बिहार में औद्योगीकरण और निवेश का मुद्दा हर चुनाव में उठता है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि बिहार अभी भी एक औद्योगिक पिछड़ेपन से जूझ रहा है। गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में बिहार में बंद पड़ी चीनी मिलों को फिर से चालू करने की घोषणा की, लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या यह वास्तव में ज़मीन पर उतरने वाला फैसला है, या फिर यह सिर्फ चुनावी घोषणा बनकर रह जाएगा?
लेखन – मीरा देवी
औद्योगीकरण की पुरानी कहानी
बिहार में कभी बड़ी-बड़ी कंपनियां थीं, लेकिन आज यह उद्योग-विहीन राज्य बन चुका है। 1950-60 के दशक में ‘बिहार राज्य खनिज विकास निगम’ और ‘बिहार राज्य विद्युत उत्पादन निगम’ जैसी कंपनियां स्थापित हुईं, जिससे राज्य में औद्योगिकीकरण की नींव रखी गई।
1980-90 का दौर बिहार के लिए महत्वपूर्ण रहा। जब राज्य सरकार ने औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं शुरू कीं।
2005 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में औद्योगिक विकास की नीतियां बनीं और ‘बिहार औद्योगिक नीति 2006’ लागू की गई। बाद में इसे 2016 में अपडेट भी किया गया। लेकिन इतने वर्षों की नीतियों के बावजूद बिहार में बड़े निवेशक क्यों नहीं आए?
अमित शाह की घोषणा: हकीकत या चुनावी वादा?
29 और 30 मार्च 2025 को गृह मंत्री अमित शाह पटना और गोपालगंज दौरे पर थे, जहां उन्होंने बिहार के गन्ना किसानों को साधने के लिए बंद पड़ी चीनी मिलों को फिर से चालू करने की घोषणा की।
उन्होंने राजद प्रमुख लालू यादव के शासन को भ्रष्टाचार और जंगलराज का दौर बताया, ताकि युवा और नए मतदाताओं को प्रभावित किया जा सके।
उन्होंने उद्योग और निवेश को लेकर वादे किए, जिससे यह संकेत देने की कोशिश की कि बिहार में अब बदलाव आएगा।
लेकिन सवाल यह है कि दशकों से बिहार में चीनी मिलों को शुरू करने की घोषणाएं होती रही हैं फिर भी ज़मीनी हालात क्यों नहीं बदले?
औद्योगिक विकास में पिछड़ा क्यों?
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और गृह मंत्री अमित शाह का कहना है कि बिहार में कंपनियां लगेंगी तो निवेश आएगा और रोज़गार बढ़ेगा। लेकिन जब पूरे देश में कंपनियां स्थापित हो रही थीं, तब बिहार इससे पीछे क्यों रह गया?
क्या यह सिर्फ चुनावी लॉलीपॉप है क्योंकि विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं?
क्या बिहार सरकार ने वाकई निवेश लाने की कोशिश की या सिर्फ घोषणाओं तक सीमित रही?
लगातार बंद होती गईं कंपनियां
बिहार कभी औद्योगिक केंद्र हुआ करता था लेकिन आज यह स्थिति बदल चुकी है।
भागलपुर की सिल्क इंडस्ट्री, दरभंगा और मुज़फ्फरपुर की चीनी मिलें, बिहटा और बक्सर की पेपर मिलें कभी बिहार की शान हुआ करती थीं।
1985-2005 के दौरान राजद-कांग्रेस शासन में ये धीरे-धीरे बंद हो गईं।
गलत नीतियों, भ्रष्टाचार और राजनीतिक खेल ने उद्योगों की कमर तोड़ दी।
टाटा और बिरला जैसी बड़ी कंपनियां बिहार में निवेश करना चाहती थीं, लेकिन लालफीताशाही और प्रशासनिक अड़चनों के कारण वे पीछे हट गईं।
झारखंड बनने के बाद बिहार अपने प्राकृतिक संसाधनों से भी वंचित हो गया। कोयला, लोहा, स्टील जैसे संसाधन झारखंड के पास चले गए और बिहार सिर्फ खाली जमीन लेकर रह गया।
मजदूरों का राज्य बनाए रखने की रणनीति?
अगर बिहार में बड़ी कंपनियां लग जाए तो यहां के लोग यहीं काम करेंगे लेकिन सवाल उठता है कि फिर दिल्ली, मुंबई, पंजाब, गुजरात की कंपनियों में मजदूर कौन भेजेगा?
क्या बिहार को एक सोची-समझी रणनीति के तहत मजदूर सप्लाई करने वाला राज्य बना दिया गया है?
अगर बिहार में रोजगार के अवसर बनते, तो पलायन क्यों जारी है?
क्या बिहार के लोगों को बाहर भेजकर उनके वोटों की राजनीति की जाती है?
बिहार के लोग मेहनती हैं। दिल्ली की मेट्रो हो, मुंबई की इमारतें, पंजाब के खेत या गुजरात की कंपनियां। हर जगह बिहार के मज़दूर काम करते मिल जाएंगे लेकिन जब बिहार में खुद कोई बड़ी कंपनी नहीं है, तो यहां के लोग क्या करें?
निवेशक बिहार में क्यों नहीं आते
अगर सरकारें वाकई बिहार में कंपनियां लगाना चाहती हैं, तो निवेशक बिहार में क्यों नहीं आ रहे?
क्या बिहार में अब भी भ्रष्टाचार और लालफीताशाही सबसे बड़ी रुकावट है?
क्या कानून-व्यवस्था की हालत इतनी खराब है कि कोई बड़ा उद्योगपति यहां आने से डरता है?
क्या बिजली, पानी, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं अभी भी पर्याप्त नहीं हैं?
बिहार सरकार ने पिछले साल शराब, पेट्रोल समेत कई और एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के लिए कई समझौते किए लेकिन ज़मीनी हकीकत में कितनी कंपनियां खड़ी हुईं?
युवाओं का भविष्य
बिहार के युवा रोजगार के लिए क्या करें?
आज भी 80% युवा या तो सरकारी नौकरी के पीछे भाग रहे हैं या फिर रोज़गार के लिए दूसरे राज्यों में जाने की तैयारी कर रहे हैं।
अगर उद्योग नहीं आए, तो क्या बिहार का भविष्य मजदूरों के पलायन पर ही टिका रहेगा?
क्या सरकार की नीतियां वास्तव में बदलेंगी, या यह भी सिर्फ चुनावी रणनीति का हिस्सा है?
अब यह जनता को तय करना है कि बिहार में वाकई उद्योग स्थापित होंगे या फिर यह भी एक और चुनावी वादा बनकर रह जाएगा।
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