हर साल 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। इसे महिलाओं के अधिकार, सम्मान और उनके संघर्षों की पहचान का दिन कहा जाता है लेकिन सवाल यह है कि क्या हम सच में महिलाओं की सुरक्षा और आज़ादी का जश्न मना सकते हैं जब देश में हर साल हजारों लड़कियां और महिलाएं रहस्यमय तरीके से गायब हो रही हैं? महिला दिवस पर मंचों से भाषण होते हैं पोस्टर लगते हैं और नारे दिए जाते हैं लेकिन ज़मीन पर हकीकत इससे बिल्कुल अलग दिखती है।
मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में बीते साल हजार से ज्यादा लड़कियों और महिलाओं के लापता होने की खबरें सामने आई हैं जिनका आज तक कोई ठोस जवाब नहीं मिला है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल उठता है कि इन महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? परिवार की, समाज की या सरकार की? और अगर सरकार की है तो इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं आखिर कैसे गायब हो रही हैं?
दुनिया भर की मीडिया ने जेफरी एपस्टीन से जुड़े मामलों को महीनों तक सुर्खियों में रखा यह दिखाया गया कि कैसे लड़कियों को गायब कर शोषण किया गया लेकिन भारत में जब हजारों लड़कियां और महिलाएं लापता होती हैं तो वह खबर कुछ दिनों में ही गुम हो जाती है। क्या विदेशी मामलों पर बहस करना आसान है और अपने देश की सच्चाई देखना मुश्किल? महिला दिवस पर यह सवाल और भी ज़रूरी हो जाता है कि किस तरह की आज़ादी और सुरक्षा की बात कर रहे हैं। एक तरफ़ महिला दिवस को उत्सव और जश्न के रूप में मनाया जाता है। समय के साथ इसके मायने भी बदले हैं। कभी यह दिन मज़दूर महिलाओं के संघर्ष और अधिकारों की याद के रूप में जाना जाता था, लेकिन आज इसे अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। यह अच्छी बात है कि महिलाओं की उपलब्धियों और उनके योगदान को पहचानने के नए तरीके सामने आए हैं।
लेकिन इसी के साथ एक सवाल भी खड़ा होता है। जब देश में इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं और लड़कियां लापता हो रही हैं और कई मामलों में उनका कोई सुराग नहीं मिल पाता तो इस स्थिति की जिम्मेदारी किसकी है? महिला दिवस के मौके पर जश्न के साथ-साथ इन सवालों पर भी गंभीरता से सोचने की जरूरत महसूस होती है।
अब ये देखते हैं कि किन-किन राज्यों से महिलाओं और लड़कियों की गायब होने की खबर सामने आई हैं।
मध्य प्रदेश 2024 – 25 में 23,129 लड़कियां और महिलाएं
मध्य प्रदेश में हर दिन लगभग 130 महिलाओं और लड़कियों के लापता होने की चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। यह आंकड़ा 2020 से 28 जनवरी 2026 तक का है। इस दौरान कुल 2,74,311 महिलाएं या लड़कियां गायब हुई हैं। यह जानकारी मुख्यमंत्री मोहन यादव द्वारा विधानसभा में दिए गए एक लिखित जवाब से सामने आई है, जिसमें यह भी बताया गया है कि इनमें से 2,35,977 को ट्रेस कर लिया गया है लेकिन 68,334 महिलाएं और लड़कियां अभी भी लापता हैं।
