खबर लहरिया Blog UP woman Making Bracelet: महिलाएं मोतियों के ब्रेसलेट बनाकर कर रही हैं गुज़ारा

UP woman Making Bracelet: महिलाएं मोतियों के ब्रेसलेट बनाकर कर रही हैं गुज़ारा

चिरईगांव ब्लॉक के पतेरवा गांव पहुँचे जहाँ लगभग 20 महिलाएं मोतियों के ब्रेसलेट बनाकर अपनी रोज़ी-रोटी चला रही हैं। यह काम भले ही छोटा दिखता है लेकिन इन्हीं ब्रेसलेटों से इन महिलाओं का घर चलता है और दवा-इलाज जैसी ज़रूरतें पूरी होती हैं। यही उनके आत्मनिर्भरता का बड़ा और मात्र सहारा है।   

रिपोर्टिंग – सुशीला, लेखन – रचना 

Women making bracelets from beads

मोतियों से ब्रेसलेट बनाने का काम करती महिलाएं (फोटो साभार: सुशीला)                 

उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में सरकार की योजनाओं के ज़रिये महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिशें चल रही हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़कर कई महिलाओं को समूहों में जोड़ा जा रहा है उन्हें आर्थिक मदद मिल रही है और कुछ को महिला मेट के रूप में काम भी दिया जा रहा है। इसके बावजूद आज भी कई ग्रामीण महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें किसी योजना या बड़े रोज़गार से जुड़ने का मौका नहीं मिला है। ऐसी ही महिलाओं से मिलने हम चिरईगांव ब्लॉक के पतेरवा गांव पहुँचे जहाँ लगभग 20 महिलाएं मोतियों के ब्रेसलेट बनाकर अपनी रोज़ी-रोटी चला रही हैं। यह काम भले ही छोटा दिखता है लेकिन इन्हीं ब्रेसलेटों से इन महिलाओं का घर चलता है और दवा-इलाज जैसी ज़रूरतें पूरी होती हैं। यही उनके आत्मनिर्भरता का बड़ा और मात्र सहारा है। 

मोतियों के ब्रेसलेट से रोज़गार

इन महिलाओं के साथ हमने बातचीत की उनमें से गांव की प्रमिला बताती हैं कि “यहां कोई पक्का रोज़गार नहीं है। इसलिए हमने और कुछ दूसरी महिलाओं ने मोतियों की माला और ब्रेसलेट बनाने का काम शुरू किया। पहले यह काम चार घरों में होता था लेकिन अब गांव की करीब 20 महिलाएं इसमें जुड़ चुकी हैं।”

ये बताती हैं कि महिलाएं रोज़ चार से पाँच घंटे बैठकर ब्रेसलेट बनाती हैं। एक ब्रेसलेट बनाने पर उन्हें सिर्फ़ 2 रुपये मिलते हैं। कोई महिला दिन में 30 रुपये कमा पाती है तो कोई 50 रुपये तक। यह काम शहर से लोग कच्चा माल लाकर देते हैं और हफ्ते-दस दिन बाद तैयार माल लेकर चले जाते हैं। यह आमदनी बहुत कम है लेकिन जब कोई दूसरा काम नहीं होता तो यही सहारा बनती है।    

गांव के और भी महिलाएं ब्रेसलेट बनाते हुए (फोटो साभार: सुशीला)                        

अगर गहराई से देखें तो सरकार की तरफ़ से मिलने वाली महीने की एक हज़ार रुपये जैसी मदद से किसी परिवार का गुज़ारा होना मुश्किल है खासकर महिलाओं के लिए। देश में बेरोज़गारी और महंगाई लगातार बढ़ रही है। पुरुष किसी तरह बाहर जाकर मज़दूरी कर लेते हैं लेकिन बहुत-सी महिलाएं ऐसी हैं जो घर या गांव से बाहर जाकर काम नहीं कर पातीं। ऐसे में घर चलाने की ज़िम्मेदारी भी उनके कंधों पर आ जाती है। इस कारण उन्हें मजबूरी में वे छोटे-छोटे काम करने पड़ जाते हैं जिससे उनका घर चल सके। बता दें उन्हें उनकी मेंहनताना सिर्फ उतनी ही मिल पाती है जिससे घर चलाया जा सके जीवन नहीं।  कहीं सिलाई, कहीं मोती या ब्रेसलेट बनाना, कहीं खेत-मज़दूरी ताकि रसोई चल सके और दवा-इलाज जैसे ज़रूरी खर्च पूरे हो सकें। यह उनकी मेहनत और मजबूरी दोनों को दिखाता है और यह भी कि सिर्फ़ थोड़ी-सी सरकारी सहायता से उनकी ज़िंदगी की मुश्किलें खत्म नहीं हो सकतीं।

