बाज़ार में आपने कई बार लोगों को सिर पर टोकरी रखकर सब्ज़ी या फल बेचते देखा होगा। खेतों में मजदूरों को भूसा भरते हुए या फूल मंडियों में रंग-बिरंगे फूलों से भरी टोकरियाँ उठाए हुए देखा होगा। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह टोकरी कहाँ से आती है? इसे बनाने में कितनी मेहनत लगती है?
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अधूरी डलिया (लकड़ी की टोकरी) हाथ में लिए किसी गहन चिंतन में खोई हुई महिला की तस्वीर (फोटो साभार: शुशीला)
रिपोर्ट – शुशीला, लेखन – सुचित्रा
वाराणसी के रसूलगढ़ गाँव की कच्ची गलियों में चलते हुए अगर आप किसी घर के आँगन में झाँकें, तो आपको लकड़ी की महीन पट्टियाँ काटती, उंगलियों से बुनाई करती और टोकरी को आकार देती महिलाएँ दिख जाएँगी। उनके हाथों में कोई मशीन नहीं, कोई आधुनिक औजार नहीं सिर्फ उनकी मेहनत, हुनर और एक संकल्प है घर चलाने का।
ये महिलाएँ फालसा की लकड़ी से बनी टोकरी (डलिया) बनाकर अपनी जिंदगी की गाड़ी खींच रही हैं। लेकिन क्या यह उनका शौक है? नहीं, यह मजबूरी है। उनके लिए यह सिर्फ एक घरेलू कला नहीं, बल्कि जीविका का एकमात्र साधन है। आइए, इस कहानी को करीब से समझते हैं।
टोकरी सिर्फ एक चीज़ नहीं, बल्कि ज़रूरत
बाज़ार में आपने कई बार लोगों को सिर पर टोकरी रखकर सब्ज़ी या फल बेचते देखा होगा। खेतों में मजदूरों को भूसा भरते हुए या फूल मंडियों में रंग-बिरंगे फूलों से भरी टोकरियाँ उठाए हुए देखा होगा। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह टोकरी कहाँ से आती है? इसे बनाने में कितना श्रम लगता है?
रसूलगढ़ गाँव में करीब 10 परिवारों की महिलाएँ इस काम में लगी हुई हैं। फालसा की लकड़ी, जो खाने में खट्टी-मीठी होती है और गर्मियों में गली-गली घूमकर बेची जाती है, इसी से ये टोकरी बनती है। यह लकड़ी सिर्फ दो महीने ही बाज़ार में उपलब्ध होती है, इसलिए ये महिलाएँ इसे सालभर के लिए स्टॉक करके रखती हैं।
लकड़ी से डलिया बनने तक का सफर
1. कच्चा माल
महिलाएँ बाज़ार से फालसा की लकड़ी खरीदकर लाती हैं। यह लकड़ी मोटी और सख्त होती है, जिसे पहले पतला करने की ज़रूरत होती है।
2. लकड़ी की चीराई
लकड़ी को धारदार औजारों से छीला जाता है। इसे हाथों से पट्टी-पट्टी काटा जाता है, ताकि ये टोकरी में इस्तेमाल हो सके। इस प्रक्रिया में उंगलियाँ कट जाती हैं, छिल जाती हैं, लेकिन कोई दस्ताने या सुरक्षा उपकरण नहीं होते।
3. बुनाई
एक-एक पट्टी को आपस में जोड़कर एक मज़बूत संरचना बनाई जाती है। यह पूरी तरह से हाथों का काम होता है। जितनी सफाई और मज़बूती से यह बुनी जाएगी, उतनी ही अच्छी कीमत मिलेगी।
4. बाज़ार में बिक्री
बनने के बाद, इन्हें गाँव की महिलाएँ ही बाज़ार में जाकर बेचती हैं। एक डलिया बनाने में घंटों लगते हैं, लेकिन इसकी कीमत 30-35 रुपये से ज्यादा नहीं मिलती।
कमाई कम, मेहनत ज्यादा, फिर भी जीने का एकमात्र सहारा
इन टोकरियों से रोज़ाना मुश्किल से 100-150 रुपये की कमाई होती है। सालभर काम नहीं रहता, सिर्फ दो महीने ही फालसा की लकड़ी उपलब्ध होती है। इसके बाद? या तो वे अपने लिए दूसरी मज़दूरी ढूँढती हैं, या उधार लेकर घर चलाती हैं। लेकिन सवाल यह है कि इतना हुनर होते हुए भी, ये महिलाएँ सिर्फ 30-35 रुपये में क्यों सिमट जाती हैं?
शासन-प्रशासन से कोई मदद नहीं, न ही कोई नया अवसर
सरकार कई योजनाएँ चलाती है—महिला सशक्तिकरण, स्वरोज़गार, हुनर विकास। लेकिन रसूलगढ़ की ये महिलाएँ किसी भी सरकारी लाभ से अछूती हैं।
कोई ट्रेनिंग नहीं, कोई वित्तीय सहायता नहीं, कोई बाज़ार उपलब्ध नहीं। अगर इन्हें सही मशीनें और प्रशिक्षण दिया जाए, तो ये टोकरियाँ सिर्फ लोकल मंडियों में नहीं, बल्कि देश-विदेश तक भेजी जा सकती हैं।
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मजबूरी नहीं, हुनर को पहचान चाहिए
इस कहानी का अंत सिर्फ इस बात पर नहीं होना चाहिए कि महिलाएँ संघर्ष कर रही हैं। सवाल यह है कि उनके हुनर को पहचान कब मिलेगी? अगर सरकार इनके लिए एक कोऑपरेटिव सेटअप करे, तो ये महिलाएँ खुद अपने प्रोडक्ट को ऊँचे दामों पर बेच सकती हैं। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के ज़रिए अगर इनके बनाए उत्पाद बेचे जाएँ, तो इन्हें दलालों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। बैंकों से आसान ऋण मिले, तो ये खुद अपनी लकड़ी स्टॉक करने और बड़े पैमाने पर उत्पादन करने में सक्षम हो सकती हैं।
क्या हम सिर्फ इनकी मेहनत की कहानी सुनकर आगे बढ़ जाएँगे, या इनके हुनर को पहचान दिलाने की कोशिश करेंगे?
रसूलगढ़ की ये महिलाएँ चाहती हैं कि उनकी कला सिर्फ जरूरतमंद हाथों तक ही नहीं, बल्कि उन लोगों तक भी पहुँचे जो उनकी मेहनत का सही मोल समझते हैं। ये सिर्फ लकड़ी की टोकरी नहीं, बल्कि सपनों और संघर्षों से बुनी हुई कहानियाँ हैं।
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