यह स्थिति चिंताजनक है और हर साल 30,000 से अधिक महिलाओं के लापता होने के पैटर्न को उजागर करती है जिसमें 2021 में यह संख्या 39,000 से अधिक और 2023 में 40,000 को पार कर गई थी। मध्य प्रदेश सरकार के आंकड़ों की मानें तो जनवरी 2024 से जून 2025 के बीच मध्य प्रदेश में 23,129 लड़कियां और महिलाएं लापता हुई हैं। यानी हर दिन लगभग 43 लड़कियां और महिलाएं गुमशुदा हुईं। वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि साल 2019 से 2021 के बीच अकेले मध्य प्रदेश में लड़कियों और महिलाओं की ग़ुमशुदगी के क़रीब दो लाख मामले दर्ज हुए जो कि देश में सबसे अधिक है। इसकी संख्या कुछ इस प्रकार है-
– अब तक लापता महिलाएं, 2,06,000 से ज़्यादा
– लापता लड़कियां, 63,500 से अधिक
– जिनका पता लगाया जा सका, 1,58,000 महिलाएं और 61,000 लड़कियां
– जो आज भी नहीं मिलीं, करीब 48,000 महिलाएं और 2,200 लड़कियां
ये आंकड़े सिर्फ फाइलों में दर्ज केस नहीं हैं। ये वे चेहरे हैं जो घरों से, स्कूलों से, काम की जगहों से अचानक लापता हो गए। इसी के साथ मध्य प्रदेश के बड़े शहर जिन्हें शिक्षा, रोज़गार और संस्कृति का केंद्र माना जाता है वो खुद महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं रह गए हैं। 2019 से 2025 के बीच के आंकड़े बताते हैं कि –
– इंदौर में 4,449 महिलाएं और 135 लड़कियां लापता हुईं
– भोपाल में 1,685 महिलाएं और 56 लड़कियां
– जबलपुर में 2,296 महिलाएं और 86 लड़कियां
– ग्वालियर में 1,188 महिलाएं और 14 लड़कियां
बाल विवाह में भी बढ़ती संख्या
मध्य प्रदेश केवल लापता की संख्या नहीं बढ़ी है। मध्य प्रदेश में नाबालिग लड़कियों की शादी रोकने के लिए चलाए जा रहे अभियानों और सरकारी दावों के बावजूद हालात सुधरने की जगह और चिंताजनक होते दिख रहे हैं। मध्य प्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान पेश किए गए ताज़ा आंकड़े के अनुसार सामने आया कि पिछले छह सालों में प्रदेश में बाल विवाह लगातार बढ़े हैं। 2025 में अब तक 538 मामलों के दर्ज होने के साथ यह संख्या 2020 की तुलना में करीब 47 प्रतिशत ज्यादा हो गई है। सरकार द्वारा दिए गए आँकड़ों से पता चलता है कि 2020 के बाद से हर वर्ष मामलों में वृद्धि दर्ज हुई है 2021 में 436, 2022 में 519, 2023 में 528 और 2024 में 529 मामले सामने आए। बता दें ये आंकड़े पूर्व मंत्री और तीन बार के कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह द्वारा उठाए गए एक सवाल के जवाब में प्रस्तुत किए गए। ये सभी वही मामले हैं जिनमें लड़की की उम्र 18 वर्ष से कम पाई गई।
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महाराष्ट्र में भी बड़ी संख्या में महिलाएं और नाबालिग महिलाएं लापता
महाराष्ट्र विधानसभा में पेश किए गए आंकड़ों और news on air से साफ होता है कि महाराष्ट्र भी अब उन राज्यों में शामिल हो गया है जहां बड़ी संख्या में महिलाएं और नाबालिग लड़कियां लापता हो रही हैं। मुख्यमंत्री और गृहमंत्री देवेंद्र फडणवीस के गृह विभाग के मुताबिक 2024 और 2025 के दौरान कुल 93,940 महिलाएं और 23,429 नाबालिग लड़कियां लापता हुईं जिनमें से अधिकांश को खोज लिया गया है लेकिन हजारों अब भी नहीं मिलीं। सरकार ‘ऑपरेशन मुस्कान’ जैसे अभियानों से रिकवरी दर बढ़ने का दावा कर रही है वहीं विपक्ष इन आंकड़ों को महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल मान रहा है। यह स्थिति बताती है कि महाराष्ट्र जैसे बड़े और शहरी राज्य में भी महिलाओं की सुरक्षा अब एक बड़ी सामाजिक और राजनीतिक चुनौती बनती जा रही है।
छत्तीसगढ़ के राजधानी रायपुर से 1327 लड़कियां हुईं लापता
