आज कल की ठगी के तरीके इतने बदल चुके हैं कि ये नहीं कहा जा सकता कि सिर्फ कम साक्षरता वाले लोगों के साथ इस तरह की ठगी होती है। इसमें बड़े – बड़े बिज़नस मेन, व्यापारी भी इस डिजिटल ठगी से नहीं बच पाए हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि जिन लोगों के पास डिजिटल जानकारी कम होती है वे जल्दी फंस जाते हैं। खासकर ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले लोग जिनको मोबाइल और इंटरनेट की पूरी जानकारी नहीं होती है।
आज के दौर में डिजिटल ठगी का नाम तो सुना ही होगा। डिजिटल ठगी कोई नई बात नहीं है बस इसका तरीक़ा बदल गया है। पहले ठगी या धोखा आमने – सामने या फ़ोन पर लोगों को झांसे में लेते थे लेकिन अब मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया के ज़रिए यह काम और आसान हो गया है। ठगी का मतलब यही होता है कि कोई व्यक्ति चालाकी से आपको बहकाकर आपके पैसे या आपकी निजी जानकारी निकलवा लेते हैं। कई बार लोग खूद ही झूठी बातों में आकर पैसा भेज देते हैं जैसे नकली निवेश योजना, फर्जी वेबसाइट या सस्ते सामान का लालच। वहीं कई मामलों में ठग (स्कैमर) चोरी छिपी सभी जानकारी हासिल कर लेते हैं और खाते (अकाउंट) से पैसे निकाल लेते हैं। Observer Research Foundation (2024-25) के अनुसार भारत में फैलने वाली 70% से ज़्यादा गलत खबरें whatsapp के ज़रिए फैलती है।
छाया राजपूत (हेल्पलाइन फैसिलिटेटर, पोईंट ऑफ़ व्यू मुंबई) कहती है –
आज के समय में तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने ठगों का काम और आसान कर दिया है। अब उन्हें बड़े ठगी करने के लिए बहुत ज़्यादा तकनीक ज्ञान की जरुरत नहीं होती। कंप्यूटर और मोबाइल के मदद से वे हज़ारों नकली मैसेज ईमेल और वेबसाइट बना लेते हैं जो बिल्कुल असली जैसी दिखती है। इस तरह की फोटो भी बनने लगी है। जैसे ही उस लिंक या फोटो को क्लिक करते हैं या कॉल करते हैं ठग उससे ओटीपी, पासवर्ड या बैंक की जानकारी निकलवा लेता है। आज कल की ठगी के तरीके इतने बदल चुके हैं कि ये नहीं कहा जा सकता कि सिर्फ कम साक्षरता वाले लोगों के साथ इस तरह की ठगी होती है। इसमें बड़े – बड़े बिज़नस मेन, व्यापारी भी इस डिजिटल ठगी से नहीं बच पाए हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि जिन लोगों के पास डिजिटल जानकारी कम होती है वे जल्दी फंस जाते हैं। खासकर ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले लोग जिनको मोबाइल और इंटरनेट की पूरी जानकारी नहीं होती है।
इसमें कुछ रिपोर्ट्स के आंकडे बताते हैं कि भारत में डिजिटल वित्तीय साक्षरता अभी भी कमजोर है। RBI (2023) के अनुसार सिर्फ 27% भारतीयों को डिजिटल पैसों से जुड़ी बुनियादी जानकारी है जबकि ग्रामीण इलाक़ों में स्थिति और खराब है। Cyber Crime Unit (2023) के अनुसार राजस्थान में 2021 से 2023 के बीच ऑनलाइन ठगी के मामले 40% बढ़े हैं।
डिजिटल अरेस्ट क्या और इसमें क्या होता है?
