पंचायती राज और महिलाएंः वर्ष 2005 और एक दशक बाद…

DSCF8533 copyबात 2005 की है. जब उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव घोषित हो गए थे। ये पहला मौक़ा था जब खबर लहरिया पत्रकार महिलाएं चुनाव रिपोर्टिंग करने वाली थीं। पंचायत में महिलाओं के लिए आरक्षण के दस साल से ज्यादा हो चुके थे। राजनीति के इस क्षेत्र में महिलाएं अपने कदम भी रख चुकी थीं। ऐसे में हम उम्मीदवार महिलाओं से जानना चाहते थे कि वह इस क्षेत्र के बारे में क्या सोचती थीं? वह क्यों राजनीति में आना चाहती थीं? उनकी क्या प्राथमिकताएं थीं, इस चुनाव को लेकर और इस नए कदम के लिए उनके क्या सपने थे? इन सवालों के जवाब लेने के लिए कलम, कॉपी और कैमरे सहित हम निकल पड़े महिला उम्मीदवारों की खोज में। जहां-जहां महिला सीट थी वहीं हमने दौरा करना शुरू किया।
हमने पहाड़ी ब्लॉक से शुरुआत की और प्रधान पद की उम्मीदवार का पता लगा कर हम उनके घर पहुंचे। वहां जा कर महिला के पति से बात हुई. इसी बीच हमने, महिला उम्मीदवार से जाकर बात करने की कोशिश की  । तब उन्होंने पति महोदय की तरफ इशारा करते हुए कहा , “असली उम्मीदवार तो ये हैं। अब इस बार सीट महिला की हो गयी तो ये खड़े नहीं हो सकते, लेकिन काम तो इन्हें ही करना है। उन्होंने साफ़ कह दिया- “हम नहीं जानते चुनाव और राजनीति के बारे में। आप हमारे पति से ही पूछ लीजिये।“ काफी कोशिश करने के बाद जब हमें कुछ हासिल नहीं हुआ तब हम दूसरी उम्मीदवार की तलाश में निकल पड़े।
मानिकपुर ब्लॉक से दो महिलाएं निही पंचायत की उम्मीदवार सोनिया और गिदुरहा की संजो चुनाव के लिए खड़ी हुई थीं। दोनों ही कोल जाति की महिलाएं थीं जो इससे पहले भी चुनाव जीत कर प्रधान के पद में काम कर चुकी थीं। सोनिया और संजो को संस्था से जानकारी और हौसला मिला था इसलिए वे स्वतंत्र रूप से चुनाव के मैदान में उतरी थीं।
2015-16 में एक बार फिर पंचायत चुनाव घोषित हुए। जब हमने इस साल महिला उम्मीदवार से चुनाव लड़ने का कारण पूछा तो बदले में हमें जवाब मिला, ’मैं दिखाना चाहती हूं कि राजनीति में सब एक जैसे नहीं होते। मैं गन्दी राजनीति नहीं खेलती, वादे नहीं करती, मैं तो काम करती हूं।’ ’मैं हमेशा चुनाव लड़ना चाहती थी, जब महिला सीट निकली तो मैंने अपने पति से कहा कि मुझे खड़ा कर दो, और मेरा सपना सच हो गया।’ ’लोगों का मुझ पर विशवास है, मेरे पति टाउन एरिया को संभालेंगे और मैं अपनी वार्ड को देखूंगी। अगर पति ने चुनाव में मुझे उतारा है तो मेरे आगे बढ़ने के लिए तैयार भी रहे।’ बुंदेलखंड में कुछ ऐसे ही बेबाक जवाब हमारे सामने आये।
चित्रकूट में कोलमजरा पंचायत से जीतीं सुशीला- दलित और एकल। चुनौतियों भरे प्रचार और चुनाव के बाद आज सुशीला स्वतंत्र रूप से अपने पंचायत का काम संभाल रही हैं। इस साल उत्तर प्रदेश में 44 प्रतिशत महिलाओं ने पंचायत चुनाव में जीत हासिल की. लगभग 11 प्रतिशत औरतों ने सामान्य सीट से जीत हासिल की।
सीमित संसाधन, राजनीतिक दबाव, घूसखोरी और कमीशन. इन सब चुनौतियों के बावजूद औरतों ने वोट मांगे। जहां औरतें सिर्फ बहु या पत्नी के रूप में खड़ी थीं वहां भी प्रचार में वो निकलीं। दिन के उजाले में घर-घर जाकर दरवाज़े खटखटाए, कहीं तो रात में भी मोबाइल की रौशनी में प्रचार के लिए निकलीं। महिलाओं ने कहा कि लोगों के विशवास के साथ और उनको मौका देने से ही वो आगे बढ़ पाएंगी। लोगों के दिल को ये बात छू गयी। इस साल भी हमने पाया कि जानकारी और सहयोग मिलने से महिला उम्मीदवार कहीं ज्यादा मजबूती से चुनाव लड़ पाती हैं।

रिपोर्ट – शालिनी जोशी