते हैं जबकि वहां थूकने पर जुर्माने की सूचना भी लगी है। उन्होंने यह भी कहा कि चादर बदलने का काम नियम के अनुसार एएनएम द्वारा कराया जाता है और सफाई के लिए अलग से कोई बजट नहीं है बल्कि दूसरे खर्चों से इसे मैनेज किया जाता है।
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