आजकल ठगी के एक नया और खतरनाक तरीके सामने आने लगे हैं जिसे डिजिटल अरेस्ट का नाम दिया गया है। इसमें ठग खूद को पुलिस, सीबीआई, कोर्ट या कोई और सरकारी विभाग या अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं। वे पहले फ़र्जी नोटिस या लेटर ऑनलाइन भेजते हैं जो देखने में बिल्कुल सरकारी दस्तावेज लगता है। ऐसे में आम व्यक्ति तुरंत ही उसमें भरोसा कर बैठता है। इसके बाद ठग वीडियो कॉल के ज़रिए संपर्क करते हैं और कहते हैं कि अब आपको लगातार उनके साथ वीडियो कॉल पर या फिर ऑनलाइन तरीके से जुड़ा रहना होगा। वे यह भी निर्देश देते हैं कि व्यक्ति उसके बिना कोई अनुमती कहीं न जाए। किसी से बात न करें और किसी को इसकी जानकारी न दें। इस तरह व्यक्ति को मानसिक रूप से जकड़ या बांध लिया जाता है जैसे वह सच में हाउस अरेस्ट हो। फिर वह व्यक्ति मानसिक रूप से अरेस्ट हो जाता है जिसे ही डिजिटल अरेस्ट का नाम दिया गया है।
छाया राजपूत बताती हैं कि अक्सर ठग पुलिस की वर्दी पहनकर या किसी प्रोफेशनल दिखने वाले ऑफ़िस जैसे बैकग्राउंड से वीडियो कॉल करते हैं ताकि उनकी बात में लोग बिना सोचे आसानी से आ सके। वे लोगों को डराते हैं कि अगर वे उनकी बात नहीं मानी तो उसे जेल हो सकती है या उसपर क़ानूनी कार्यवाही होगी। डर और घबराहट की हालत में व्यक्ति ठीक से सोच नहीं पाता और ठगों के निर्देशों पर चलने लगता है। इसके बाद ठग उससे मनचाही रकम की मांग करते हैं या उसकी बैंक खाते और निजी जानकारी की जांच के बहाने पैसे निकलवा लेते हैं। इस तरह डिजिटल अरेस्ट में व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक और तकनीकी तरीके से क़ाबू में किया जाता है।
डिजिटल ठगी के गिरफ़्त में आए लोग
अख्तर खान गांव बदौसा बांदा जिले के रहने वाले हैं और एक व्यवसायी हैं उनसे बात करने पर उन्होंने बताया कि उनके साथ भी हालही में ऑनलाइन तरीके से ठगी हुई है। उन्होंने एक ऑनलाइन प्लेटफ़ोर्म से पैसे निकलने की कोशिश की। यह प्लेटफ़ोर्म DGP के नाम से चल रहा था और फ़िंगरप्रिंट से पैसे निकालने का दावा करता था। ठग द्वारा उनसे कहा गया की खाते में 30 – 35 हजार रुपए जमा होंगे तभी पैसे निकाले जा सकेंगे। उन्होंने पैसा जमा कर दिया लेकिन जब जब पैसे निकालने की बारी आई तो न ही लॉग – इन काम आया न ही कोई पिन। कस्टमर केयर वाला नंबर भी बंद कर दिया गया। फिर उन्होंने क्राइमब्रांच में शिकायत दर्ज करवाई जहां अभी कार्यवाही चल ही रही है।
अख्तर खान कहते हैं कि “जानकारी होने के बाद भी मैं ठगी का शिकार हो गया। मुझे लगा यहां कुछ गलत नहीं होगा इसलिए सही से जाँचा नहीं था। आजकल बहुत से लोग ऐसे फ़्रॉड का शिकार हो रहे हैं लेकिन शर्म, डर और झिझक के वजह से अपनी बातें किसी को भी नहीं बताते। लोग सोचते हैं कि कहीं उनका मज़ाक़ नहीं उड़ाया जाए। कोई ये न कह दे कि इतना पढ़ा लिखा होकर भी ठगी में फंस गए।” अब अख्तर खान किसी भी चीज़ पर भरोसा करने से पहले पूरी जांच करते हैं और दूसरों को भी इस तरह की ठगी से बचने के लिए सलाह देते हैं।
