खबर लहरिया Blog समाज में विधवा महिला के जीवन और संघर्ष की लड़ाई

समाज में विधवा महिला के जीवन और संघर्ष की लड़ाई

अपनी 16 साल की बेटी अनू के साथ सावित्री नाम की एक विधवा महिला छत्तीसगढ़ जिले के एक गांव में रहती थी। सावित्री की शादी के बाद पति ने उसका नाम बदलकर विमला रख दिया। पति की मौत के बाद उसने अपनी बेटी को अकेले ही पाला। जब अनु छोटी थी तब उसकी मां यानी सावित्री जब भी कहीं बाहर काम करने जाती तो अनु को अपने पड़ोसी के घर छोड़ दिया करती थी। उसके पड़ोसी अनु को मारते-पीटते थे। उसकी मां अनु के खाने के लिए कुछ छोड़ कर जाती तो वे लोग उसे वह भी नहीं देते थे।

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उस समय अनु की उम्र 4 साल थी। उसके पड़ोसी उसको धमकाते औेर कहते कि अगर उसने अपनी मां को कुछ बताया तो वह उसे कल औेर पीटेंगे। अनु डर के मारे अपनी मां से कुछ भी नहीं कहती थी। अपनी माँ के आने के समय वह दरवाज़े के पास खड़ी होकर देखती रहती। जब सावित्री काम करके शाम को घर आती तो उसे दूर से ही देखकर अनु दौड़ते हुए जाती और अपनी मां के गले लग जाती। मां भी व्याकुल रहती थी, अपनी बेटी को गले लगाने के लिए। दिन भर उसी को याद करती रहती कि पता नहीं मेरी बेटी ने खाना खाया होगा भी की नहीं।

मज़बूरी की वजह से सावित्री को अपनी छोटी-सी बेटी को छोड़ कर काम करने जाना पड़ता था। समाज में बात तो होती ही थी कि पता नहीं अकेली औरत दोनों का पेट कैसे भर लेती है। उसके आस-पड़ोस में रहने वाले भी उसे ताना कसते थे। ‘जरूर कहीं मुंह काला करने जाती होगी कलमूही।’

सुबह जब पानी भरने जाती और किसी ने उसे देख लिया तो कहने लगते, ‘हे! भगवान किसका चेहरा देख लिया, खुद के पति को तो खा गई। अब हमारे पीछे पड़ी है। जलन के मारे जानबूझकर सामने आ जाती है, मनहूस कहीं की।’

वह सब कुछ सुन कर चुप-चाप घर आ जाती। उसे बेकार में बहस करना पसन्द नहीं था। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था, उनकी बातों का। वह पढ़ी-लिखी, होनहार और हिम्मतवाली थी। जब उसके पति की मृत्यु हो गई तो सास-ससुर ने उसे यह कह कर घर से बाहर निकाल दिया कि, ‘हमारे बेटे को तो खा गई, अब तू हमारे कुछ काम की नहीं है। हमारे घर का चिराग तो दे नहीं सकी। इस लड़की का हम क्या करेंगे, अपने साथ ही ले जा।’

सावित्री को इस बात का दुःख नहीं हुआ। वह कहती, ‘जिस घर में मेरी बेटी के लिए जगह नहीं है, वहां मुझे रहना पसंद भी नहीं।‘ उसके मां-पापा भी नहीं थे। एक भाई था वो भी अपने ससुराल में रहता था। इस तरह से वह अपने घर वालों से दूर हो गई।

एक दिन अचानक जब मां-बेटी सो रहे थे तो रात को 1 बजे उनके दरवाजे को किसी ने बजाया। दोनों उठ कर बैठ गए और सोचने लगे कि इस वक़्त कौन होगा। एक-दूसरे की ओर डरते हुए दोनों ने एक-दूसरे को देखा। बड़ी हिम्मत करके दोनों दरवाज़े के पास गयीं और सहमी हुई आवाज़ में पूछा कौन… कौन है? पर कोई जवाब नहीं आया। फिर दोनों डरते-डरते चुप-चाप बिस्तर में आई और सुबह होने तक सोई नहीं।

उनका घर बस्ती से कुछ दूरी पर था। सिर्फ दो ही घर थे उनके घर के बगल में। उन्होंने रात वाली बात किसी को नहीं बताई। ये बात सुन कर उसके पड़ोसी उसी को गलत साबित करते। एक तो आस-पास में पहले से ही उनके बारे में गलत बातें करते थे लोग कि, ‘दोनों मां-बेटी का आचरण ठीक नहीं है। हम अपने बहन-बेटी को इनसे दूर ही रखेंगे ताकि वो भी इनकी तरह मत बन जाए। ये औरत होकर बाहर काम करने के लिए जाती है। दोनों अकेले ही रहते हैं, पता नहीं क्या-क्या कुकर्म करते होंगे, दोनों मां-बेटी मिलकर।’

