भारत में इस साल 8 पत्रकारों और 1 सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर की हत्या, दर्जनों शारीरिक हमले, सैकड़ों मुकदमे, छापे और हजारों इंटरनेट शटडाउन शामिल हैं। विश्व भर में कुल 128 पत्रकारों और मीडियाकर्मियों की हत्या हुई। इनमें 10 महिला पत्रकार शामिल हैं और 9 मौतें दुर्घटनावश हुईं।
2025 में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पत्रकारों की सुरक्षा की स्थिति बेहद चिंताजनक रही है। फ्री स्पीच कलेक्टिव की “बिहोल्ड द हिडन हैन्ड” रिपोर्ट के मुताबिक भारत में इस साल 8 पत्रकारों और 1 सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर की हत्या, दर्जनों शारीरिक हमले, सैकड़ों मुकदमे, छापे और हजारों इंटरनेट शटडाउन शामिल हैं। साल की शुरुआत ही पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या से हुई जो बस्तर में सड़क निर्माण में भ्रष्टाचार पर रिपोर्टिंग कर रहे थे। यह घटना इस बात का प्रतीक बन गई कि देश में सच दिखाने और सवाल पूछने की कीमत कितनी भारी हो सकती है। केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में 2025 के दौरान 128 पत्रकारों की हत्या हुई जो यह दिखाती है कि पत्रकारिता लगातार एक खतरनाक पेशा बनती जा रही है।
इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स (IFJ) की अंतिम रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 पत्रकारिता के लिए एक और घातक वर्ष साबित हुआ जिसमें विश्व भर में कुल 128 पत्रकारों और मीडियाकर्मियों की हत्या हुई। इनमें 10 महिला पत्रकार शामिल हैं और 9 मौतें दुर्घटनावश हुईं। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारों को आज सवाल पूछने और सच सामने लाने की सजा मिल रही है। जबकि पत्रकारों का मूल काम सत्ता से सवाल करना जनता की आवाज बनना और सच को बिना डर के सामने रखना है। बोलने और लिखने की आज़ादी लोकतंत्र की बुनियाद है लेकिन 2025 में यह साफ दिखा कि इस अधिकार को दबाने के लिए कानून, हिंसा और डर को हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया।
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देश में 1 जनवरी 2025 को ही पत्रकार की हत्या
रिपोर्ट बताती है कि सच लिखने और सवाल उठाने वालों के लिए हालात लगातार खतरनाक होते जा रहे हैं। मारे गए पत्रकारों में छत्तीसगढ़ के मुकेश चंद्राकर के अलावा
उत्तर प्रदेश के राघवेंद्र बाजपाई
लक्ष्मी नारायण सिंह
हरियाणा के धर्मेंद्र सिंह चौहान
कर्नाटक के बसावराज कनाकोंड
उड़ीसा के नरेश
उत्तराखंड के राजीव प्रताप सिंह
अंडमान-निकोबार के शादाब डे शामिल हैं। वहीं पंजाब की सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर कंचन कुमारी की भी हत्या की गई। इसके साथ ही पत्रकारों को धमकाने, डराने और परेशान करने की घटनाएं भी लगातार सामने आती रहीं। कश्मीर के इरफान मेहराज और झारखंड के रूपेश कुमार सिंह जैसे पत्रकार यूएपीए जैसे कड़े कानून के तहत पिछले कई सालों से जेल में बंद हैं।
गिरफ़्तारी
रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े करीब 14,875 उल्लंघन दर्ज किए गए। इनमें 117 लोगों की गिरफ्तारी शामिल है जिनमें आठ पत्रकार भी थे। सेंसरशिप और कानूनी कार्रवाई से जुड़े 208 मामले सामने आए जो दिखाते हैं कि बड़ी संख्या में लोगों की आवाज को दबाने की कोशिश की गई। फ्री स्पीच कलेक्टिव का कहना है कि बीते दस वर्षों से भारत में हालात लगातार बिगड़ते गए हैं। सेंसरशिप और इंटरनेट पर नियंत्रण अब सिर्फ पत्रकारों तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि आम नागरिक भी इसकी चपेट में हैं। खबरों, फिल्मों, किताबों और शिक्षा के क्षेत्र तक पर नियंत्रण बढ़ता जा रहा है और सरकार की नीतियां व कानून अभिव्यक्ति की आज़ादी को और संकुचित कर रहे हैं।
533 पत्रकार जेलों में बंद
रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया भर में इस समय 533 पत्रकार जेलों में बंद हैं जो प्रेस की आज़ादी पर बढ़ते खतरे को दिखाता है। रिपोर्ट ने इस स्थिति को दमन और सज़ा से बच निकलने की प्रवृत्ति से जोड़ा है। आंकड़ों के अनुसार एशिया-प्रशांत क्षेत्र में हालात सबसे ज्यादा खराब हैं जहां 277 पत्रकार कैद हैं। चीन, हांगकांग को मिलाकर 143 पत्रकारों के साथ दुनिया में सबसे ज्यादा पत्रकारों को जेल में रखने वाला देश बना हुआ है। इसके बाद म्यांमार में 49 और वियतनाम में 37 पत्रकार हिरासत में हैं।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि अंतरराष्ट्रीय पत्रकार महासंघ (IFJ) ने 1990 से पत्रकारों की हत्याओं का रिकॉर्ड रखना शुरू किया था। तब से अब तक संगठन 3,173 पत्रकारों की मौत को दर्ज कर चुका है जो यह साफ दिखाता है कि पत्रकारिता करना दुनिया के कई हिस्सों में आज भी जान जोखिम में डालने जैसा है।
2025 ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सच बोलने और सवाल पूछने वालों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है। लोकतंत्र में पत्रकारों का काम सत्ता से जवाब मांगना और जनता की आवाज़ बनना होता है लेकिन आज वही पत्रकार सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं। हत्या, हमले, झूठे मुकदमे, जेल और सेंसरशिप ये सब अब अपवाद नहीं बल्कि लगातार बढ़ती सच्चाई बनते जा रहे हैं। अगर पत्रकारों को सच दिखाने की कीमत जान देकर चुकानी पड़े तो यह सिर्फ पत्रकारों की हार नहीं बल्कि पूरे लोकतंत्र की हार है। सवाल यह नहीं है कि पत्रकार क्यों मारे जा रहे हैं,असली सवाल यह है कि उन्हें मारने और डराने वालों को रोका क्यों नहीं जा रहा। जब तक सत्ता, प्रशासन और समाज मिलकर अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा की जिम्मेदारी नहीं लेते तब तक सवाल पूछने की यह सज़ा यूं ही जारी रहेगी।
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