यूपी के प्रयागराज जिले के पहाड़ी और पथरीले इलाकों में इन दिनों हरियाली की एक बड़ी तैयारी चल रही है। जहां एक ओर भीषण गर्मी और पानी की कमी जैसी चुनौतियां हैं, वहीं दूसरी ओर प्रयागराज वन विभाग की नर्सरियों में लाखों पौधे तैयार किए जा रहे हैं। यह काम न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अहम है, बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार भी दे रहा है। बसहरा उपरहार और टंडनवन जैसे इलाके पूरी तरह से पथरीली और पहाड़ी जमीन वाले हैं। यहां की मिट्टी कठोर और भूरी होती है, जिसमें नमी लंबे समय तक नहीं टिकती।
रिपोर्ट – सुनीता, लेखन – सुचित्रा
प्रयागराज के पहाड़ी और पथरीले क्षेत्र में कुल 63 गांव आते हैं, जिनमें गढ़वा, लखनपुर, गाढ़ाकटरा, शिवराजपुर, अकौरिया, मबईया और तालापार जैसे गांव शामिल हैं। यहां पौधों की तैयारी के लिए भूरी मिट्टी का उपयोग किया जाता है। प्रयागराज वन विभाग के अंतर्गत 5 नर्सरी आती है। इनमें बसहरा उपरहार, टंडनवन, टंडनवन-2, शंकरगढ़ रेंज और गढ़वा। यहां लाखों की संख्या में पौधे तैयार किए जाते हैं जोकि पर्यावरण को स्वच्छ बनाने में बड़ा योगदान देते हैं।
पहाड़ी इलाके में पौधे की देखभाल चुनातिपूर्ण
इस समय गर्मियों में तापमान बहुत अधिक हो जाता है। पानी का स्तर (वॉटर लेवल) काफी नीचे चला जाता है। हल्की सी तेज धूप में भी पौधे सूखने का खतरा रहता है। इसी वजह से यहां पौधे तैयार करना आसान नहीं है, बल्कि यह एक बड़ी चुनौती है। कई बार पौधों को बचाने के लिए रात में भी सिंचाई करनी पड़ती है। टंडनवन नर्सरी में काम कर रहे अजय यादव बताते हैं कि पौधों की तैयारी एक तय प्रक्रिया के अनुसार होती है। उन्होंने बताया अक्टूबर–नवंबर में नर्सरी की सफाई शुरू होती है। दिसंबर–जनवरी में थैलियों में मिट्टी भरकर तैयार किया जाता है। फरवरी–मार्च महीने में बीजों की बुवाई की जाती है। अप्रैल–जून में समय से सिंचाई और देखभाल की जाती है। यहां सुबह-शाम लगातार पानी देना जरूरी होता है, क्योंकि पानी की कमी से पौधे जल्दी सूख जाते हैं।
इस समय नर्सरी में कई तरह के काम एक साथ चल रहे हैं—बीजों की बुवाई, निराई-गुड़ाई और पौधों की देखभाल। पौधों के बीच घास तेजी से उग जाती है, इसलिए निराई-गुड़ाई बहुत जरूरी होती है, वरना पौधे सही तरीके से बढ़ नहीं पाते। इसके साथ ही, अगर पौधों में कीट लगते हैं तो कीटनाशक दवाओं का छिड़काव किया जाता है। इन सभी कामों के लिए रोजाना करीब 20 लोग नर्सरी में काम करते हैं।
नर्सरी में कम पानी वाले पौधे ज्यादा
वन विभाग की नर्सरी में अधिकतर फलदार और कुछ छाया देने वाले पौधे तैयार किए जाते हैं। इनमें महुआ, आम, आंवला, जामुन, अमरूद, सागौन, बरगद, नीम, अशोक, अर्जुन, केसिया, सेमर और बेल जैसे पौधे शामिल हैं। खास तौर पर ऐसे पौधों पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है, जो कम पानी में भी जीवित रह सकें। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि इनमें अधिकतर पेड़ सड़क किनारे या फिर जंगलों में लगाए जाते हैं और एक बार लग जाने के बाद इन पर ध्यान भी नहीं दिया जाता। इसलिए यदि इन पेड़ को पानी न भी दिया जाए तो ये जल्दी सूखते नहीं है और बरसात आने पर हरे भरे हो जाते हैं। नीम, पीपल और बरगद जैसे पेड़ों को आम तौर पर “ज़्यादा ऑक्सीजन देने वाले पेड़” कहा जाता है।
मुफ्त में पौधों का वितरण और रोपण
नर्सरी में तैयार पौधों को गांवों में भी वितरित किया जाता है और जंगलों में भी लगाया जाता है। गर्मी के मौसम में इन पौधों की देखभाल करना सबसे बड़ी चुनौती होती है। थोड़ी सी भी तेज धूप पड़ने पर पौधे सूखने का खतरा रहता है, इसलिए कई बार उन्हें बचाने के लिए रात में भी सिंचाई करनी पड़ती है।
इसके बावजूद कुछ पौधे सूख जाते हैं, लेकिन जो पुराने और मजबूत पौधे बच जाते हैं, उन्हें आगे उपयोग में लाया जाता है।
वन क्षेत्राधिकारी अजय कुमार के अनुसार, इस क्षेत्र में इस वर्ष करीब 8 लाख 25 हजार पौधे तैयार किए जा रहे हैं। पिछले साल यह संख्या करीब 7 लाख थी। इन तैयार पौधों को जसरा और शंकरगढ़ ब्लॉक के गांवों में, ग्राम प्रधानों के माध्यम से जंगलों में रोपण के लिए मुफ्त में दिया जाता है। जुलाई महीने में बड़े स्तर पर वृक्षारोपण अभियान चलाया जाएगा, जिसमें इन पौधों को गांवों और जंगलों में लगाया जाएगा।
नर्सरी से मिल रहा रोजगार
यह नर्सरी वन विभाग में पौधों की देखभाल करने वाले कर्मचारियों के लिए रोजगार के अवसर भी लेकर आई है। टंडनवन गांव की महिला आरती का कहना है कि यहां पौधा तैयार किया जाता है हम लोग को भी चार महिना काम मिला रहता है हम लोग बुआई, निराई और गुड़ाई का काम करते हैं जो पौधा जंगल में लगते हैं यही नर्सरी में तैयार किया जाता है।
प्रयागराज के पहाड़ी और पथरीले इलाकों में इस तरह पौधों को तैयार करना सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि पर्यावरण को बचाने की एक मजबूत कोशिश है। जहां पानी की कमी, तेज धूप और खराब मिट्टी जैसी कई चुनौतियां हैं, वहां भी नर्सरी के जरिए हरियाली लाने का प्रयास काबिल-ए-तारीफ है।
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