कुछ दिन बीते और वो दोनों भी उस बात को भूल गए। अब अनु 6 साल की हो गई थी। उसकी मां ने उसका दाखिला सरकारी स्कूल में करा दिया। अनु अच्छे से पढ़ाई करने लगी। अब उसकी मां दूसरे गांव काम करने नहीं जाती बल्कि अपने ही गांव के किसान के घरों में बर्तन धोने जाया करती थी।

एक दिन किसान के घर कुछ मेहमान आए थे तो ज्यादा बर्तन धोने थे। जब सावित्री बर्तन धो रही थी तो किसान के यहां आए हुए मेहमान में से एक आदमी ने सावित्री को अकेले पा कर उसका हाथ पकड़ लिया और खींचने लगा। हाथ छुड़ाने के चक्कर में दोनों में खींचा-तानी हुई।इतने में घर का किसान वहां आ पहुंचा। उसे देख मेहमान ने जल्दी से हाथ छोड़ दिया। सावित्री डरते हुए, अपने काम में लग गई।

किसान ने गुस्से से सावित्री की ओर देखा और घर की तरफ चला गया। मेहमान और उसके बीच कुछ बात हुई। किसान बाहर आकर सावित्री को बोलता है, ‘तुम इस घर में काम नहीं कर सकती क्योंकि तुम इस घर में काम करने के काबिल ही नहीं हो।’

सावित्री अपनी दबी भरी आवाज़ में किसान से पूछती है, ‘मुझसे क्या गलती हुई, मैंने क्या किया, मुझे काम से मत निकालिये।’

किसान ने अपने मेहमान की गलतियों को छुपाने के लिए सावित्री को गलत साबित किया और कुछ पैसा देकर काम से निकाल दिया। सावित्री उसके सामने गुहार करती है कि इतनी मुश्किल से मुझे यहां काम मिला था, आप मुझ पर दया कीजिए। किसान पर उसकी बातों का कोई असर नहीं हुआ। वह दुःखी होकर धीरे-धीरे चलते हुए घर आ गई। घर आकर वो रोने लगी। वह खुद से कहती, ‘अब कैसे अपनी बेटी को पालूं, कैसे उसे पढ़ाऊ।’ इतने में अनु आ जाती है और उसने जल्दी से अपने आंसू पोछ लिए। जिससे अनु को पता न चले कि उसकी मां रो रही थी। उसकी माँ को रोते देख उसका भी हौसला टूट जाता।

अब शाम हो चली थी। सावित्री ने खाना बनाया। दोनों ने मिल कर खाना खाया। सावित्री खाट पर लेटे हुए सोच रही थी कि,‘अब दूसरा काम कैसे खोजूं।’ अनु अपनी पढ़ाई कर रही थी। अब वो 14 साल की हो चुकी थी। वह मन लगाकर पढ़ाई करती थी। सावित्री अपनी बेटी को पढ़ा-लिखा कर अफसर बनाना चाहती थी। इसी वजह से वह मजदूरी करती। कोई किसान अगर बुलाने आता तो ईंट के भट्टे में काम करने जाती। दूसरों के खेत में जाती। इधर-उधर अगर कोई छोटा-मोटा काम मिल जाता तो वह भी कर लेती।

ऐसे ही रूखी-सूखी खाकर दिन बीत रहे थे। एक दिन अनु के स्कूल में परीक्षा के लिए फीस जमा करना था लेकिन अनु को पता था कि उसकी मां छोटा-मोटा काम करके उसे पालती है, इतने पैसे कहां से लाएगी। कुछ दिनों से काम भी नहीं मिल रहा था तो उसकी माँ के पास पैसे तो होंगे नहीं। वहीं अगर परीक्षा की फीस नहीं दी तो परीक्षा में बैठ नहीं पाएगी। उसकी इस साल की मेहनत बेकार हो जाएगी और वो फेल हो जाएगी।

अब उसे चिंता हो रही थी कि कहां से इतने पैसे लाएं। स्कूल की छुट्टी के बाद वो यही सोचते-सोचते घर की ओर जा रही थी। रास्ते में वह एक बैग से टकरा कर गिर जाती है। बैग के आस-पास कोई नहीं होता। जब वह बैग खोलकर देखती है तो उसमें उसे नोटों के तीन बंडल और दो जोड़े पैंट-शर्ट के रखे हुए मिलते हैं। वह इधर-उधर देखती है और सोचती है कि पता नहीं किसका बैग है। वह कुछ देर ये सोच कर खड़ी रही कि कोई आएगा, तो लौटा देगी। वह आधे घंटे तक रुकी लेकिन कोई भी नहीं आया। उसने नोटों की गड्डियों को अपनी बैग में रख बैग को किनारे रख दिया।

