सर्दियों के मौसम में गर्म गर्म पकोड़े मिल जाये तो बात ही क्या, लेकिन बिहार में एक खास तरह का नाश्ता मिलता है जिसे बचका कहा जाता है। वैसे तो इसे किसी खास दिन पर बनाया जाता है क्योंकि इसमें बहुत मेहनत लगती है। हालांकि इसे बनाने की विधि पकोड़े जैसी ही है लेकिन नाम बस बिहारी है। पटना ज़िले के फुलवारी नगर निगम अंतर्गत बलम्मी चक इलाके में एक नाश्ते की दुकान है, जहां बिहार का प्रसिद्ध नाश्ता मिलता है।
रिपोर्ट – सुमन दिवाकर, लेखन – सुचित्रा
यहाँ कई प्रकार के बचका मिलते हैं। वैसे तो आमतौर पर बचका तब बनाया जाता है जब घर में कोई कार्यक्रम हो – जैसे शादी, जन्मदिन की पार्टी, कोई त्योहार या फिर जब खेतों में पहली फसल आती है। उस समय किसान मजदूरों को भोजन कराने के लिए भी बचका बनाया जाता है।
दुकान खुलते ही लग जाती खानों वालों की लाइन
नीचे दी गए फोटो में देख पा रहे होंगे, दुकान पर भारी भीड़ लगी रहती है। कुछ लोग खड़े होकर नाश्ता करते हैं तो कुछ पास रखी बड़ी बेंचों पर बैठकर आराम से खाते नज़र आते हैं। यह नाश्ता हर किसी के लिए पसंदीदा है क्योंकि यहाँ का बचका बहुत ही फेमस है।
यहाँ बचका कई तरीकों से तैयार किया जाता है और इसके अलग-अलग प्रकार भी मिलते हैं। लोग यहाँ सिर्फ बचका ही नहीं खाते, बल्कि उसके साथ कई दूसरी चीज़ें मिलाकर भी खाते हैं। जब बचका को अलग-अलग चटनियों और सामग्री के साथ मिलाया जाता है तो उसका स्वाद बिल्कुल अलग ही हो जाता है। इसे आप बचका चाट भी कह सकते हैं।
यहाँ सिर्फ मजदूर या रोज़मर्रा के काम करने वाले लोग ही नहीं आते बल्कि हर वर्ग के लोग इसका आनंद लेते हैं। आसपास के बैंकों में काम करने वाले कर्मचारी, बड़ी-बड़ी दुकानों में काम करने वाले लोग और इस इलाके में रहने वाले लोग भी यहाँ से नाश्ता ज़रूर लेते हैं। कई लोग तो यहाँ बैठकर खाना पसंद करते हैं, वहीं बहुत से लोग नाश्ता पैक करवाकर अपने कार्यस्थल या घर ले जाते हैं।
करीब 42 साल पुरानी दुकान
नीचे दी गई फोटो में आप देख रहे हैं, दुकान के मालिक एक व्यक्ति हैं जिनका नाम संजय है। वे काफी वर्षों से इस दुकान को चला रहे हैं। संजय बताते हैं कि यह दुकान उनके दादा की है, जिनका नाम फौदार था। उन्हीं ने इस व्यवसाय की शुरुआत की थी।
उनका कहना है कि आमतौर पर लिट्टी, समोसा, ब्रेड पकौड़ा और तरह-तरह की चाट तो आपको हर जगह मिल जाती है, लेकिन बचका का आइडिया कुछ अलग था। बचका बिहार की एक फेमस पारंपरिक डिश है। जब भी यह घरों में बनती है तो लोगों में इसे खाने की उत्सुकता और मांग दोनों ही काफी ज़्यादा होती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उनके दादा ने बचका की दुकान शुरू करने का फैसला किया।
करीब 42 साल पहले, जब यहाँ पहली बार दुकान लगाई गई थी तब यह इलाका इतना विकसित नहीं था। इसके बावजूद बचका की वजह से लोग दूर-दूर से यहाँ खाने आया करते थे।
आज भी आपको कई तरह की नाश्ते की दुकानें मिल जाएँगी लेकिन बचका की दुकान मिलना लगभग नामुमकिन है। इसकी वजह यह है कि बचका बनाना आसान काम नहीं है। इसमें मेहनत बहुत ज़्यादा लगती है और इसमें कई तरह की परेशानियाँ भी आती हैं। यही कारण है कि घरों में भी इसे महिलाएँ रोज़ाना नहीं बनातीं। यह ज़्यादातर त्योहारों, शादी-ब्याह या किसी खास मौके पर ही बनाई जाती है, और कई बार हलवाई से बनवानी पड़ती है।
संजय बताते हैं कि यही इसकी खासियत और यूनिक आइडिया था। उनका उद्देश्य यही था कि लोगों को सिर्फ त्योहार या शादियों का इंतज़ार न करना पड़े, बल्कि जब भी मन हो, वे उनकी दुकान पर आकर बचका का स्वाद ले सकें।
दुकान चलाने में परिवार करता है मदद
