2026 के पहले महीने में महाराष्ट्र के यवतमाल ज़िले से 21 किसानों की आत्महत्या की खबर सामने आयी है।
लेखन – हिंदुजा वर्मा
महाराष्ट्र के यवतमाल जिले से एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। साल 2026 के पहले ही महीने (जनवरी) में जिले के 21 किसानों ने आत्महत्या कर ली है। सामाजिक कार्यकर्ता और ‘वसंतराव नाईक शेत स्वावलंबन मिशन’ के पूर्व अध्यक्ष किशोर तिवारी ने इन आंकड़ों को साझा करते हुए सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए हैं। जिले के कलेक्टर विकास मीणा ने भी इन मौतों की पुष्टि की है।
संकट की जड़ें
विदर्भ का ये इलाका 1998 से ही किसान आत्महत्याओं का केंद्र बना हुआ है। यहाँ मुख्य रूप से कपास और सोयाबीन की खेती होती है। जानकारों का कहना है कि चाहे यूपीए सरकार रही हो या एनडीए, अब तक के राहत पैकेज खेती की बुनियादी समस्याओं को हल नहीं कर पाए हैं।
मुख्य समस्याएं:
बढ़ती लागत: बीज, खाद, ईंधन और मजदूरी महंगी होती जा रही है।
जलवायु की मार: पश्चिमी घाट के ‘रेन शैडो’ (कम वर्षा वाले) क्षेत्र में होने के कारण यहाँ बारिश बहुत अनियमित है। सूखा और खराब जल प्रबंधन फसल बर्बाद कर देता है।
कर्ज का जाल: फसल खराब होने और उपज की सही कीमत न मिलने के कारण किसान कर्ज के बोझ तले दब जाता है।
सरकारी कोशिशें और जमीनी हकीकत
प्रशासन का कहना है कि वो ‘मिशन उभारी अभियान’ के जरिए परेशान परिवारों की मदद कर रहे हैं। इसके तहत आर्थिक सहायता, सरकारी योजनाएं और मानसिक सहयोग (काउंसलिंग) दिया जा रहा है। साथ ही, कर्ज माफी जैसी योजनाएं भी लागू की गई हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ये केवल “मलहम” का काम करती हैं, बीमारी का इलाज नहीं।
समाधान की मांग
कृषि कार्यकर्ताओं के अनुसार, जब तक खेती के ढांचे में बड़े सुधार नहीं होंगे, यह संकट खत्म नहीं होगा। इसके लिए कुछ जरूरी कदम सुझाए गए हैं:
न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP): लागत के आधार पर फसलों की सही कीमत की कानूनी गारंटी।
बेहतर सिंचाई: बारिश पर निर्भरता कम करने के लिए जल प्रबंधन का विस्तार।
फसल विविधीकरण: केवल कपास-सोयाबीन के बजाय बाजरा और दालों जैसी फसलों को बढ़ावा देना।
सस्ता कर्ज: साहूकारों के बजाय बैंकों से आसान कर्ज की व्यवस्था।
यवतमाल की यह स्थिति दिखाती है कि छोटे किसानों को बचाने के लिए केवल राहत नहीं, बल्कि दूरगामी नीतियों की तत्काल जरूरत है।
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