वह मन में सोचने लगी कि अब मेरी मां को किसी के घर बर्तन धोने नहीं जाना पड़ेगा। मेरी पढ़ाई भी नहीं रुकेगी। मैं अपने लिए नए-नए ड्रेस खरीदूंगी। मां के लिए साड़ी भी। हम दोनों आज ही बाजार जाएंगे। उसके खुशी का ठिकाना नहीं था। उसे घर पहुंचने की बड़ी जल्दी थी।वह अपनी मां को बताने के लिए उत्साहित थी।

इतने में एक 70 साल का बूढ़ा आदमी रोते हुए उसके आगे से कहते हुए गुजरा, ‘ना जाने कहां पर गिर गया मेरा बैग।’ वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते हुए रो-रो कर बोल रहा था। ‘अब मैं अपनी पत्नी को कैसे मुंह दिखाऊंगा, उसे अगर पता चलेगा तो वो तो मर ही जाएगी। अब मैं अपनी बेटी की शादी कैसे करूंगा।’ वह पागल की तरह इधर-उधर उस बैग को ढूंढ़ रहा था।

अनु मन में सोचने लगी कि, शायद वो बैग इनका ही था। हम तो जैसे-तैसे करके जी ही रहे हैं पर इस बेचारे की तो बेटी की शादी रुक जाएगी। मुझसे ज़्यादा इन पैसों की जरूरत इसको है। ऐसा कह कर वो उस बूढ़े आदमी को आवाज़ देते हुए कहती है, ‘अरे वो दादा सुनिए तो, आप क्यों रो रहे हैं। आप कुछ खोज रहे हो? बूढ़े ने कहा, हां बेटी मेरा पैसों से भरा बैग कहीं गिर गया, उसे ही खोज रहा हूं।’

अनु ने उसे बताया कि,‘मैंने उस बैग को वहां पड़ा हुआ देखा है। चलिए मैं आपको बताती हूं।’

इतना सुनते ही उस बूढ़े आदमी के चहरे पे हल्की सी मुस्कान आई। वह अनु से पूछने लगा कहां देखी हो बेटी, मुझे जल्दी बताओ। अनु ने जिस जगह उस बैग को रखा था, उसी जगह पर वह उस व्यक्ति को लेकर गई।

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उसने कहा, ‘मैं जब स्कूल से आ रही थी तो देखा की ये बैग पड़ा हुआ था। मैंने उठा कर देखा तो इसमें नोटों का बंडल था। इसके आस -पास कोई नहीं था तो मैंने उठा लिया। अच्छा हुआ आप मिल गए, लीजिए आपका पैसा गिन लीजिए, जितना था, उतना है की नहीं।’

‘अच्छा बेटी देखता हूं’, बूढ़े आदमी ने सारे पैसे गिने। सारा पैसा जैसे का तैसे था।

उस बूढ़े आदमी ने अनु की ईमानदारी को देख कर पूछा, कि तुम्हारा नाम क्या है बेटी, तुम कहां रहती हो? तुम्हारे मां-पापा कहां रहते हैं? तब अनु ने बताया, मेरा नाम अनु है। मैं यहीं रहती हूं, मेरी मां के साथ।

तब बूढ़े आदमी ने उसके पापा के बारे में पूछा। अनु ने बताया कि मेरे पापा नहीं है। जब मैं 3 साल की थी, तब मेरे पापा गुज़र गए। ये सब सुन कर उस बूढ़े आदमी को उस पर दया आ गई और वो उसके मां से मिलवाने को कहने लगा। तब अनु उन्हें अपने घर ले गई।

वह घर आई तो उसकी मां चावल चुन रही थी। अनु के साथ उस बूढ़े आदमी को देख कर उसकी मां चावल को छोड़ कर खड़ी हो गई। अनु ने घर पहुंचते ही खुशी से अपनी मां को सारी बात बताई कि उसके साथ क्या हुआ था। ये सब सुन कर सावित्री की आंखों में आसूं आ गए। वो खुश थी कि उसकी बेटी इतनी छोटी उम्र में इतनी ईमानदार है। उसने अनु को गले लगा लिया और उसकी पीठ थप-थपाने लगी। ये देखकर बूढ़े आदमी के आंखों में भी आंसू आ गए। वह कहने लगा, अगर आपकी बेटी की जगह कोई और इंसान होता तो वो कभी मेरा पैसा वापस नहीं करता। आप सच में बहुत भाग्यशाली हो, जो आपको ऐसी बेटी मिली।

