खबर लहरिया Blog ‘मुझे नहीं लगता मैं वापस इंफाल जा पाउंगी’- मणिपुर हिंसा

‘मुझे नहीं लगता मैं वापस इंफाल जा पाउंगी’- मणिपुर हिंसा

सीएम (एन बिरेन सिंह) चाहते तो सब तो उसी दिन (3 मई) रोक सकते थे, लेकिन उस समय बीजेपी सरकार केंद्र में कर्नाटका चुनाव में व्यस्त थी और सीएम उस बारे में, कर्नाटका चुनाव के बारे में लिख रहे थे बजाय इसके जो खुद उनके राज्य की राजधानी में हो रहा है, जहां वह खुद भी रह रहे थे। इसके बारे में उन्होंने कुछ नहीं बोला, कुछ नहीं कहा, कुछ नहीं किया।

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“मुझे लगा मैं उनसे (परिवार) आखिरी बार बात कर रही हूँ” –  दिल्ली में पढ़ रही मणिपुर की एक छात्रा ने इंटरव्यू के दौरान खबर लहरिया की प्रबंध संपादक मीरा देवी को बताया। जब मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदाय के बीच जातीय हिंसा शुरू हुई, उस समय छात्रा का परिवार भी वहीं था। 

कहा,’यह सब हाई कोर्ट के ST (अनुसूचित जनजाति) पर दिए फैसले के बाद हुआ।’

इंटरव्यू के दौरान बताया,घटना 3 मई की रात को हुई। हर जगह गोली चल रही थी। मैंने अपने परिवार को कॉल किया। कहते-कहते वह रो पड़ी और कुछ देर शांत हो गई………  मैंने उनसे वहां की परिस्थिति के बारे में पूछा। उस समय इम्फाल में सब कुछ सही था, कुछ नहीं हुआ था। कुछ समय बाद सुनने को मिला कि मैतेई समुदाय के लोगों ने इम्फाल में कुछ लोगों के घरों में आग लगाना शुरू कर दिया है। 

माँ-पापा कह रहे थे कि सब कुछ ठीक है पर मुझे कुछ एहसास था। मेरे लोकैलिटी (स्थानीय जगह) में कुछ दोस्त हैं तो मैंने उनसे पूछने के लिए कॉल किया। उन्होंने बताया कि किस तरह से उन्होंने भागने के लिए पैकिंग करना शुरू कर दिया है। उन्होंने छोटे-छोटे बैगों में सब कुछ पैक करना शुरू कर दिया था कि उनके साथ कभी-भी कुछ भी हो सकता है। 

मैंने फिर दोबारा अपने माता-पिता को confront (जानने हेतु) करने के लिए कॉल किया….यह सब बताते-बताते उसकी आवाज़ रुंध चुकी थी। आंखो से आंसू बहे जा रहे थे क्योंकि वह समय और वह तस्वीरें इन बातों के साथ फिर उसकी आँखों के सामने छा रहे थे। यह सब कह पाना उसके लिए काफी मुश्किल था। कुछ देर बाद खुद को फिर समेटते हुए वह बताती….. 

उन्होंने (मम्मी-पापा) कहा वह सुरक्षित हैं। मैं पूरी रात यह सोचकर आराम से सोई की मेरे पैरेंट्स ठीक हैं। 

अगली सुबह 4 मई को मैं उठी और फ़ोन पर एक टेक्स्ट था कि मेरे माता-पिता की जान खतरे में हैं। मेरे भाई ने मुझे कुछ वीडियोज़ भेजी थी जिसमें यह दिख रहा था कि किस तरह से घरों के अंदर पत्थर फेंकें जा रहे हैं। 

मेरे लिए यह बहुत ज़्यादा traumatic (सदमा) घटना थी। रोते हुए कहा,

“आपको नहीं पता कि आप आखिरी बार अपने माता-पिता या परिवार से बात कर रहे हैं।”