एक और व्यक्ति जिनका नाम विष्णु कुमार है और बुंदेलखंड के रहने वाले हैं जो एकपरियोजना कोऑर्डिनेटर हैं। वे भी इस डिजिटल ठगी से बच नहीं पाए। वे बताते हैं कि 2025 जनवरी फरवरी के आसपास उन्हें टेलीग्राम पर एक मैसेज मिला। उसमें ये कहा गया की एक स्क्रीनशॉर्ट लेकर भजें और उनके पोस्ट पर लाइक करें इसका उन्हें पैसा दिया जाएगा। विष्णु कुमार ने पैसा दे दिया। शुरुआत में एक दो बार पैसे वापस मिले लेकिन जैसे ही उन्होंने ज़्यादा पैसा लगाया सामने वाले ने पैसा लेकर अपना टेलीग्राम अकाउंट ही डिलीट कर दिया और उनसे सारी संपर्क टूट गई।
विष्णु कुमार कहते हैं “जब पढ़े लिखे लोग ठगी में फंस सकते हैं तो तो बिना पढ़े लिखे लोगों का क्या होगा? लोग इसका शिकायत भी नहीं करते हैं लोग मज़ाक़ उड़ाएँगे, समाज क्या कहेगा?” वे मानते हैं कि गलती से ही सीख मिलती है। “मेरे कुछ पैसे भले ही चले गए लेकिन मैं जागरूक हो गया। अब मैं दूसरों को भी ऐसी ठगी से बचने के लिए सावधान करता हुं।”
डिजिटल ठगी का महिलाओं पर
छाया राजपूत ने बताया कि डिजिटल ठगी का का असर महिलाओं पर गंभीर तरीके से होता है। टेक्नोलोजी के ज़रिए होने वाली जेंडर आधारित हिंसा में अक्सर महिलाओं को ही निशाना बनाया जाता है। कई मामलों में उनके सोशल मीडिया या फिर बैंक अकाउंट हैक कर लिए जाते हैं जिनसे उन्हें मानसिक और आर्थिक नुक़सान उठाना पड़ता है। उन्होंने बताया महिलाओं को ये कह कर डराया जाता है कि उनकी अश्लील फोटो बना कर वायरल कर दिया जाएगा या फिर परिवार में भेज दिया जाएगा और ऐसे कह कर उनसे बड़ी रकम निकलवा लिया जाता है।
उन्होंने बताया कि ग्रामीण इलाक़ों में महिलाओं को ठग खास तौर पर टार्गेट करते हैं। उन्हें वर्क फ़ॉर्म होम का लालच दिया जाता है क्यों कि वहां वर्क फ़ॉर्म होम या ऐसी नौकरियों की जानकारी कम होती है। कई महिलाओं को पेंसिल पैकिंग, कोलगेट पैकिंग आ इसी तरह के काम का झांसा देकर ठगा गया है। ये स्कैम इस तरह पेश किए जाते हैं कि काम बहुत आसान और कमाई पक्की लगे जिससे महिलाएं जल्दी भरोसा कर लेती हैं और फंस जाती हैं।
Observer Research Foundation (2024-25) की एक स्टडी के अनुसार 47% ने कहा है कि ठगी के डर से वे डिजिटल पेमेंट बैंकिंग का इस्तेमाल नहीं करती हैं। कई महिलाओं को ठगी वाले मैसेज मिलते हैं लेकिन उन्हें शिकायत करना नहीं आता है। आँकड़ों के अनुसार सिर्फ 5% महिलाएं ही ऑनलाइन से मिली ऐसी खबरों की जाँचती है। Reserve Bank of India (2022) के द्वारा की गई सर्वे के मुताबिक ग्रामीण इलाक़ों में होने वाली डिजिटल ठगी के 36% मामलों में महिलाएं शामिल थीं जिनसे बैंक की जानकरी निकलवा ली गई।
टेकसखी क्या है और कब काम आ सकता है
ऐसी स्कैमों से बचने के लिए कुछ एप बने हुए हैं जिसमें शिकायत की जा सकती है जो है टेकसखी। टेकसखी एक फ़ोन हेल्पलाइन है इसे साल 2022 में पोईंट ऑफ़ व्यू ने शुरू किया था। यह भारत की पहली एसी हेल्पलाइन है जो डिजिटल सुरक्षा से जुड़े सवालों के जवाब हिंदी में देती है। इसका उद्देश्य लोगों ख़ासकर महिलाओं और जेंडर माइनॉरिटी को ऑनलाइन दुनिया में सुरक्षित रहने में मदद करना है। जब किसी को सोशल मीडिया में परेशान किया जाए, धमकी मिले, फोटो या निजी जानकारी का गलत इस्तेमाल हो या यह समझ न आए कि अकाउंट कैसे सुरक्षित रखें तब टेक सखी से मदद ले जा सकती है।