बुज़ुर्ग महिलाओं का संघर्ष

इसी कड़ी में दूसरी महिला बताती हैं कि बुढ़ापे में सहारा बहुत ज़रूरी होता है। बेटे अपनी ज़िंदगी में व्यस्त रहते हैं ऐसे में हर बार किसी से पैसे मांगना अच्छा नहीं लगता। इसलिए वह भी मोती का काम करती हैं। 

ब्रेसलेट बनाने का उपकरण और काम करती महिला (फोटो साभार: सुशीला)                      

इस काम का असर सीधे उनकी सेहत पर भी पड़ता है। वे बताती हैं कि घंटों एक ही जगह बैठकर मोती पिरोने से कमर में तेज़ दर्द होने लगता है। आंखों में जलन और धुंधलापन महसूस होता है लेकिन फिर भी उन्हें रोज़ बैठकर यह काम करना पड़ता है क्योंकि यही उनकी कमाई का एकमात्र सहारा है। धागा, मोती और लकड़ी की छोटी पट्टी पर ब्रेसलेट तैयार किए जाते हैं जिसके लिए बहुत ध्यान और मेहनत चाहिए। अगर वे पूरे मन से एक हफ्ते काम कर लें तो करीब 400 रुपये तक कमा पाती हैं। इसी पैसे से वे अपनी दवा खरीदती हैं और घर की छोटी-छोटी ज़रूरतें पूरी करती हैं। उनका कहना है कि “किसी के आगे हाथ फैलाने से बेहतर है कि हम खुद मेहनत करके दो रुपये ही सही लेकिन अपना काम करें।” यह बात उनकी मजबूरी भी दिखाती है और आत्मसम्मान भी कि तमाम तकलीफ़ों के बावजूद वे अपने श्रम से जीना चाहती हैं।

छोटी कमाई, बड़ी ज़रूरतें

महिलाओं का कहना है कि आज महंगाई इतनी बढ़ चुकी है कि 100 – 200 रुपये भी उनके लिए बहुत बड़ी रकम हो जाती है। अगर वे यह काम न करें तो कई बार 1 रुपये के लिए भी किसी के सामने हाथ फैलाने की नौबत आ जाती है। कोई महिला दिन भर में 15 माला बना पाती है तो कोई 20। यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके पास कितना समय है और शरीर में कितनी ताकत बची है। अब पूरे गांव में 20 से ज़्यादा महिलाएं मिलकर यही ब्रेसलेट बनाने का काम कर रही हैं।                                      

बनी हुई ब्रेसलेट (फोटो साभार: सुशीला)

त्योहार के समय जो थोड़े-बहुत पैसे इकट्ठा हो पाते हैं उन्हीं से कपड़े खरीदे जाते हैं दवा ली जाती है या बच्चों की छोटी-मोटी ज़रूरतें पूरी की जाती हैं। 

यह कहानी साफ़ बताती है कि गांव की महिलाएं मुश्किल हालात के आगे हार नहीं मानतीं। बहुत छोटे काम और बहुत कम आमदनी के बावजूद वे अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश कर रही हैं लेकिन अगर इन्हें उनके काम का सही दाम मिले माल बेचने के लिए बाज़ार तक सीधी पहुँच हो और सरकार से ठोस सहारा मिले तो यही मेहनत इन्हें सच में आत्मनिर्भर बना सकती है और उनकी ज़िंदगी की दिशा बदल सकती है।

 

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