मैनें अपने पेरेंट्स को कॉल करने की कोशिश की लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया। मैं अपने छोटे भाई-बहनों को कॉल करने लगी लेकिन मैं उन तक भी नहीं पहुँच पा रही थी। मुझे नहीं पता चल रहा था कि क्या हो रहा है। मैं बहुत डरी हुई थी। मैंने अपने रिश्तेदारों को कॉल करना शुरू किया। कुछ देर बाद मेरी मॉम ने मुझे कॉल किया और कहा कि मैं थोड़ी देर बाद कॉल करती हूँ। उस समय मुझे ऐसा लगा कि मैं आखिरी बार अपनी मॉम से बात कर रही हूँ। 

इन सब के बीच आँखों के आंसू कभी थमे ही नहीं। भरी हुई आंखो के साथ वह बताती,

‘मेरे लिए यह बहुत मुश्किल था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ। उस समय तक भीड़ घर तक पहुँच गई थी। ऐसा कुछ नहीं था जो मैं कर सकूं। मैं बस कुछ घंटो तक प्रार्थना करती रही। कुछ घंटों बाद मेरी मॉम ने मुझे कॉल किया और कहा हम सब सही है और हम पुलिस स्टेशन पहुँच गए हैं। 

मैंने अपने सभी करीबी लोगों को घटना के बारे में बताया कि मणिपुर में क्या चल रहा है। सोशल मीडिया में भी इस बारे में पोस्ट किया। अधिकतर लोगों को इस बारे में पता था।’

साथ ही, यह बात भी साफ़ थी कि जब तक वायरल वीडियोज़ सामने नहीं आई थी जिसमें यह बताया जा रहा था कि मैतेई द्वारा कुकी समुदाय की दो महिलाओं को नग्न करके शहर में घुमाया गया है, हिंसा की कहीं भी चर्चा नहीं हो रही थी। जो इस तरफ भी संकेत करता है कि महिलाओं को किस तरह से किसी भी हिंसा का भिन्न अंग बना दिया गया है। इस समय मणिपुर में ज़ारी हिंसा इसका वास्तविक प्रमाण है।  

इस पूरे मामले पर मीरा देवी शेयर करते हुए कहती हैं, किसी को तो सवाल करना पड़ेगा, किसी को तो पूछना होगा जो मुख्यधारा की मीडिया में न तो दिखाया जा रहा है और न ही पूछा जा रहा है। यह पूछना और जानना दर्दनाक है लेकिन अगर उसे न पूछा गया और न जाना गया, तो ये दर्द हमेशा ही दर्द होगा। केहतीं, 

‘एक घण्टे के इंटरव्यू में मुझे बहुत मुश्किल हुई। कभी वह रोने लगती। कभी वह बात करते-करते चुप हो जाती, फिर हिम्मत जुटाती और बोलती। कई बार मुझे लगा कि उसके दुःख को कैसे दोबारा घाव दे रही हूं लेकिन मेरे लिए इस मुद्दे पर बात करना बहुत ही ज़रूरी था।’

इस पर बात करना कितना ज़रूरी था, इस पर छात्रा की माँ ने भी रोशनी डाली। जब हमने छात्रा से उनके इंटरव्यू के लिए पूछा तो सबसे पहले उन्होंने अपनी माँ से ही इस बारे में पूछा। 

‘मैंने अपनी मम्मी से पूछा कि क्या मुझे इंटरव्यू देना चाहिए या नहीं। पहले मुझे लगा कि शायद वह मना कर रही हैं लेकिन उन्होंने कहा कि तुम्हे ज़रूर से बात करनी चाहिए। हमारे पूरे कुकी समाज के लिए बोलो। हमें अपनी बात रखने के लिए बहुत कम मौका मिल रहा है। पापा बहुत protective (रक्षात्मक) हो रहे थे लेकिन मम्मी बोलने के लिए encourage (बढ़ावा) कर रही थीं।’

छात्रा की माँ द्वारा कही गई बात कि ‘हमें अपनी बात रखने का बहुत कम मौका मिल रहा है’- यह बताने और दिखाने के लिए काफी है कि जो ग्रसित हैं, उन्हें और ग्रसित किया जा रहा है, और दबाया जा रहा है। सिर्फ जो संख्या में ज़्यादा है, वह ही दिख रहे हैं। उनकी ही आवाज़ सुनाई दे रही है। 

इंटरव्यू को ज़ारी रखते हुए जहां वह कहीं पर कमज़ोर भी पड़ रही थी, कभी लगा की थम जाए, कभी लगा की बस अब और नहीं…. वह खुद से लड़ती रही और कहती रही। उसने वो कहा, जिसे सुना ही नहीं गया…. इसलिए यह सुनना, लिखना और कहना बहुत ज़रूरी है….. 

