केंद्र सरकार मनरेगा की जगह एक नया कानून लाने जा रही है, जो योजना के स्वरूप को बदलने की क्षमता रखता है। नए बिल में केंद्र सरकार का नियंत्रण बढ़ेगा और राज्यों पर ज़्यादा आर्थिक बोझ पड़ेगा। सरकार का कहना है कि ग्रामीण भारत बदल चुका है, इसलिए नई व्यवस्था ज़रूरी है, जबकि विपक्ष और श्रमिक संगठन इसका विरोध कर रहे हैं।
लेखन – हिंदुजा
केंद्र सरकार लोकसभा में विकसित भारत- रोज़गार और आजीविका की गारंटी मिशन (ग्रामीण), जिसका संक्षिप्त नाम VB-G RAM G अधिनियम है, ये बिल लाने जा रही है। बीते कल 16 दिसंबर को केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण एवं ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस बिल को लोक सभा में पेश किया और कहा की नाम बदलने से योजना का उद्देश्य नहीं बदलेगा।
इस बिल का उद्देश्य महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम, 2005 (मनरेगा) की जगह लेना है। सरकार का ये कदम इसलिए चर्चा में है क्योंकि माना जा रहा है कि इससे मनरेगा योजना की मूल प्रकृति में बदलाव होगा।
अब तक मनरेगा मांग-आधारित योजना रही है, यानी काम की ज़रूरत होने पर लोग आवेदन कर सकते थे और उसी के अनुसार एक वित्तीय वर्ष में बजट बढ़ाया जा सकता था। लेकिन नए बिल के प्रावधानों के तहत ये योजना आपूर्ति यानी सप्लाई-आधारित हो जाएगी, जिसमें सरकार यह तय करेगी कि कहाँ, कब और कितना काम दिया जाएगा। ये ग्रामीण मजदूर केंद्रित मनरेगा योजना नए बिल के लागू होने से मजदूरों की मांग की बजाये सरकार की काम देने की क्षमता या इच्छा पर निर्भर करेगी। ये मजदूर को केंद्र से हटाकर केंद्र सरकार को केंद्र में रख देता है। इसके विरोश में ये भी कहा जा रहा है की ये बिल एक अधिकार-आधारित कानून को बदलकर बजट की सीमाओं में बंधी योजना बना देता है।
“हर हाथ को काम दो,
काम का पूरा दाम दो”
समरजीक कार्यकर्ता अरुणा रॉय और निखिल दे का कहना है की मनरेगा इस नारे और मांग के बाद लागू हुआ था। जो इसे एक जन–आधारित कानून बनता है। उनके अनुसार मजदूरों को मनरेगा ने काम के साथ साथ काम मांगने का अधिकार भी दिया है।
मगर बिल के विरोध में कहा जा रहा है की ये काम माँगने के अधिकार को केवल काम माँगने तक सीमित कर देता है। नया बिल लोगों को अधिकार से वंचित कर देता है जो मनरेगा का असली मक़सद था।
सरकार का तर्क
ये बिल लाने में सरकार का तर्क है कि ग्रामीण भारत में बड़े सामाजिक-आर्थिक बदलाव आ चुके हैं, इसलिए मनरेगा की जगह एक नई योजना लाने की ज़रूरत है। सरकार इसके समर्थन में बेहतर सड़क और कनेक्टिविटी, आवास, बिजली, बैंकिंग सुविधाओं तक पहुंच और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का हवाला देती है। साथ ही कहती है कि ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले लोगों की प्रकृति बदली है और अब उनकी अपेक्षाएं ज़्यादा आय, विकास से जुड़ा ढांचा, टिकाऊ रोज़गार और जलवायु बदलाव से बेहतर सुरक्षा से जुड़ी हैं।
पहला बदलाव- मनरेगा का नाम बदलना
केंद्र सरकार नए बिल के ज़रिये महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) का नाम बदलकर विकसित भारत- रोज़गार और आजीविका की गारंटी मिशन (ग्रामीण) करने जा रही है। इस बदलाव के तहत योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाया जा रहा है और बीजेपी सरकार के ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य से जोड़कर नया नाम दिया जा रहा है।
विपक्ष का आरोप कई स्तर पर है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खारगे का कहना है, कि यह सिर्फ नाम बदलने की बात नहीं, बल्कि मनरेगा को धीरे-धीरे खत्म करने की साज़िश है। उन्होंने आरोप लगाया कि संघ के सौ साल पूरे होने पर गांधी का नाम मिटाने की कोशिश की जा रही है और यह सरकार के दोहरे रवैये को दिखाता है।
यह केवल महात्मा गाँधी नरेगा के नाम बदलने की बात नहीं है। यह BJP-RSS की MGNREGA को ख़त्म करनी साज़िश है।
संघ के सौ साल पर गाँधी का नाम मिटाना ये दिखाता है कि जो मोदी जी विदेशी धरती पर बापू को फूल चढ़ाते हैं, वो कितने खोखले और दिखावटी हैं।
जो सरकार ग़रीब के हक़ से चिढ़ती हो,…
— Mallikarjun Kharge (@kharge) December 15, 2025
कांग्रेस नेता प्रियंका गाँधी वाड्रा ने आज संसद में कहा, “यह योजना महात्मा गांधी के नाम पर है। वे राष्ट्रपिता हैं और उनके नाम का अपमान नहीं किया जाना चाहिए,”। “सच्चाई यह है कि योजना का नाम बदलने की आड़ में केंद्र सरकार इस योजना को खत्म करना चाहती है। वे इस योजना का नाम बदलना क्यों चाहते हैं?”
