मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले एक पिता ने अपनी विधवा बेटी की दूसरी शादी करवाई तो समाज ने पूरे परिवार को ही सज़ा सुना दी। इससे गांव वालों ने परिवार पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया और कहा गया कि 10 साल तक उनसे कोई सामाजिक रिश्ता नहीं रखा जाएगा।
देश को आज़ाद हुए 78 साल हो चुके हैं और कानून में बराबरी की बातें की जाती हैं लेकिन ज़मीनी हकीकत अब भी अलग है। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के लांजी इलाके से सामने आया मामला बताता है कि समाज की पुरानी परंपराएं आज भी लोगों के जीवन पर भारी पड़ रही हैं। यहां एक पिता ने अपनी विधवा बेटी की दूसरी शादी करवाई तो समाज ने पूरे परिवार को ही सज़ा सुना दी।
आज़ादी के बाद भी नहीं बदली सामाजिक सोच
मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के मंडई टेकरी गांव के रहने वाले मानिक सोनवाने की बेटी की पहली शादी हो चुकी थी। साल 2022 में बीमारी के कारण उसके पति की मौत हो गई। उस समय बेटी की उम्र सिर्फ 22 साल थी। वह तीन साल तक मायके में रही। माता पिता से लड़की का दर्द देखा नहीं गया और अपनी बेटी का भविष्य अंधकार में न जाए इसलिए माता-पिता ने उसका पुनर्विवाह करा दिया। शादी गैर-बिरादरी में होने की वजह से समाज के कथित ठेकेदारों ने गुपचुप बैठक कर पूरे परिवार से रिश्ते-नाते तोड़ने का फैसला कर लिया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार लड़की के परिवार का कहना है कि बेटी की उजड़ी जिंदगी को संवारना अगर गुनाह है, तो वे इस गुनाह को बार-बार करेंगे।
पुनर्विवाह की सज़ा, बहिष्कार और जुर्माना
लड़की की दूसरी शादी का फैसला समाज के कुछ लोगों को मंजूर नहीं हुआ। बिंझवार समाज के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और कोषाध्यक्ष ने बैठक बुलाकर पूरे परिवार को समाज से बाहर करने का फैसला सुना दिया। परिवार पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया और कहा गया कि 10 साल तक उनसे कोई सामाजिक रिश्ता नहीं रखा जाएगा।
सामाजिक बहिष्कार कानूनन अपराध
मानिक सोनवाने ने इस फैसले को अन्यायपूर्ण बताया और प्रशासन से शिकायत की। कलेक्टर मृणाल मीना ने मामले को गंभीर मानते हुए एसडीएम को जांच के आदेश दिए हैं। प्रशासन का कहना है कि सामाजिक बहिष्कार कानूनन अपराध है और जांच के बाद दोषियों पर एफआईआर दर्ज की जा सकती है। साथ ही सभी पक्षों को बुलाकर काउंसलिंग कराने की भी बात कही गई है ताकि आगे ऐसी घटनाएं न हों।
ऐसा ही एक और मामला भी आया सामने
यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले 3 फरवरी को लालबर्रा के देवरी गांव में फोगल बाहेश्वर ने अपने भांजे की अंतरजातीय शादी करवाई थी। इसके बाद मरार समाज ने उन्हें भी समाज से बाहर कर दिया। इस मामले की जांच भी अभी जारी है।
समाज के अध्यक्ष ने क्या कहा
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार समाज के अध्यक्ष अजय पालेवार का कहना है कि उनके समाज में पहले से कुछ नियम बने हुए हैं। उनके अनुसार अगर कोई व्यक्ति दूसरे समाज में शादी करता है तो यह उसका निजी फैसला है लेकिन समाज भी अपने नियमों के अनुसार रिश्ते तय करता है। उनका दावा है कि किसी पर जबरदस्ती नहीं की गई और फैसले बैठक में सामूहिक रूप से लिए गए हैं।
विधवाओं के पुनर्विवाह को क्यों नहीं अपनाता समाज?
विधवाओं के पुनर्विवाह को सामान्य रूप से स्वीकार न करने के पीछे गहरे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और मानसिक कारण हैं। यह सोच मुख्य रूप से पारंपरिक पितृसत्तात्मक व्यवस्था से जुड़ी है। इस व्यवस्था में पुरुषों को अधिक अधिकार दिए गए और महिलाओं को उनके नियंत्रण में रखने की प्रवृत्ति बनी रही।
ऐसे समाज में महिला को केवल पत्नी, मां और गृहिणी के रूप में देखा गया। जब पति की मौत हो जाती है तो महिला को ऐसे व्यक्ति की तरह देखा जाता है जिसका कोई “स्वामी” नहीं है। कई जगहों पर विधवा महिला को अशुभ और बोझ माना जाता है।
यह भी देखने में आता है कि विधवा महिलाओं को अकेले जीवन जीने का विकल्प नहीं दिया जाता। जैसे यह मान लिया गया हो कि बिना पुरुष के महिला अधूरी है।
इसके उलट पुरुषों के पुनर्विवाह को समाज आसानी से स्वीकार कर लेता है। इसे सामान्य सामाजिक ज़रूरत माना जाता है लेकिन जब वही अधिकार महिला अपने लिए चाहती है तो उसे परंपरा और नियमों के नाम पर रोक दिया जाता है।
आंकड़े क्या बताते हैं?