नीचे दी गई फोटो में दुकान पर कई लोग काम करते नज़र आ रहे हैं। हालांकि ये सभी सिर्फ हेल्पर नहीं हैं, बल्कि दुकान से जुड़े परिवार के सदस्य ही हैं। इन्हीं में से एक व्यक्ति, जो भगोने में कुछ चला रहे हैं, उनका नाम रोहन है।
रोहन बताते हैं कि यह दुकान उनके दादा ने शुरू की थी और आज पूरा परिवार मिलकर इसे चला रहा है। लगभग 10 लोग मिलकर इस काम को संभालते हैं क्योंकि यह काम किसी एक व्यक्ति के बस की बात नहीं है।
उनकी दुकान सुबह 7:00 बजे खुल जाती है और शाम तक लगातार चलती रहती है। लेकिन अगर दुकान 7 बजे खोलनी होती है, तो इसकी तैयारी के लिए उन्हें सुबह करीब 4:00 बजे उठकर काम शुरू करना पड़ता है। कुछ काम रात में ही कर लिए जाते हैं, जैसे कि बचका बनाने के लिए होने वाली कटिंग।
बचका बनाने में कई तरह की सब्ज़ियाँ, अलग-अलग मसाले और घर का खास मसाला डाला जाता है, जिससे इसका स्वाद बेहद खास बनता है। इसके अलावा यहाँ और भी चीज़ें बनाई जाती हैं, और लोग इसे चावल के साथ खाना भी बहुत पसंद करते हैं।
चना का बचका बनाने की विधि
नीचे दी गई फोटो में आप देख सकते हैं कि दुकान में एक बड़ी सी प्लेट रखी हुई है, जिसमें पकौड़े जैसे दिखने वाले व्यंजन सजे हैं। इन्हें ही बचका कहा जाता है। यहाँ मुख्य रूप से दो तरह के बचका बनाए जाते हैं—चना का बचका और सब्ज़ियों का बचका।
चना के बचका के बारे में बताया जाता है कि चनों को पहले 12 से 14 घंटे तक भिगोकर रखा जाता है। इसके बाद उन्हें उबाला जाता है। उबालने के बाद चनों को अच्छे से छान लिया जाता है। फिर एक बड़े बर्तन में बेसन लिया जाता है और उसमें नमक व ज़रूरी मसाले मिलाए जाते हैं। इसमें धनिया और जीरा डालना बहुत ज़रूरी माना जाता है।
बचका बनाने में चावल का आटा खास
बचका को थोड़ा ज़्यादा कुरकुरा बनाने के लिए इसमें थोड़ी सी कटी हुई सब्ज़ियाँ और थोड़ा सा चावल का आटा भी मिलाया जाता है।
चावल का आटा गांव के खास पिसवाया जाता है ताकि बचका बनाया जाए और इसे दूर राज्य में बैठे रिश्तेदार चावल के आटे को मंगवाते है। पकोड़े में भी यदि चावल का आटा मिला दिया जाए तो पकोड़े बहुत कुरकुरे हो जाते है और खाने में तो लाजवाब।
इसके बाद इस मिश्रण को अच्छे से फेंट लिया जाता है। जब कढ़ाही का तेल अच्छी तरह गर्म हो जाए, तो इस मिश्रण को उसमें डालकर तल लिया जाता है। अच्छी तरह छनने के बाद चना का बचका तैयार हो जाता है।
सब्ज़ियों के बचका के लिए अलग-अलग हरी और नरम सब्ज़ियों को बारीक काटा जाता है, जैसे बंद गोभी, पालक, मटर, मेथी, कद्दू, लौकी (घीया) आदि। इन सब्ज़ियों को मसालों के साथ अच्छे से मिलाकर तैयार किया जाता है और फिर तेल में तल लिया जाता है। इस तरह सब्ज़ियों का बचका तैयार होता है।
मटर और आलू के बचके को तवे पर तेल के साथ सेक कर बनाए तो और स्वादिष्ट लगता है खाने में।
बचका के लिए खास इस दुकान पर आते हैं लोग
शंकर के मुताबिक, यहाँ की चाट बहुत ही स्वादिष्ट बनती है। अगर कोई ब्रेड पकौड़ा खाना चाहता है, तो पहले उस पर घोल (चना-बेसन का मिश्रण) डलवाया जाता है, फिर उस पर सब्ज़ी डाली जाती है। इसके बाद चटनी और सलाद भी मिलाया जाता है। इन सारी चीज़ों को मिलाकर जो प्लेट तैयार होती है, उसका स्वाद बेहद लाजवाब होता है।
वे बताते हैं कि बाकी जगहों पर भले ही दूसरी चाट मिल जाए, लेकिन बचका आसानी से कहीं नहीं मिलता। और अगर कहीं मिलता भी है, तो बचका के साथ इस तरह की चटनी और खास सब्ज़ी नहीं दी जाती। यहाँ जो झोल डाला जाता है, वह चना, आलू, मटर और दूसरी सब्ज़ियों को मिलाकर तैयार किया जाता है। बिहार में इस तरह की सब्ज़ी को ही झोल कहा जाता है।
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