कांग्रेस नेता शशि थरूर ने लोक सभा में आज कहा, “महात्मा गांधी राम राज्य और राम राज्य की कल्पना की बात करते थे, और उनके लिए ग्राम स्वराज ही राम राज्य की बुनियाद था। जब देश में ग्राम स्वराज होगा, तभी राम राज्य स्थापित होगा। भगवान राम के नाम का इस्तेमाल अलग-अलग संदर्भों में किया जा सकता है, लेकिन महात्मा गांधी का नाम हटाना सही नहीं है।
वहीं, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि तथाकथित डबल इंजन सरकारों के पास कोई नया काम नहीं है, इसलिए वे दूसरों के काम को अपने नाम से पेश करती हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकार निवेश बढ़ने का दावा कर रही है, तो मनरेगा के काम के दिन 200 क्यों नहीं किए जाते, और यदि योजना में बदलाव हो रहे हैं तो राज्यों को बजट के मामले में ज़्यादा आज़ादी दी जानी चाहिए।
केंद्र के हाथ नियंत्रण ज़्यादा, ज़िम्मेदारी कम
नए बिल के तहत मनरेगा अब पूरी तरह केंद्र का प्रोग्राम नहीं रहेगा, बल्कि इसे हर केंद्र प्रोग्राम के जैसे केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बांटा जायेगा। विपक्ष का आरोप है कि ये बिल काम के कानूनी अधिकार को कमजोर कर उसे एक सीमित, केंद्र-प्रायोजित योजना में बदल देता है, जिसमें केंद्र सरकार की जवाबदेही घट जाती है और सारा नियंत्रण उसी के हाथ में चला जाता है। विपक्ष ऐसा इसलिए कह रहा है क्यूंकि अब तक मनरेगा की पूरी ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार की थी- चाहे बजट तय करना हो या मज़दूरी का भुगतान। लेकिन नए बिल में मज़दूरी भुगतान की ज़िम्मेदारी, जो अब तक 100 प्रतिशत केंद्र की थी, उसे बड़े राज्यों के लिए 60 परसेंट केंद्र और 40 परसेंट राज्य ऐसे बांटा जायेगा। इसका सीधा मतलब ये है कि अब बेरोज़गारी भत्ता और मज़दूरी देर पर मिलने वाला मुआवज़ा राज्यों को अपने बजट से देना होगा जो राज्य सरकार पर आर्थिक बोझ डालेगी। इस बदलाव से एक तरफ केंद्र की आर्थिक ज़िम्मेदारी कम होगी और दूसरी तरफ केंद्र के द्वारा नियंत्रण करने की शक्ति भी भी बढ़ेगा। नए बिल में कहा गया है की ये योजना कहाँ और कैसे लागू होगी, ये केंद्र सरकार का फैसला होगा ।
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, बिल की धारा 4(5) में कहा गया है कि केंद्र सरकार हर साल ये तय करेगी कि किस राज्य को कितना पैसा मिलेगा। और ये फैसला भी उन मापदंडों के आधार पर होगा, जिन्हें केंद्र सरकार खुद तय करेगी। इसके अलावा, धारा 5(1) के तहत केंद्र को ये अधिकार भी है की वो इस बात का निर्णय लेगी के किस राज्य के किन ग्रामीण इलाकों में ये योजना लागू होगी। यह मनरेगा से एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि मनरेगा अब तक सार्वभौमिक मतलब सबके लिए समान योजना थी, जो सभी ग्रामीण क्षेत्रों में लागू होती थी।
श्रम संगठन नरेगा संघर्ष मोर्चा का कहना है कि पहले, 73वें संविधान संशोधन के तहत, मनरेगा का काम ग्राम सभा के स्तर पर स्थानीय ज़रूरतों के मुताबिक तय होता था- यानी योजना का प्रबंधन ज़मीनी स्तर से होता था लेकिन नया बिल योजना बनाने की प्रक्रिया को स्थानीय निकायों जैसे ग्राम पंचायत, नगर पालिका और नगर निगम से हटाकर एक केंद्र को प्राथमिकता देने वाली प्रणाली के तहत ले जायेगा।