मैतेई की भीड़ ने घर को घेर लिया और आग…. 

छात्रा ने कहा, जब यह सब हुआ तब मैं दिल्ली में थी और इंटर्नशिप कर रही थी। हिंसा के समय मेरा परिवार इम्फाल में था। जब यह हिंसा हुई तो मेरा सारा-परिवार यहां से वहां भाग रहा था। उन्हें भागना पड़ा क्योंकि मैतेई द्वारा उन्हें भगाया जा रहा था। अभी कोई एक कुकी परिवार भी इम्फाल में नहीं रह सकता। उन्हें पहाड़ी क्षेत्रों में रहना पड़ रहा है। 

मेरा परिवार वहां से बिना अपना कोई सामान लिए हुए भागा। हमारा घर और गाड़ी सभी को जला दिया गया था। वे बस भागे। 4 मई की सुबह मेरे परिवार ने जगह छोड़ना शुरू किया। मेरे एक अंकल भी वहां रह रहे थे तो उन्होंने फैसला किया कि वह उनके साथ जगह को छोड़कर निकलेंगे। 

जब मेरा परिवार मेरे अंकल के घर में पहुंचा तो मैतेई की भीड़ ने घर को घेरना शुरू कर दिया। उन्होंने पत्थर फेंकना शुरू कर दिया। मेरा परिवार बहुत डरा हुआ था। वो बार-बार दरवाज़ा खोलने को कह रहे थे लेकिन मेरा परिवार डर की वजह से दरवाज़ा नहीं खोल रहा था। 

फिर मैतेई के गुट ने घर में आग लगाना शुरू कर दिया जिससे डरकर उन्होंने दरवाज़ा खोल दिया। गुट ने महिलाओं को भी मारना शुरू कर दिया। मेरी मम्मी और मेरे भाई को भी मारा। मेरे भाई को काफी चोटें आईं। 

मैतेई समुदाय के ही कुछ अच्छे लोग मेरे परिवार के बचाव के लिए आये और उन्हें नज़दीकी पुलिस थाने तक पहुंचाया। 

बचकर पहुंचे कैंप पर वहां भी पहुंची मैतेई की भीड़ 

आगे बताया, पुलिस स्टेशन में रहने के बावजूद भी भीड़ अंदर आने की कोशिश करती रही। शुक्र था कि पुलिस ने उन्हें दूर कर दिया लेकिन ज़्यादा देर तक नहीं। फिर उन्होंने आर्मी को बुलाया। 

वे उन्हें असम राइफल कैम्प लेकर गए जहां वह 4 से 5 दिन रहे। वहां पर 3 से 4 हज़ार लोग थे। पर्याप्त खाना और पानी भी नहीं था। कपड़े नहीं थे। उन्हें नंगी ज़मीन पर, खुले आसमान के नीचे सोना पड़ रहा था। बहुत ज़्यादा संघर्ष था। इसके बाद आर्मी कई लोगों को हवाईअड्डे तक भी छोड़ने लगी। 

मैं भी अपने परिवार के लिए जितना जल्दी और तेज़ हो सके एयरप्लेन की टिकट देखने लगी और वह मिज़ोरम तक के लिए थी। 8 या 9 मई को आर्मी की मदद से वह एयरपोर्ट पहुंचे और फिर वहां से मिज़ोरम। आर्मी की वजह से वह जिंदा निकल पाएं। इसके बाद वह सड़क के ज़रिये दूसरी जगह पहुंचे। सड़क का सफर 14 घंटो का था। फिर वह चुराचांदपुर जिला पहुंचे। सारा बंदोबस्त उन्हें खुद करना पड़ा। आर्मी ने बस उन्हें हवाईअड्डे तक छोड़ा। 

जो मुख्य जगह है, वहां कुकी परिवार में से इस समय कोई नहीं है। इस समय सब किसी और जगह रह रहे हैं। 

