यूपी, बिहार में धान की कटाई के बाद अब चूरा बनने की तैयारी की जाती है। लोग धान का कुछ हिस्सा चूरा बनवाकर घर के लिए रख लेते है तो कुछ को अपने बाहर रहने वाले रिश्तेदारों को भेजने के लिए बनवाते हैं। चूरा वही जिसको पोहा (Poha) बनाकर खाया जाता है और जो अब हर दुकान, शहर में नास्ते के रुप में बहुत प्रसिद्ध हो चुका है।
रिपोर्ट – सुनीता देवी, लेखन – सुचित्रा
जिला प्रयागराज, ब्लॉक करछना, गाँव बेदौव के आशीष धान का चूरा बना रहे हैं। चक्की मुख्य रूप से दिसंबर से मार्च तक चालू रहती है। मकरसंक्रांति के समय सबसे ज्यादा किसान चूरा बनवाते हैं, क्योंकि यह मौसम धान की फसल तैयार होने का होता है।
जिला जसरा, गाँव पाडर के किसान का कहना है “हम किसान अपने धान से हर साल लगभग एक कुंतल धान का चूरा (पोहा) बनवाते हैं। यहाँ बनने वाला पोहा का स्वाद अलग और खास होता है क्योंकि हम अपने धान बिना किसी रासायनिक खाद के तैयार करते हैं सिर्फ देशी खाद/गोबर का उपयोग करते हैं।”
इस कारण हम साल भर के लिए चूरा बनवाते हैं। धान को भूना जाता है, जिससे पोहा में सौंधापन और स्वाद बना रहता है। इस पोहे से हम:
- पोहा बनाते हैं
- नमकीन बनाते हैं
- दही-चूरा खाते हैं
चूरा बनवाने में लगभग 6 रुपये प्रति किलो लगता है। अपने चूरा का स्वाद और पौष्टिकता के कारण इसमें कोई मिलावट नहीं होती और कोई रोग नहीं होता। एक दिन में सात कुंतल तक चूरा बना लिया जाता है। इसी कारण चूरा बनवाने के लिए लंबी लाइन लगती है। सभी लोग इसे घर में खाने के लिए बनवाते हैं। चूरा का स्वाद अच्छा होता है सौंधापन बना रहता है और नमकीन भी बहुत टेस्टी बनती है।
धान से चूरा कैसे बनाया जाता है?
चूरा को पोहा (Poha) भी कहा जाता है। चूरा बनाने की प्रक्रिया इस प्रकार है – सबसे पहले धान को भिगोकर फूलाया जाता है, आमतौर पर एक दिन पहले। इसके बाद धान को भार में भूजा जाता है। भूजने के बाद धान को चलाकर देशी चक्की में डाला जाता है। चक्की में धान का छिलका अलग हो जाता है और चूरा तैयार हो जाता है।
पोहा (Poha) कैसे बनाया जाता है?
खबर लहरिया के “आ गई रे चटोरी” के एपिसोड में आप पोहा बनाने की विधि को देख सकते हैं।
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