सनातन धर्म में महिला को देवी का दर्जा दिए जाने की बात अक्सर बड़े मंचों से दोहराई जाती है। कहा जाता है कि नारी शक्ति है, पूज्य है, सृजन की जननी है। लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल उलट नज़र आती है। आज वही महिला सबसे ज़्यादा असुरक्षित है — घर में, सड़क पर, कार्यस्थल पर और यहां तक कि देव स्थानों पर भी। यह विरोधाभास हमें सोचने पर मजबूर करता है कि समस्या धर्म में नहीं, बल्कि धर्म की व्याख्या करने वाली पितृसत्तात्मक सोच में है। मंगलसूत्र या सिंदूर न पहनने पर किसी महिला को ‘खुला प्लॉट’ कहना न सिर्फ एक महिला का अपमान है, बल्कि यह उस मानसिकता का खुला प्रदर्शन है जो महिलाओं को वस्तु समझती है। इज्जत किसी प्रतीक, गहने या कपड़े से नहीं जुड़ी होती, बल्कि वह एक इंसान होने के नाते उसके अधिकार, स्वतंत्रता और गरिमा से आती है। नवरात्रि में देवी के नाम पर जयकारे लगाना आसान है, मूर्तियों की पूजा करना सरल है, लेकिन महिलाओं को समान अधिकार, सुरक्षा और सम्मान देना आज भी समाज की सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। जब तक सोच नहीं बदलेगी, तब तक देवी पूजा सिर्फ एक दिखावा ही रहेगी।
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