गाय-भैंस का गोबर प्रकृति रूप से खेती में खाद के लिए बहुत उपयोगी माना जाता है। गाय-भैंस के गोबर से बने उपले (कंडे) ईंधन का काम करते हैं यानी इसका इस्तेमाल मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाने के लिए किया जाता है। इसका इस्तेमाल खासतौर पर गांव (देहात) में देखने को मिलता है। गाय के गोबर से बने उपले / कंडे को अंग्रेज़ी में आमतौर पर “Cow dung cakes” या “Dung cakes” कहा जाता है। कंडे को अलग अलग क्षेत्रों में अलग नामों से जाना जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, एमपी, पंजाब, हरियाणा में इसे उपला, कंडा, कंडी कहते हैं वहीं बिहार में कई जगह और बंगाल में इसे गोइठा भी कहा जाता है।
रिपोर्ट- सुनीता, लेखन – सुचित्रा
बदलते दौर के साथ और समय कमी,भाग दौड़ की ज़िन्दगी और गैस सिलेंडरों के उपयोग ने गांव हो या शहर गोबर के कंडों को नजरअंदाज कर दिया है, तो वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में जो मजदूर वर्ग की महिलाएं हैं। यही गोबर उन कई परिवारों के लिए रोज़गार और जीवनयापन का सहारा बन गया है।
महिलाओं के लिए रोजगार का माध्यम
मजदूर और गरीब वर्ग की महिलाएं बटाई का गोबर इकट्ठा करके कंडे बनाती हैं, जिन्हें बेचकर वे अपना परिवार चलाती हैं। इससे उन्हें दोहरा लाभ मिलता है,एक तो घर के लिए सस्ता और सुविधाजनक ईंधन मिलता है जिसका खाना स्वादिष्ट और निरोगिल माना आता है और दूसरा आमदनी का साधन। यह सोच हमें सिखाती है अगर दिमाग में नया विचार और काम करने का जुनून हो, तो गांव में साधारण संसाधनों से भी आत्मनिर्भरता और रोजगार पाया जा सकता है।
बटाई पर कंडे बनाती हैं महिलाएं
जिला प्रयागराज के घूरपुर क्षेत्र में इस मौसम में ईंधन इकट्ठा करना लोगों के लिए बहुत जरूरी हो जाता है। जिन परिवारों के पास अपने जानवर नहीं हैं, वे बटाई पर उपले (कंडे) पाथकर ईंधन की व्यवस्था करते हैं। यहां की रहने वाली शकुन्तला बताती हैं कि उनके पास खेत-खलिहान नहीं है, इसलिए वे जानवर भी नहीं पालतीं। चारा-भूसा का कोई सहारा नहीं है, इसी वजह से उन्हें कंडों की समस्या रहती है, क्योंकि उनके घर में खाना अब भी चूल्हे पर ही बनता है। गैस सिलेंडर भरवाने के लिए पैसे नहीं होते।
शकुन्तला कहती हैं, “हम लोग गरीब हैं और मजदूरी करके ही गुजारा करते हैं। मजबूरी में बटाई पर उपले पाथना पड़ता है। हमारे इलाके में पटेलों के पास बहुत जानवर हैं भैंस और जर्सी गाय इसलिए उनके यहां गोबर की कमी नहीं होती। हम लोग पहले से ही गोबर इकट्ठा करना शुरू कर देते हैं और उसे एक जगह जमा करते रहते हैं। फागुन के महीने में उपले पाथने का काम शुरू करते हैं। एक दिन में करीब हजार कंडे तक पाथकर तैयार कर लेते हैं।”
वह आगे बताती हैं कि अगर किसी दिन मजदूरी का काम नहीं मिलता, तो पूरा दिन उपले ही पाथती रहती हैं। जब जमीन पर जगह कम पड़ने लगती है, तो दो-दो उपलों के ऊपर ढेर (उपरौड़) लगाना शुरू कर देती हैं। जून महीने तक दो बड़े ढेर तैयार हो जाते हैं। जिन घरों से वे गोबर लाती हैं, बाद में उन्हें बुलाकर पूछ लेती हैं कि कौन-सा ढेर लेना है और उसी हिसाब से उन्हें दे देती हैं।
बाहर गांव से भी कंडे खरीदने आते हैं दुकानदार
सुषमा जो इन्हीं महिलाओं के साथ मिलकर उपले पाथने(बनाने) का काम करती हैं कहती हैं कि, “अगर हम बटाई पर कंडे नहीं बनाएंगे तो पूरे चार महीने क्या जलाएंगे और खाना कैसे बनाएंगे? हमारे घर में करीब 12 लोगों का परिवार है और सभी के लिए खाना चूल्हे पर ही बनता है। इसलिए कंडों की बहुत जरूरत पड़ती है।”
वह बताती हैं कि उनका इलाका शहर से लगा हुआ है और सिविल लाइंस में देसी लिट्टी-चोखा बनाने वाली दुकानों के लोग भी कंडे खरीदने के लिए गांव में आते हैं। उन्होंने कहा “कुछ कंडे हम दो रुपये प्रति कंडा के हिसाब से बेच भी देते हैं और कुछ अपने घर के लिए साल भर चलाने के लिए रख लेते हैं। इसके बाद जो बचता है, उसे दुकानदारों को दे देते हैं।”
20 साल से कर रही हैं उपले पाथने का काम
सुषमा कहती हैं कि पिछले करीब 20 साल से वे बटाई पर उपले पाथने का काम कर रही हैं। “मान लीजिए घर में आटा-चावल सब है, लेकिन अगर ईंधन नहीं होगा तो खाना कैसे बनेगा? इसी वजह से हम लोग बटाई पर कंडे पाथते हैं। इससे चार महीने का ईंधन इकट्ठा हो जाता है।”
सुषमा के मुताबिक उनके गांव के पसियान मोहल्ले में आधे से ज्यादा परिवार बटाई पर ही उपले पाथते हैं। जब इस काम से फुर्सत मिलती है, तब लोग मजदूरी या दूसरे छोटे-मोटे काम भी करते हैं।
गांव की अन्य महिलाएं जो वहीं बैठी उपला पाथ रही थी लेकिन नाम बताने में झिझक रही थी। उन्होंने बताया कि आजकल की नई पीढ़ी के बेटी-बहुएं उपले बनाने से कतराती है। नई पीढ़ी को ये सब नहीं पसंद आता हैं क्योंकि उनके लिए ये बस गाय का गोबर ही है इसलिए वे इससे घिन भी करती है और हाथ लगाने तक को मना करती हैं, लेकिन हम ठहरे पुराने जामने की तो हमारे लिए तो ये ईंधन है। इसी से हमारे घर का चूल्हा जलता है और यही हमारा रोजगार भी है। वो नहीं करते कोई नहीं लेकिन हम अपने घर का खर्च चलाने के लिए उपले बना लेते हैं।
गाय-भैंस के गोबर से बने कंडे गांव तक सीमित नहीं है अब यह ऑनलाइन प्लेटफार्म पर भी बिकने लगे हैं। जहां इनकी कीमत ग्रामीण इलाकों में बिकने वाले कंडे से काफी अधिक है। जिन्हें ऑनलाइन की समझ हैं उन्होंने कम कीमतों पर खरीद कर ऑनलाइन अधिक कीमतों पर बेचना शुरू किया। लेकिन ये महिलाएं भी कम नहीं है इन महिलाओं ने भी अपने हाथ के हुनर से कंडे बनाकर नया रोजगार शुरू किया और अब अपना परिवार चलाती है।
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