खबर लहरिया Blog ठण्ड से बचाती आग ही नहीं, रिश्ते भी जोड़ती है

ठण्ड से बचाती आग ही नहीं, रिश्ते भी जोड़ती है

सर्दियां आते ही गांवों से लेकर शहरों की गलियों तक एक अनोखा नजारा लगभग एक जैसा दिखने लगता है वो है अलाव के चारों ओर जमा लोग। बाहर की ठंड भले ही कड़ाके की दांत किटकिटाने वाली हो पर उस जलती आग के पास एक अलग ही तरह की गर्मी महसूस होती है। वह गर्मी सिर्फ शरीर को नहीं मिलती, लोगों के दिलों को भी जोड़ती है।

रिपोर्ट: सुनीता देवी, लेखन: गीता देवी 

Beyond this is the world of relationships

अलावा है रिश्तों का संसार (फोटो साभार-सुनीता देवी)

सर्दियां आते ही गांवों से लेकर शहरों की गलियों तक एक अनोखा नजारा लगभग एक जैसा दिखने लगता है वो है अलाव के चारों ओर जमा लोग। बाहर की ठंड भले ही कड़ाके की दांत किटकिटाने वाली हो पर उस जलती आग के पास एक अलग ही तरह की गर्मी महसूस होती है। वह गर्मी सिर्फ शरीर को नहीं मिलती, लोगों के दिलों को भी जोड़ती है। इसलिए सर्दियों के आते ही खासकर गांव कि गलियों में जगह- जगह अलाव के आसपास सामाजिक रिश्तों की गर्माहट दिखाई देती है। जहां आग की लौ के आसपास बड़े बुजुर्गो के साथ बच्चे और महिलाएं भी बैठी होती हैं। आग की लौ केवल ठंड दूर नहीं करती बल्कि रिश्तों की दूरी भी पिघलाती है। बड़े-बुज़ुर्ग आपस में बातचीत करते हैं और बच्चों को किस्से-कहानियां भी सुनाते हैं। बच्चे उत्साह और खुशी से उन्हें सुनकर अपनी संस्कृतिक से जुड़ते हैं। यह परंपरा सामूहिकता, भाईचारे और पीढ़ियों से चली आ रही उस मिठास को जीवित रखने का जरिया बन जाती है जो आधुनिक जीवन की भागदौड़ और तकनीकी के चलते कम हो गई है। मतलब इंसानियत की असली गर्मी का एहसास कराता है अलाव।बदलते  दौर ने आधुनिक जीवन की तेज रफ्तार, मोबाइल की रोशनी और अकेलेपन के शोर के बीच लोगों को बांट दिया है। अलाव एक ऐसी चीज से जो भले ही सर्दियों में ही जलता है पर लोगों को सामूहिकता और भाईचारे का मतलब याद दिलाता है।

जब अलाव जलते हैं तो दूरियां भी पिघल जाती हैं

Bonfire and morning view of the village

अलाव और सुबह से दिखने वाला गांव का नजारा (फोटो साभार-सुनीता देवी)

चित्रकूट जिले के सुरौधां गांव की सुआकली कहती हैं कि सुबह जानवरों को चारा- भूषा देने  और घर का काम करने के बाद हाथ-पैर गलन के मारे ठन्डे पड़ जाते हैं तब सब लोग बैठकर आग सेंकते हैं। शाम को भी दिन ढलते ही लोग अलाव जलाने के लिए निकल पड़ते हैं। कोई लकड़ियां उठाए, कोई सूखे पत्ते समेटता हुए तो कोई धान की पराली और गोबर के उपले लिए हुए और फिर अलावा जलाते हैं और देर रात तक बच्चे बुजुर्ग सभी बैठकर किस्से-कहानी और बातें करते हैं। बहुत मजा आता है और समय का पता भी नहीं चलता। बुजुर्गो से बहुत कुछ सिखने को मिलता है। शहरों में भी ठंड आते ही सुबह हो या शाम कॉलोनियों, चौराहों, स्टेशन, बस स्टॉप और दुकानों के आगे लोग अलाव जलाकर इकठ्ठे होने लगते हैं। हर कोई अपने-अपने दिन की भागदौड़ छोड़कर कुछ क्षणों के लिए ही सही पर उस गर्माहट के साझेदारी में घुल मिल जाते हैं।

अलाव के पास किस्सों-कहानियों का संसार भी

बुजुर्ग जब बोलना शुरू करते हैं तो आग की लपटें मानो उनके शब्दों की लौ पर थिरकने लगती हैं। वे बहादुरी, लोक कथाओं, गांव के पुराने किस्सों से लेकर जीवन में क्या सही है और क्या गलत उनकी सीखों तक, सब कुछ सरल अंदाज़ में सुना देते हैं। बच्चे उन कहानियों को आंखें फैलाकर खुशी से ऐसे सुनते हैं मानो आग की रोशनी में उनके अपने सपने चमक रहे हों।