चुराचांदपुर में कई कुकी लोग आकर रह रहे हैं। 

सरकार में भी अधिक संख्या मैतेई की है 

आगे कहा, अभी ऐसा लग रहा है कि सरकार सिर्फ एक तरफ की ही स्टोरी सुन रही है। मणिपुर में सरकार में कार्यरत अधिकतर लोग मैतेई समुदाय के हैं (सरकार में ज़्यादातर लोग मैतेई है) और वह अपने आपको ट्राइबल मानते हैं। मणिपुर में जो कुकी डीजीपी हैं या जो भी कुकी सरकार में है तो उन्हें धीरे-धीरे निकाला जा रहा है। 

यह अन्यायपूर्ण लगता है। जो ट्राइबल लोगों की आवाज़ें हैं, उनकी कहानियां हैं वह अभी भी unheard/ अनसुनी है। 

पुलिस भी दे रही मैतेई का साथ 

उस समय एक वीडियो भी सामने आ रहा था कि मणिपुर पुलिस मैतेई मॉब को सबके घरों को तोड़ने के लिए लीड कर रही थी। ये सारी वीडियो अभी भी है। उन्होंने खुद भी वीडियो बनाई थी। 

इम्फाल में शायद 4-5 मई की बात है, कुछ लोगों द्वारा सबको रोककर उनकी पहचान पूछी जा रही थी, उनके पहचान पत्र चेक किये जा रहे थे। अगर किसी की पहचान कुकी के तौर पर होती तो उन्हें मारा जाता। सभी कुकी आर्मी कैम्प्स में आश्रय ले रहे थे। यहां तक कि उनके (मैतेई) द्वारा कैम्प पर भी अटैक किया जा रहा था। 

अगर कुकी है तो वह किसी को ज़िंदा नहीं जाने देंगे 

अगर मुझे अपने माता-पिता से मिलना है तो पहले मुझे मिज़ोरम जाना होगा और फिर वहां से चुराचांदपुर (churachandpur), मैं इम्फाल या इंफाल एयरपोर्ट तक सीधे नहीं जा सकती। सच कहूं तो मुझे एयरपोर्ट पर उतरना होगा जहां सबकी पहचान को चेक किया जाएगा। इम्फाल बहुल तौर पर मैतेई लोगों वाला है। 

अगर कोई कुकी गेट पास करता तो वह उनकी पहचान चेक करेंगे और फिर वह किसी को भी ज़िंदा बाहर नहीं जानें देंगे। 

चार लड़कियां थी जो नागा थी और वह ऑटो में जा रही थीं। मैतेई लोगों को लगा कि वह कुकी है। उनके बालों को खींचकर उन्होंने (मैतेई मॉब) उन्हें ऑटो से बाहर निकाला और उन्हें मारते रहे। उन्होंने जब दोबारा कहा कि वह नागा है तो उन्होंने उनसे माफ़ी मांगी।

उनको लगा कि अगर वह कुकी है तो वह उनके साथ कुछ भी कर सकते हैं। 

उनके लिए वापिस जाना कितना नार्मल था 

It is very unfaired – छात्रा ने कहा। 

यह बहुत ही अन्यायपूर्ण है। जब मैं अपनी इंटर्नशिप के आखिरी महीने में थी, मैंने अपने दूसरे मैतेई दोस्तों से पूछा कि इंटर्नशिप के बाद वह क्या करने वाले हैं। वह सारे अलग-अलग समुदाय, अलग-2 मैतेई समुदाय से हैं। मैंने उनसे पूछा था कि इन सबके बाद वह कहां जायेंगे तो उन्होंने आसानी से कह दिया कि वह वापिस मणिपुर चले जाएंगे। किसी ने कहा, मैं इम्फाल में कोई क्लिनिक या हॉस्पिटल में ज्वाइन कर लूंगा।

यह उनके लिए बहुत नार्मल था लेकिन हमारे लिए वापिस जाने का कोई चांस या मौका नहीं था। 

‘सीएम चाहते तो सब रोक सकते थे’

