बांदा के आम लोगों, हाकिम और मुलाजिम के लिये वो एक नागरिक, एक वकील हो सकते हैं, लेकिन देश के लिए केदारनाथ अग्रवाल एक साहित्यकार, एक प्रतिबद्ध जनवादी कवि थे। उन्होंने सिर्फ कविताएं नहीं लिखी थीं बल्कि बांदा को एक नयी आवाज भी दी थी। उन्होंने नदियों को, प्रकृति को और इन सबसे बढ़कर आम जन-जीवन के तमाम गंभीर सवालों को अपनी कविताओं की आवाज़ बनाया था।
साल 1921 में बांदा के एक गांव कमसिन में पैदा हुए केदारनाथ अग्रवाल ने आरंभिक दिनों में अपनी कविताओं में प्रकृति के सहज चित्रों को सुंदर ढ़ंग से सजाया। उन्होंने इलाहबाद, कानपूर से पढ़ाई की और फिर बांदा लौट आये। बांदा के सिविल लाईन के एक मिट्टी के घर में उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी गुज़ार दी।
केदारनाथ ने अपनी कविताओं के माध्यम से प्रकृति प्रेम को जल्द ही मानव प्रेम से जोड़ दिया था। उनकी रचनाओं मे मिट्टी की सोंधी खुशबू के स्वर मिलते हैं।
हम खबर लहरिया के दो पत्रकार केदारनाथ अग्रवाल के बांदा पहुंचे, उनको खोजतें, उनकी यादों को टटोलते…

घर नहीं बचा, अगर कुछ बचा है तो उनकी यादें और यह दरवाजा
“जहां मीनों का घर था, वहां बड़ा मैदान हो गया“- केदारनाथ अग्रवाल की कविता ’कंकरीला मैदान’ से

उनके हाथों लिखे गए कुछ पत्र… फ़रवरी 20, 1983 के एक पत्र में लिखते है, “मैं यहां से 17/3 को झांसी होता हुआ दिनांक 19/3 को दोपहर के समय बांदा पहुँच रहा हूँ।’’

यह आँगन, उनकी कुर्सी और उनके किस्सों का जीता-जागता गवाह है यह नीम का पेड़। जिसे बड़े ही प्यार से केदारनाथ सींचा करते थे। इस पेड़ का जिक्र उन्होंने अपनी कविताओं में भी किया है

उनके पड़ोसी सुधीर सिंह कहते-कहते रो पड़ते हैं कि बाबा को बहुत शौक था अपने कपड़ो को सहेज कर रखने का। मजाल है कि रत्ती भर भी सिलवटें उनके कपड़ो में दिखाई दे जाएं। यह उनका ही स्वेटर है जो आज दीमक खा रहा है

घंटो बैठकी लगती थी उनके घर पर और यह कुर्सी उनकी पसंदीदा थी। ये कुर्सी यूंही नहीं टूटी है, बुलडोज़र चला है इस पर
लेख साभार – अंशु ललित
फोटो साभार: सुरभि श्रीवास्तव और अंशु ललित