दैनिक भास्कर में छपी एक खबर में ये बताया गया कि रायपुर पुलिस विभाग के रिकॉड के अनुसार साल 2023 से 2025 के बीच रायपुर जिले से कुल 1,327 नाबालिग लड़कियाँ लापता हुई हैं। जिसमें से 1,218 का पुलिस ने पता लगा लिया है।
रायपुर जिले में पिछले तीन वर्षों के दौरान 1,327 लड़कियों का लापता होना केवल एक संख्या नहीं है बल्कि यह पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। इनमें से अधिकतर लड़कियां नाबालिग हैं और 106लड़कियों का अब तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है। हर साल करीब 20 प्रतिशत मामले अधूरे रह जाना यह दिखाता है कि जांच की प्रक्रिया प्रभावी नहीं हो पा रही है। 2026 की शुरुआत में लापता लड़कियों के मामले भी सामने आए हैं जिससे चिंताएं और बढ़ गई हैं। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि 16 से 30 साल की युवतियां सबसे ज्यादा लापता हो रही हैं। यह समाज में बढ़ती असुरक्षा का संकेत है। सवाल यह भी उठता है कि ऐसे मामलों में जिम्मेदारी तय क्यों नहीं होती और दोषियों पर सख्त कार्रवाई क्यों नहीं हो पाती। जब तक हर लापता लड़कियाँ सुरक्षित वापस नहीं आती तब तक महिलाओं की सुरक्षा को लेकर किए जाने वाले दावे अधूरे ही माने जाएंगे।
दिल्ली में भी महिलाओं और लड़कियों के लापता के मामले
दिल्ली पुलिस के अनुसार लापता होने वालों में सबसे ज़्यादा संख्या महिलाओं और लड़कियों की है। पीटीआई के की रिपोर्ट के अनुसार नवंबर के मध्य तक दर्ज हुई कुल गुमशुदगी में से लगभग 60 प्रतिशत मामले महिलाओं और लड़कियों से जुड़े हैं। आंकड़ों के अनुसार 15 अक्टूबर तक 19,682 लोग लापता दर्ज थे लेकिन अगले एक महीने में 1,909 नए मामले जुड़ गए। इस तरह गुमशुदगी के मामलों में करीब 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इस एक महीने में मिली नई शिकायतों में 1,155 महिलाएं और 754 पुरुष भी शामिल थे।
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बढ़ते बलात्कार और छेड़छाड़ के मामलों पर पैरा
महिलाओं की गुमशुदगी के साथ-साथ देश में बलात्कार और छेड़छाड़ के मामले भी लगातार चिंता बढ़ा रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार हर साल हजारों महिलाएं यौन हिंसा का शिकार होती हैं। कई मामलों में पीड़ित महिलाएं शिकायत दर्ज कराने से भी डरती हैं क्योंकि उन्हें समाज और परिवार के दबाव का सामना करना पड़ता है। ऐसे में जो मामले सामने आते हैं वे असल तस्वीर का सिर्फ एक हिस्सा होते हैं। यह स्थिति बताती है कि महिलाओं की सुरक्षा सिर्फ कानून का नहीं बल्कि सामाजिक सोच का भी सवाल है
कानून और योजनाओं पर सवाल
देश में महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए कई कानून और सरकारी योजनाएं लागू की गई हैं। इनमें ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’, महिला हेल्पलाइन, वन स्टॉप सेंटर और मिशन शक्ति जैसे कार्यक्रम शामिल हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षा, सहायता और न्याय दिलाना है। लेकिन सवाल यह उठता है कि अगर इतने कार्यक्रम और योजनाएं चल रही हैं तो फिर महिलाओं की गुमशुदगी और उनके खिलाफ हिंसा के मामलों में कमी क्यों नहीं आ रही? क्या इन योजनाओं का असर सच में ज़मीन तक पहुंच रहा है या फिर वे सिर्फ सरकारी रिपोर्टों तक ही सीमित रह जाती हैं?
