चित्रकूट के खोह गांव में भीम आर्मी कार्यकर्ता केवलराम उर्फ़ कल्लू की मौत ने एक बार फिर जातिगत हिंसा और बहुजन राजनीति की ज़मीनी सच्चाइयों को सामने ला दिया है। आरोप है कि शराब के लिए पानी देने से मना करने पर कुछ सवर्ण युवकों ने उनकी बेरहमी से पिटाई की। एक महीने तक अस्पताल में ज़िंदगी से जूझने के बाद उनकी मौत हो गई। पुलिस की धीमी कार्रवाई और यह कहना कि “आरोपी फरार हैं”, कई सवाल खड़े करता है। इसी पृष्ठभूमि में, भीम आर्मी के चित्रकूट ज़िला संयोजक संजय कुमार गौतम से बातचीत में हम समझने की कोशिश कर रहे हैं कि कैसे जातिगत हिंसा सिर्फ़ सामाजिक नहीं, बल्कि एक राजनीतिक औज़ार बनती जा रही है- जिसका इस्तेमाल बहुजन नेताओं और कार्यकर्ताओं को सक्रिय राजनीति से बाहर करने के लिए किया जाता है। बुंदेलखंड में ऐसी घटनाएँ नई नहीं हैं। आज मुद्दे की बात में हम जानेंगे कि एक बहुजन पार्टी का कार्यकर्ता ज़मीनी स्तर पर किन चुनौतियों से गुजरता है। सवर्ण प्रभुत्व कैसे सीधे नहीं, बल्कि अक्सर अदृश्य तरीकों से काम करता है- “भीम वाला है” कहकर चिढ़ाना, धमकी भरे इशारे करना, सामाजिक अपमान झेलना, बचपन से लेकर आज तक सार्वजनिक जगहों पर बराबरी से वंचित रखना। इन रोज़मर्रा की ज़िल्लतों के बावजूद, आत्मसम्मान के साथ खड़े रहकर अधिकारों की बात करना ही बहुजन राजनीति की सबसे बड़ी और कठिन लड़ाई है।
ये भी देखें –
Mudde Ki Baat: ग्रामीणों की शिकायतें और SIR की चुनौतियाँ, ज़मीन पर विपक्ष कैसे संभाल रहा है मैदान?
यदि आप हमको सपोर्ट करना चाहते है तो हमारी ग्रामीण नारीवादी स्वतंत्र पत्रकारिता का समर्थन करें और हमारे प्रोडक्ट KL हटके का सब्सक्रिप्शन लें’