महुआ नाम लेते ही आदिवासी लेखिका जसिंता केरकेट्टा की कविता याद आती है। “क्यों महुए तोड़े नहीं जाते पेड़ से” पढ़कर महसूस होता है कि महुआ के प्रति आदिवासी समुदाय का प्यार कितना गहरा है।
पेड़ जब गुज़र रहा हो
सारी रात प्रसव पीड़ा से
बताओ, कैसे डाल हिला दें जोर से?
बोलो, कैसे तोड़ लें हम
जबरन महुआ किसी पेड़ से?
हम सिर्फ़ इंतजार करते हैं
इसलिए कि उनसे प्यार करते हैं।
महुआ सिर्फ़ एक पेड़ या फल नहीं है बल्कि यह आदिवासी समुदाय और ग्रामीण लोगों के जीवन का अहम हिस्सा भी है। महुआ के पकने का वे बेसब्री से इंतजार करते हैं। इसके फल, फूल और यहां तक पत्तियां भी काम आती है। महुआ आमतौर पर छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश, झारखण्ड और बिहार में पाया जाता है। यह अधिकतर जंगली इलाके में जो हरियाली की खूबसूरती और घने जंगल से जाने जाते है। महुए को अंग्रेजी में बटर ट्री (Butter Tree) कहते हैं।
महुआ का सीजन मार्च से लेकर मई तक
मार्च के महीने से ही पेड़ पर महुआ दिखने लगता है। महुआ में फूल आना मार्च से शुरू हो जाता है और मई तक लोग महुआ बीनने का काम करते हैं। महुआ के फूलों की खुशबू दूर दूर तक महकती हैं। आदिवासियों के लिए ये मौसम बहुत अहम होता है। क्योंकि उनके लिए यह रोजगार का भी समय होता है। महुआ चुनने के लिए सुबह ही महिलाऐं, बच्चे निकल पड़ते हैं। इस दौरान महिलाऐं राइ गीत भी गाती हैं। उसके बोल कुछ इस तरह हैं –
महुआ बीन जाय रे
भैया यार…
महुआ बीन जाय रे
भैया यार…
लग गया छिंगुरिया (हाथ की ससे छोटी वाली उंगली) में फांस रे
महुआ बीन जाय रे….
महुआ (Mahua) का यह सीज़न त्योहार से कम नहीं
एमपी के संगरौली जिले में अधिकतर महुआ के पेड़ पाए जाते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार यहां दो तरह के महुआ के पेड़ पाए जाते हैं, एक कड़वा और दूसरा मीठा महुआ। किसी का आकार छोटा तो किसी का आकार बड़ा होता है। आदिवासी समुदाय के लोग गिरे हुए महुए को बीनते हैं और फिर उसे सुखाकर बेचते हैं। महुआ का दाम फिक्स नहीं रहता है, कभी महुआ का दाम महंगा होता है तो कभी सस्ता। कभी 50 से 60 रूपये किलो बिकता है तो कभी 25 से 30 रूपये किलो। महुआ बीनने वाले तय कीमत के अनुसार ही मुनाफ़ा कमाते हैं। जिनके घर में ज़्यादा काम नहीं होता वह पूरा दिन महुआ बीनते हैं। आगे बताया कि वह एक सीज़न में 10 से 50 हज़ार रूपये तक का महुआ बेच लेते हैं।
महुआ से बनने वाले व्यंजन
महुआ से कई प्रकार के व्यंजन बनते हैं जो बेहतर स्वास्थ्य रखने के साथ-साथ खाने में भी स्वादिष्ट होते हैं। यूपी का प्रयागराज जिला एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है। यहां के लोग अपना जीवन जंगल से मिलने वाली जड़ी-बूटी, फल-फूल पर यापन करते हैं। महुआ से बनने वाले व्यंजन के नाम हैं – लप्सी, कतरा, डोभरी और फरा। यह सब कैसे बनाए जाते हैं इसके लिए आप नीचे दिए गए आर्टिकल को देख सकते हैं।
महुए के बीज का तेल
जब महुआ का फल यानी कोवा पूरी तरह पक जाता है तब उसके अंदर से बीज निकाला जाता है। गांव के लोग इस बीज को डोरी कहते हैं। महिलाएं डोरी को धूप में अच्छी तरह सुखा लेती हैं और फिर गांव के तेल पेराई घर में ले जाकर उससे तेल निकलवाती हैं। इस तेल का इस्तेमाल लोग गांव में बहुत करते थे। इसे सिर्फ खाने के लिए ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी लोग करते थे।
महुए के पत्ते की बिक्री और खरीदी
महुए के पत्ते भी इस्तेमाल में आते हैं। इनके पत्तो को भी तोड़ कर कुछ ग्रामीण रोजगार करते हैं। बाजारों में जाकर बेचते हैं। महुआ के पत्तों से पत्तल (प्लेट) और दोना बनाए जाते हैं। शादी-ब्याह और भोज में खूब इस्तेमाल होता है। सूखे पत्ते जानवरों को भी खिलाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। खासकर गाय-भैंस के लिए उपयोगी होते हैं। कुछ जगहों पर पत्तों का उपयोग घाव या सूजन में किया जाता है।
महुए के फायदे
गांव के लोगों का मानना है कि महुए से कई फायदे हैं। महुआ के फूलों में प्राकृतिक शुगर होती है। खांसी, सर्दी और गले की समस्या में मदद करता है। महुआ खाने से पेट की दिक्कतों में राहत मिलती है। महुए के बीज का तेल त्वचा को मुलायम और बालों को मजबूत बनाता है।
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