बढ़ते सालों में बढ़ते छह खतरे –
2025 में डिजिटल ठगी पहले कही ज़्यादा ख़तरनाक हो गई क्योंकि इसमें अब AI का खुलकर इस्तेमाल हो रहा है। ये स्कैम असली और नकली के फर्क को मिटा ही दे रहा है। इसके छह सबसे मेन तरीके देखे जा सकते हैं –
- डिपफ़ेक नक़ल – इस डिजिटल ठगी में कुछ कुछ सेकंड की आवाज या फोटो से किसी अफसर या रिश्तेदार जैसा वीडियो बनाकर लोगों से पैसे ट्रांसफ़र करवा लेना।
- लंबे समय का निवेश स्कैम – पहले दोस्ती या प्यार का भरोसा बनाते हैं फिर नकली क्रिप्टो या ट्रेनिंग एप में पैसा डलवाकर गायब हो जाते हैं।
- मैसेज और जॉब स्कैम – आसान काम, जल्दी कमाई वाले मैसेज भेजकर पहले छोटा भुगतान दिखाते हैं फिर बड़ी रकम ऐंठ लेते हैं।
- रेडीमेड फ्रोड टूल्स – अब ठगों को तकनीक जानने की जरुरत नहीं होती बाजार में फ़िशिंग और नकली वेबसाइट बनाने के तैयार टूल मिल जाते हैं।
- सेलिब्रिटी क्रिप्टो डिपफ़ेक – मशहूर लोगों की नकली वीडियो बनाकर फ़र्जी निवेश योजनाओं का प्रचार किया जाता है।
- डिजिटल गिरफ़्तारी स्कैम – इसमें खूद को पुलिस या कोर्ट या फिर किसी सरकारी अधिकारी बताकर डराया जाता है कि अभी पैसा नहीं दिया तो गिरफ़्तारी हो जाएगी और फिर पैसे की मांग की जाती है।
क्या कहते हैं आँकडें –
(PIB) प्रेस इंफ़ोर्मेशन ब्यूरो की मुताबिक़ भारत में करीब 25 लाख साइबर अपराध के मामले दर्ज हुए और लगभग 9,812 करोड़ रुपए का नुक़सान भी हुआ है। इनमे ज़्यादातर मामले ऑनलाइन सट्टेबाज़ी, गेमिंग स्कैम और और वित्तीय ठगी से जुड़े थे। गृह मंत्रालय के अनुसार 2021 के बाद से साइबर अपराध लगभग 400% प्रतिशत बढ़ा है और अब इसका सबसे ज़्यादा असर ग्रामीण और अर्ध शहरी इलाक़ों में दिख रहा है। कम डिजिटल साक्षरता भाषा की दिक्कत और टू – फ़ैक्टर सुरक्षा की जानकारी न होने से लोग आसानी से ठगों के जाल में फंस जाते हैं। ख़ासकर नए इंटरनेट और ऑनलाइन बैंकिंग यूज़र केवाईसी अपडेट या लोन अप्रूवल जैसे बहानों से होने वाली ठगों का शिकार हो रहे हैं।
सुनीता एडवोकेट ने क्या कहा?
एडवोकेट सुनीता (न्याया फ़ेलोज) बताती हैं कि हर जिले में साइबर सेल बनाई गई है जहां आईटी एक्ट से जुड़े सभी मामले दर्ज होते हैं। उन्होंने बताया कि अगर कोई व्यक्ति डिजिटल ठगी या साइबर अपराध का शिकार होता है तो उसको सीधे साइबर सेल में जाकर शिकायत करनी चाहिए ताकि उसे क़ानूनी मदद मिल सके। उहोने कहा कि “ऐसे मामलों में अपराध में फंसे व्यक्ति का मदद करना आसान नहीं होता है क्योंकि हमारी न्याय व्यवस्था की प्रक्रिया काफी धीमी है। यहाँ इंसाफ़ मिलने में समय लगता है। इसके बावजूद एक वकील और सामाजिक कार्यकर्ता के होने के नाते हमारा कर्तव्य है कि लोगों को सही रास्ता दिखाएं और न्याय पाने में मदद करें।” उनका मानना है कि अगर समाज वकील और NGO मिलकर काम करें तो लोगों को न्याय जरुर मिल सकता है। वे कहती हैं कि वे सरकार से मांग करती हैं कि एक ऐसा गोपनीय टोल फ्री नंबर बनाया जाए जहां लोग बिना अपनी पहचान बताए अपनी शिकायत दर्ज करा सके और सिर्फ उनके समस्या का समाधान किया जाए।
इसका समाधान और जरुरी कदम क्या है?