काम के दिन बढ़ेंगे लेकिन खेती के मौसम में रोक लगेगी
हालांकि नए बिल में मनरेगा के द्वारा काम मिलने के दिनों को 100 से बढाकर 125 दिन किया जायेगा मगर उसके साथ बड़ा बदलाव ये भी होगा कि खेती के चरम मौसम के दौरान योजना को अस्थायी रूप से रोक दिया जायेगा, ताकि मज़दूर खेती के लिए उपलब्ध रह सकें। पहले साल भर में कभी भी काम माँगा जा सकता था। इस प्रावधान के विरोध में कहा जा रहा है की इससे छोटे किसान जिनके पास खुद की बड़ी ज़मीन नहीं होती उनपर असर बढ़ेगा।
टेक्नोलॉजी पर ज़्यादा निर्भरता
मज़दूरों और साकार के प्रोग्राम को तकनीकी से जोड़ने के लिए जो बदलाव लाये गए थे- जैसे मोबाइल ऐप से हाज़िरी देना , आधार के ज़रिये भुगतान और जियो-टैगिंग यानी काम की जगह की भौगोलिक पहचान दर्ज कराना – अब ये सब कानून का हिस्सा बना दिए जायेंगे।
इसपर नरेगा संघर्ष मोर्चा ने सवाल उठाये हैं- उनका कहना है की बहुत साड़ी स्टडी में पाया गया है की बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण में कई व्यावहारिक दिक्कतें हैं, खासकर खेती और हाथ से मेहनत करने वाले मज़दूरों के लिए, जिनके फिंगरप्रिंट अक्सर मशीन में दर्ज ही नहीं हो पाते।
लिबटेक इंडिया नाम की रिसर्च संस्था की स्टडी में पाया गया था कि लगातार हाथ से काम करने के कारण उंगलियों का घिस जाना मनरेगा में बायोमेट्रिक पहचान फेल होने की सबसे बड़ी वजह है। इसके अलावा मशीनों की खराबी और कमज़ोर इंटरनेट कनेक्टिविटी भी बड़ी बाधाएं हैं।
ज़मीन पर खबर लहरिया की रिपोर्ट्स के अनुसार, योजना में काम पाने और पेमेंट के लिए मज़दूरों पर NMMS ऐप और आधार-आधारित भुगतान सिस्टम (ABPS)है। मगर इसमें अमूमन गांवों में नेटवर्क न होने की वजह से ऐप पर रोज़ाना फोटो अपलोड कर पाना मुश्किल हो जाता है। मगर ये सिस्टम की गलती हो नज़रअंदाज़ करके मंज़दरों को काम से बाहर कर दिया जाता है। अब भी लाखों मजदूरों के खाते ABPS से जुड़ नहीं पा रहे जिससे वेतन फंस जाता है।
इन समस्याओं का निदान करने के बजाये नया बिल इन्हे कानून में शामिल कर देता है।
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2005 में बीजेपी ने किया था समर्थन
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, उस समय बीजेपी ने इस कानून का समर्थन किया था लेकिन सरकार में आने के बाद 2015 में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि मनरेगा बंद नहीं की जाएगी, बल्कि यह यूपीए सरकार की नाकामियों का स्मारक बनी रहेगी।
मोदी ने लोकसभा में कहा था, “मैं सुनता रहता हूं कि सरकार मनरेगा को खत्म करने जा रही है। लेकिन मेरी राजनीतिक समझ कहती है कि मनरेगा को कभी खत्म नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये आपकी असफलताओं का जीता-जागता उदाहरण है। और मैं ढोल-नगाड़ों के साथ इसे दुनिया को दिखाता रहूंगा कि मनरेगा क्या है।”
MGNREGA स्कीम अगस्त 2005 में संसद के दोनों सदनों ने पास की गयी थी और ये योजना फरवरी 2006 में लागू हुई थी। जब मनरेगा स्कीम संसद में पेश की गयी थी तब बीजेपी सहित लगभग सारे सदस्यों ने इसपर अपनी सहमति जताई थी।
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