मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में पांगरी मध्यम सिंचाई बांध परियोजना से प्रभावित किसानों ने 8 जनवरी को पत्ते पहनकर प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन किया और भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के तहत दोगुने मुआवज़े की मांग दोहराई। किसान पिछले तीन साल से आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन उनका आरोप है कि सरकार उनकी मांग नज़रअंदाज़ कर रही है।
लेखन – हिंदुजा
मध्य प्रदेश में पत्ते पहनकर किसान क्यों कर रहे विरोध प्रदर्शन?
मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में किसानो ने अपने शरीर में पत्ते पहनकर एक बांध परियोजना के खिलाफ एक प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन किया। जागरण के अनुसार, ये प्रदर्शन बीते कल 8 जनवरी को मध्यम सिंचाई पांगरी बांध परियोजना से प्रभावित किसानो ने किया। ये किसान बीते तीन सालों से उचित मुआवजे की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन अब तक उनकी मांग पर कोई सुनवाई नहीं हुई है। किसानो ने शरीर में केले के पत्ते और सिर पर सागौन के पत्ते पहनकर भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 के तहत अनिवार्य रूप से अधिग्रहित भूमि के लिए दोगुने मुआवजे की मांग की। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे रवि पटेल का कहना है कि जब तक प्रभावित किसानों को उनको उचित मुआवजा नहीं मिलता, तब तक यह आंदोलन खत्म नहीं होगा।
इसी दिन प्रदेश के जल संसाधन मंत्री एवं जिले के प्रभारी मंत्री तुलसी सिलावट बुरहानपुर प्रवास पर थे। इसके बावजूद उन्होंने न तो किसानों से बातचीत की और न ही उनकी पीड़ा जानने की कोशिश की। किसान नेताओं का आरोप है कि मंत्री केवल भाजपा कार्यकर्ताओं से मुलाकात कर लौट गए, जिससे किसानों में गहरा आक्रोश है।
मध्यप्रदेश में किसान पत्तों में लिपटकर सड़कों पर उतरे। संदेश साफ़ है—ज़मीन छीनी तो कपड़े भी नहीं बचेंगे। यह ड्रामा नहीं, किसानों की बेबसी है। #MP #farmerprotests pic.twitter.com/0jRUJDSM4W
— अपूर्व اپوروا Apurva Bhardwaj (@grafidon) January 9, 2026
विरोध प्रदर्शन का उद्देश्य
इस विरोध प्रदर्शन से किसान अपने वैध दावों को लेकर कोई आधिकारिक कार्यवाही न होने से अपनी नाराज़गी को उजागर कर रहे हैं। NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, प्रभावित किसान तीन साल से भी ज़्यादा समय से लगातार धरने पर बैठे हैं, ज्ञापन सौंप रहे हैं और ये प्रदर्शन आयोजित कर रहे हैं, जिसमें वो बाजार दर से दोगुनी दर पर मुआवजे की मांग कर रहे हैं, जो उनके अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में अधिग्रहित भूमि पर लागू होता है।
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क्या है मांग?
किसानों ने कहा कि उनकी मांग भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवज़ा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 पर आधारित है। इस कानून में ग्रामीण इलाकों में ली गई ज़मीन के बदले बेहतर मुआवज़ा और पुनर्वास का प्रावधान है। किसानों ने संविधान के अनुच्छेद 21, यानी सम्मान के साथ जीवन जीने के अधिकार, और अनुच्छेद 300 A, यानी संपत्ति के अधिकार का भी हवाला दिया। उनका कहना है कि बिना किसानों की सहमति, पारदर्शिता और उचित मुआवज़े के ज़मीन लेना गलत है।
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे डॉ. रवि कुमार पटेल ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह अपनी ज़िम्मेदारी से बच रही है। उन्होंने NDTV से कहा, “सरकार चाहती है कि किसान बिना ठीक इलाज, पढ़ाई, सुविधाओं और खाने-पहनने जैसी बुनियादी ज़रूरतों के आदिम लोगों की तरह ज़िंदगी जिएं। इसी वजह से सरकार बहुत कम मुआवज़ा देकर इस मामले को खत्म करना चाहती है।”
क्या होंगे आगे के कदम
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार उनकी मांगों को नजरअंदाज करती रही तो आंदोलन और तेज हो जाएगा, और किसी भी तरह की हिंसा की जिम्मेदारी अधिकारियों पर होगी।
यह विरोध प्रदर्शन जिले के प्रभारी मंत्री और जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावत के बुरहानपुर दौरे के साथ हुआ। आंदोलन पर प्रतिक्रिया देते हुए सिलावत ने कहा कि सरकार किसानों की मांगों पर “गंभीरता से विचार कर रही है”।
हालांकि, किसानों ने कहा कि केवल आश्वासन से काम नहीं चलेगा। एक प्रदर्शनकारी ने कहा, “हमें बयान नहीं, फैसले चाहिए। मुआवजा मिलने पर ही हमारा संघर्ष समाप्त होगा।”
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