बूढ़ा व्यक्ति रिटायर्ड प्रिंसिपल था। उसे उन दोनों पर दया आ गई और वो कहने लगा, अगर मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूं तो ज़रूर बताना। सावित्री ने उस आदमी को धन्यवाद दिया। वहीं बूढ़े व्यक्ति ने अनु को धन्यवाद किया। अब कुछ दिन जैसे-तैसे बीतें।

एक दिन कुछ काम के सिलसिले में वो बूढ़ा आदमी अनु के गांव आया था। उसे अनु की याद आ गई और वह उससे मिलने उनके घर चला गया। सावित्री ने अपने हालात उसे बताया कि वो लोग किस तरह जिंदगी जी रहे हैं। कोई काम-धंधा नहीं है उनके पास।

सावित्री के लिए उस बूढ़े आदमी के पास एक काम था। जहां वह प्रिंसिपल था वहां काम करने के लिए एक औरत की ज़रूरत थी। उसने सावित्री को पूछा, क्या तुम हमारे स्कूल में चपरासी का काम करना चाहोगी। सावित्री को काम की तलाश ही तो थी, उसने हां कर दिया। उसने सावित्री को उस जगह काम दिलवा दिया। कुछ महीने यूं ही बीते।

उसी स्कूल में चरण नाम का एक टीचर था। वो काफी दिन से सावित्री को देखता था शायद वो उससे प्यार करने लगा था। कभी-कभी सावित्री भी उसे देखती थी। शायद दोनों ही एक दूसरे को प्यार करने लगे थे। अब कुछ दिन और बीते।

दोनों एक-दूसरे से शादी करना चाहते थे पर समाज के डर से दोनों यूहीं छुप-छुप कर मिला करते थे। एक दिन गांव के एक आदमी ने चरण और सावित्री को मिलते देख लिया। इसके बाद समाज में बैठक बुलवाई गयी। उन दोनों को बुलाया गया। समाज के लोगों ने सावित्री को ही गलत साबित किया क्योंकि चरण की शादी नहीं हुई थी और सावित्री एक बेटी की मां थी और विधवा भी।

समाज में कहा जाता है कि विधवा को ना तो प्यार करने का अधिकार है, ना ही दोबारा शादी करने का।

एक तो सावित्री दूसरे जाति की थी और चरण भी अलग जाति का था। बैठक में आए लोग सावित्री को मारने के लिए तिलमिला रहे थे क्योंकि उसने समाज के खिलाफ जाने की हिम्मत की थी। समाज की परम्परा को तोड़ा था। महिलाएं तो सावित्री को जला कर मारने पर आतुर हो आई थी। इतने में चरण ने सबको रोका और कहने लगा, ‘मैं इससे प्यार करता हूं और इसी से शादी भी करूंगा। देखता हूँ मुझे कौन रोकता है। मुझे इस समाज से कोई मतलब नहीं है, जो महिलाओं के प्रति ऐसी घटिया सोच रखता है।’

चरण ने अपने घर में मां-पापा से बात की। विधवा और एक माँ बच्चे की माँ, ऊपर से अलग जाति होने की वजह से सावित्री को अपनाने से मना कर दिया। वह उनके जाति में ही अपने बेटे चरण की शादी की करवाना चाहते थे।

एक दिन सावित्री और चरण ने मिलकर फैसला लिया कि, ‘अब हम इस गंदे समाज में नहीं रहेंगे कहीं दूर चले जाएंगे।’ एक रात चरण, सावित्री और अनु अपना सारा सामान पैक करके चुप-चाप गांव छोड़कर चले गए। यह तो नहीं पता कि इस समय वह कहां रह रहें हैं पर सुनने में आया है कि वह किसी दूर के शहर में खुशी से रह रहे हैं।

समाज में विधवा होना और विधवा का जीवन जीना कभी आसान नहीं था। अपने सम्मान, प्यार, ज़िन्दगी और हक़ की लड़ाई सावित्री ने आखिर तक लड़ी। समाज भी उसे गिराने में पीछे नहीं हटा। जिस समाज ने उसे नहीं अपनाया उसने उस समाज को छोड़ दिया और अपने नए ज़िंदगी का सफर शुरू किया।

इसे खबर लहरिया के लिए छत्तीसगढ़ फेलो गायत्री द्वारा रिपोर्ट किया गया है। 

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