– छाया ने बताया कि ठगों के पास लोगों की पूरी निजी जानकारी होती है जिससे ये लगता है कि कॉल या मैसेज किसी सरकारी दफ़्तर से आया है। वे रजिस्ट्रेशन या मदद के बहाने पूरी प्रक्रिया खुद करवा लेते हैं। ऐसे में जरुरी है क़ि किसी भी योजना या जानकारी को सरकारी वेबसाइट gov.in पर जाकर जरुर जाँचे। अगर समझ में न आए तो किसी भरोसेमंद व्यक्ति या साइबर कैफे से मदद लें।
– उन्होंने बताया कि डिजिटल ठगी और ऑनलाइन उत्पीड़न से बचने के लिए अपने रोज़मर्रा में इस्तेमाल होने वाले प्लेटफ़ॉर्म जैसे व्हाटसएप और अन्य सोशल मीडिया एप्स पर अधिक सतर्क रहने की जरुरत है। अगर किसी अंजान नंबर से फोटो, वीडियो, लिंक या किसी भी तरह का कार्ड जैसी कोई भी फ़ाइल आती है उसे बिना जांचे परखे तुरंत डाउनलोड नहीं करना चाहिए। साथ ही हर डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म को अपनी ओर से एक मज़बूत और पारदर्शी सपोर्ट सिस्टम विकसित करना चाहिए ताकि किसी भी समस्या की स्थिति में उपयोगकर्ताओं की जल्द ही मदद मिल सके।
– अगर कोई व्यक्ति साइबर ठगी या ऑनलाइन उत्पीड़न का शिकार होता है तो उसे साइबर थाने में जाकर शिकायत करनी चाहिए। हाशिए पर रहने वाले कई लोगों के लिए ऑनलाइन पोर्टल पर शिकायत करना ठीक हो सकता है इसलिए वे 1930 हेल्पलाइन नंबर पर फ़ोन कर के अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। सके बाद आवश्यकता होने पर नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर विस्तृत जानकारी दी जा सकती है। ऐसा करने पर साइबर कैफे भी मदद कर सकते हैं।
– लोगों को सरकारी सोशल मीडिया हैंडल्स को फ़ॉलो करना चाहिए ताकि उन्हें समय समय पर साइबर अपराध से जुड़ी जानकारी मिलती रहे। उन्होंने बताया इसी के साथ इंस्टाग्राम पर साइबर दोस्त जैसे अकाउंट्स के माध्यम से भी लोगों को नए तरीक़ों की ठगी और उनसे बचाव के उपायों के बारे में जागरूक किया जाता है।
– छाया राजपूत ने कहा कि “हमने साल 2020 से 2025 के बीच कई शहरों में महिलाओं और लड़कियों के साथ डिजिटल सुरक्षा से जुड़ी कई वर्कशॉप की हैं। इनमें यह सामने आया है कि महिलाओं को पासवर्ड चोरी, निजी फोटो का गलत इस्तेमाल और ऑनलाइन हिंसा जैसी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि ऐसे मज़बूत सिस्टम की जरुरत है जहां महिलाएं, हाशिए पर रहने वाले समुदाय और LGBTQIA+ लोग लोग सुरक्षित रूप से मदद ले सकें।”
– अगर किसी के साथ किसी भी तरह का ऑनलाइन ठगी या उत्पीड़न हो रहा है तो वह हेल्पलाइन पर संपर्क कर सकते हैं। कई बार सरकारी प्रक्रिया में देरी हो जाती है या पर्याप्त मदद नहीं मिल पाती है ऐसे में किसी वकील किसी NGO या सोशल वर्कर की सहायता लेकर आगे की कार्यवाही या शिकायत की जा सकती है।
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