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्टों में भी यह सामने आया है कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। यह स्थिति बताती है कि कानून और योजनाओं के बावजूद सुरक्षा की चुनौती अभी भी गंभीर बनी हुई है।
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अदालत और महिलाओं के गरिमा पर उठते सवाल
इसी बीच कई मामलों में अदालतों को भी हस्तक्षेप करना पड़ा है। महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को लेकर केवल अपराध के आंकड़े ही चिंता नहीं बढ़ाते हैं। कई बार अदालतों के फैसले भी समाज में बड़ी बहस छेड़ देते हैं। हाल ही में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के एक फैसले ने यह सवाल फिर सामने ला दिया कि कानून महिलाओं की गरिमा को किस तरह से देखता है। अदालत ने एक मामले में कहा कि अगर यौन संबंध में “पेनिट्रेशन” यानी प्रवेश साबित नहीं होता तो उसे बलात्कार नहीं बल्कि बलात्कार की कोशिश माना जाएगा और उसी आधार पर आरोपी की सजा कम कर दी गई। इस फैसले के बाद कई सामाजिक संगठनों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने यह सवाल उठाया कि क्या कानून में बलात्कार की परिभाषा इतनी सीमित होनी चाहिए कि महिला के साथ हुई हिंसा और अपमान की गंभीरता कम आंकी जाए।
ऐसे में महिला दिवस के मौके पर यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि जब महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ रहे हैं और न्याय की प्रक्रिया भी कई बार कठिन हो जाती है। तो क्या कानून और न्याय व्यवस्था महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को पूरी तरह सुनिश्चित कर पा रहे हैं? या फिर महिलाओं की गरिमा से जुड़े सवाल आज भी अदालतों समाज और कानून के बीच बहस का विषय बने हुए हैं।
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दूसरी ओर आज भी देश के कई हिस्सों में महिलाओं को पारंपरिक और रूढ़िवादी सामाजिक मान्यताओं का सामना करना पड़ता है। कई जगहों पर उन्हें परिवार और समाज की अनुमति के बिना अपने जीवन से जुड़े फैसले लेने की आज़ादी नहीं होती। इसका एक उदाहरण वह मामला है जिसमें एक विधवा महिला को दोबारा शादी करने पर गांव के बाहर रहने के लिए मजबूर कर दिया गया। यह घटना बताती है कि महिलाओं के अधिकारों को लेकर सामाजिक सोच में बदलाव अभी भी अधूरा है।
एक ओर जहां महिलाएं शिक्षा, रोजगार और राजनीति के क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं वहीं दूसरी ओर समाज के कुछ हिस्सों में उन्हें अब भी बोझ की तरह देखा जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि सिर्फ कानून बना देने से क्या सच में महिलाओं की स्थिति बदल जाएगी?
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इन सभी चिंतजनक मामलों को देखते हुए 8 मार्च महिला दिवस का दिन सिर्फ उत्सव मनाने का नहीं माना जा सकता बल्कि यह दिन गंभीरता से सोचने और न्याय और अधिकार के लिए कदम उठाने का दिन भी माना जा सकता है। सवाल यह है कि क्या सच में महिलाओं के लिए सुरक्षित समाज बना पाए हैं? जब तक हर लड़की बिना डर के घर से निकलने और सुरक्षित लौटने का भरोसा महसूस नहीं करेगी तब तक महिला दिवस के भाषण और नारे अधूरे ही रहेंगे। शायद इस बार महिला दिवस यह याद दिलाने का मौका देता है कि महिलाओं की सुरक्षा केवल एक मुद्दा नहीं बल्कि लोकतंत्र की असली परीक्षा है।
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