भारतीय समाज में विवाह को महिलाओं के जीवन से गहराई से जोड़ा जाता है क्योंकि इससे उनकी सामाजिक पहचान, आर्थिक स्थिति और जीवन की सुरक्षा तय होती है। इसके उलट, पति की मृत्यु के बाद महिलाओं की स्थिति अक्सर कठिन और अपमानजनक हो जाती है। भले ही सती जैसी प्रथाएं समाप्त हो चुकी हों फिर भी विधवा महिलाओं पर पहनावे, खान-पान, बाहर आने-जाने और काम करने को लेकर कई तरह की रोक अब भी देखी जाती है। पुरुषों के पुनर्विवाह को समाज सहजता से स्वीकार करता है लेकिन महिलाओं के लिए पुनर्विवाह आज भी कलंक माना जाता है खासकर युवा विधवाओं के मामले में।
The India Forum के रिपोर्ट के अनुसार लूंबा रिपोर्ट (2022) के मुताबिक़ दुनिया में लगभग 24.5 करोड़ विधवाएं रहे हैं जो जाहिर है वर्तमान समय में इसमें बदलाव हुए होंगे। जिनमें से करीब 17.3% अकेले भारत में रहती हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में करीब 4.3 करोड़ विधवा महिलाएं थीं जबकि विधुर पुरुषों की संख्या लगभग 1.2 करोड़ थी। इसी जनगणना में यह भी सामने आया कि 45 वर्ष की महिलाओं में 29% और 60 वर्ष से ऊपर की महिलाओं में 48% विधवाएं थीं जबकि पुरुषों में यही आंकड़ा 8% और 15% रहा। यह साफ दिखाता है कि भारत में विधवापन का बोझ महिलाओं पर कहीं अधिक है जिसे विशेषज्ञ “विधवापन का स्त्रीकरण” कहते हैं।
वैवाहिक स्थिति और घरेलू दुर्व्यवहार का लैंगिक अंतर
The India Forum के रिपोर्ट के अनुसार जीवनसाथी की मृत्यु के बाद महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक नुकसान झेलना पड़ता है जबकि पुरुषों पर घरेलू कामों का दबाव बढ़ जाता है और उन्हें कम देखभाल मिलती है। कई बार यही स्थिति परिवार के भीतर शारीरिक, मौखिक, भावनात्मक और मानसिक दुर्व्यवहार या उपेक्षा का कारण बनती है। उपलब्ध साक्ष्य बताते हैं कि भावनात्मक और मानसिक दुर्व्यवहार व उपेक्षा के मामलों में महिलाओं में वैवाहिक अंतर पुरुषों से अधिक है। इसके उलट, मौखिक और शारीरिक दुर्व्यवहार के मामलों में यह अंतर पुरुषों में ज्यादा देखा गया है।
अनुदैर्ध्य वृद्धावस्था अध्ययन (2017–18) से यह भी सामने आया कि विधवा महिलाएं विवाहित महिलाओं की तुलना में भावनात्मक और मानसिक शोषण अधिक झेलती हैं जबकि पुरुषों में इसका उलटा पैटर्न दिखता है। वहीं उम्र की परवाह किए बिना विवाहित महिलाओं में शारीरिक शोषण की घटनाएं विधवा महिलाओं से अधिक पाई गईं जिससे संकेत मिलता है कि महिलाओं के खिलाफ शारीरिक हिंसा का मुख्य स्रोत पति होता है। पुरुषों के मामले में स्थिति बदलती है जहां विधवा पुरुषों को विवाहित पुरुषों की तुलना में अधिक शारीरिक शोषण का सामना करना पड़ता है।
विधवाओं की सामाजिक असुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य
इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ साइंस एंड रिसर्च आर्काइव के रिपोर्ट के अनुसार पुरुष प्रधान समाजों में महिलाओं पर होने वाले अत्याचार उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालते हैं। भारत जैसे पितृसत्तात्मक समाज में विधवा होना आज भी एक सामाजिक कलंक माना जाता है। जीवन स्तर में बदलाव आने के बावजूद विधवाओं की हालत में खास सुधार नहीं हुआ है और कई रूढ़िवादी परिवार उन्हें बोझ समझते हैं। विधवा महिलाओं के मानसिक दबाव और भावनात्मक पीड़ा को अक्सर गंभीरता से नहीं लिया जाता, जबकि शोध बताते हैं कि यह अवसाद, चिंता और नशे जैसी समस्याओं से जुड़ा हो सकता है। वे सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और कानूनी स्तर पर हाशिए पर रहती हैं और पति को खोने के साथ-साथ भेदभाव भी झेलती हैं। इसी संदर्भ में यह अध्ययन भारत में विधवाओं की स्थिति और उनके स्वास्थ्य, मानसिक तनाव तथा संज्ञानात्मक क्षमता (सोचने, समझने, याद रखने और निर्णय लेने की क्षमता) के बीच संबंध को समझने का प्रयास करता है।
ये पूरा मामला सिर्फ एक पिता और बेटी की कहानी नहीं है बल्कि उस सोच का आईना है जो आज भी महिला के फैसले को समाज की मर्जी से बांधना चाहती है। लड़की या महिलाओं की उजड़ी ज़िंदगी को फिर से बसाने की कोशिश अगर अपराध मानी जाएगी तो यह न सिर्फ समाज बल्कि संविधान की भावना पर भी सीधा सवाल खड़ा करता है।
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