कहानियों का रंग और अलाव की रोशनी 

The flame of the bonfire among the elderly and the joy of the children

बुजुर्गों के बीच अलाव की लौ और बच्चों की खुशी (फोटो साभार-सुनीता देवी)

गीता कहती हैं- “मैं जब अपने चाची के मायके गई थी तो मैंने देखा कि सुबह और शाम दोनों टाइम अलाव जलता है और उसके आसपास लगभग 20 से 25 लोग बच्चों और बुजुर्गो को मिला कर बैठते हैं। मेरे नाना भागवत प्रसाद शाम को अलावा ताप रहे बच्चों को कहानी सुनाते थे और सुनकर बहुत मजा आता था। एक बार उन्होंने बताया कि एक चरवाहा ठंडी रात में जंगल में भटक गया लेकिन उसकी सूझ-बूझ ने उसे न सिर्फ रास्ता दिखाया बल्कि उसकी जान भी बचाई ये कहानी सुनाई। ऐसी दो-तीन लाइनों में बुज़ुर्ग बिना किताब खोले और पहले से कुछ भी न याद किए बिना ऐसे कहनियां सुना देते थे जैसे पूरी दुनिया रच दी हो।”

अलाव के गर्माहट की असली पहचान

अलाव ऐसा मौका देता है जहां अमीर, गरीब, युवा, बुज़ुर्ग और अपने पराए सभी लोग  एक साथ होते हैं और सभी भेदभाव मिट जाते हैं। यहां एक साथ बैठकर लोग हंसी भी साझा करते है। चाय की भाप के साथ उसकी चुस्की भी और छोटी-छोटी खुशियां और परेशानियों की बातें भी। किसी को नौकरी का तनाव है, कोई बच्चों की पढ़ाई को लेकर चिंतित है तो कोई खेती या काम-धंधे की चर्चा करता हैं। इन सभी बातों के साथ बच्चे कहानियां सुनने की इन्हीं सब बातों के बीच एक अपनापन होता है।

आधुनिकता के इस दौर ने एक घर में रहते हुए भी बनाई दूरी

कमलेश कहते हैं कि आज के इस आधुनिक दौर में जहां लोग एक ही घर में रहते हुए भी एक-दूसरे से दूर होते हुए नज़र आते हैं और कम बातें करते हैं। बड़े हो या बच्चे सब मोबाइल पर ही घुसे रहते हैं, मानो यही उनकी दुनिया है। बुजुर्गो की तो कोई पूछं ही नहीं रह गई क्योंकि किसी के पास समय ही नहीं है। वहीं पर यह जलता हुआ अलाव इंसानी रिश्तों में फिर से उजाला जगा देता है।

पीढ़ियों के बीच का पुल हैं रिश्ते 

बच्चे जब अपने बुजुर्गों से सर्दियों में अलाव के पास बैठकर दुनिया कि रचना, बर्फ, ओस, खेती, पेड़ों, बहादूरी और त्योहारों की कहानियां सुनते हैं तो ऐसा लगता है जैसे एक पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी को अपनी कोई पुरानी अनमोल संस्कृतिक गाथा सौंप रहें है। जो न किताबों से मिलती है और न मोबाइल से। यह मिलती है तो बुजुर्गो के साथ बैठने से।

अलाव क्यों जरूरी है

gossip between the old and the young

बुजुर्ग और युवा के बीच गपशप (फोटो साभार सुनीता देवी)

क्योंकि यह अकेलेपन को पिघलाता है और बच्चों को संस्कृति से जोड़ता है। परिवार और पड़ोस की दूरी कम करता है। इंसानियत की असली गर्मी का अनुभव कराता है। वैसे ही जैसे आग के पास बैठकर हाथ सेंकते हुए एक दुसरे के स्वास्थ्य और परिवार में क्या चल रहा है जैसी बातों का हालचाल पूंछना होता है। आज के बदलते दौर ने शहरों की ऊंची इमारतों और रोज़मर्रा की भागदौड़ के बीच जो रिश्तों को कमजोर कर दिया है, तब अलाव हमें फिर याद दिलाता है कि जीवन सिर्फ काम और स्क्रीन नहीं है।

जीवन साथ बैठने और अपने मन की बात दूसरो के साथ साझा करने का और एक-दूसरे की मौजूदगी में सुकून पाने का नाम भी है।

 

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