छात्रा ने आगे बताया, मैतई लोग ST दर्जे की मांग करने लगे और ST इसके खिलाफ थे। फिर सरकार ने पीछे कदम कर लिया और अचानक से मैतेई आगे आ गए। बाद में यह सांप्रदायिक हिंसा में बदल गई। 

सीएम (एन बिरेन सिंह) चाहते तो सब तो उसी दिन (3 मई) रोक सकते थे, लेकिन उस समय बीजेपी सरकार केंद्र में कर्नाटका चुनाव में व्यस्त थी और सीएम उस बारे में, कर्नाटका चुनाव के बारे में लिख रहे थे बजाय इसके जो खुद उनके राज्य की राजधानी में हो रहा है, जहां वह खुद भी रह रहे थे। इसके बारे में उन्होंने कुछ नहीं बोला, कुछ नहीं कहा, कुछ नहीं किया।

उन्होंने सिर्फ तब बोला जब वीडियो बाहर आई लेकिन मणिपुर राज्य में क्या चल रहा है, इस बारे में कुछ नहीं कहा। 

पापा इम्फाल सेंट्रल गवर्नमेंट में काम करते हैं लेकिन हिंसा के बाद से वह कई महीनों से काम पर नहीं गए। पापा के पास क्योंकि सरकारी नौकरी है तो उन्हें वेतन मिल रहा है। 

उनके लिए यही सुकूं था कि कम से कम सरकारी नौकरी की वजह से उनके घर में पैसा आ रहा है। नहीं तो शायद…… 

आगे कहा, 

इस समय इम्फाल में शायद ही कोई कुकी बचा होगा। 

सब कुछ पहले से ही प्लान था 

Arambai Tenggol (अरामबाई तेंगगोल), यह मैतेई का एक मिलिटेंट आर्म्ड ग्रुप है। यह कह रहे थे कि अगर कोई कुकी है तो उसका सिर फोड़ दो। असम राइफल के अलावा कुकी लोगों के पास अपने जीवन को बचाने के लिए और कोई जगह नहीं थी। 

कहा, यह भी पाया गया कि सीएम का Arambai Tenggo के साथ कोई कनेक्शन था। सब कुछ पहले से planned/ योजनाबद्ध  था। एक ऐसी फोटो भी है जहां Arambai Tenggo के लोग सीएम से उनके ऑफिस में मिल रहे हैं। 

‘अब मेरे लिए यह घर नहीं रहा’

मैं इंफाल में ही पली-बड़ी। मेरी स्कूलिंग सब यहीं हुई। मेरे सभी दोस्त यहीं हैं। इम्फाल मेरे लिए घर की तरह था। जो भी सब कुछ हुआ, वो मेरे लिए एक भयानक सपने की तरह था। मुझे नहीं लगता कि मैं वापस फिर कभी इम्फाल जा पाउंगी। 

It’s not home for us anymore, अब मेरे लिए वह घर नहीं रहा। 

अब सब पूरी तरह से मैतेई समुदाय वाला राज्य बन गया है। वहां कोई कुकी परिवार ज़िंदा नहीं बचा है, जो ज़िंदा बचे हैं, उन्होंने अपने घरों को छोड़ दिया है पर सरकार क्या कर रही है? वह यानी 

देश की सत्ताधारी भाजपा पार्टी वाले राज्य की सरकार, उनके सीएम, देश के पीएम, गृह मंत्री शान्ति व्यवस्था बनाये का राग अलाप रहे हैं पर हो कुछ नहीं पाया है। जब राज्य की सरकार में सत्ता ही एक तरफी हो, उनकी हो जहां से यह पूरा मामला शुरू हुआ, वो कैसे शांति-दूत हो जाएंगे? 

राज्य में बहुल आबादी मैतेई की, सरकार में पदस्थ बहुल आबादी भी मैतेई की और फिर बहुल होने के बाद भी ST का दर्ज़ा भी अब उन्हें चाहिए। वो हिंसा भी कर लें, हत्याएं भी कर लें और फिर घर आकर ये भी बोले की कुकी समुदाय उनके अधिकार नहीं दे रहा। ये बेशर्मी किसके सिर-माथे रखी जाए? 

रिपोर्टमीरा देवी

इलस्ट्रेशन – ज्योत्सना 

 

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