खबर लहरिया Blog UP News: बरेली की गजक की मिठास, पहचान और रोजगार की अनोखी कहानी

UP News: बरेली की गजक की मिठास, पहचान और रोजगार की अनोखी कहानी

मीठा पसंद करने वाले लोगों के लिए गजक और रेवड़ी पसंदीदा मिठाई होती हैं। खासकर बरेली की मशहूर गजक अपनी अनोखी स्वाद और गुणवत्ता के लिए जानी जाती है। अब यह सिर्फ बरेली तक सीमित नहीं रही, बल्कि देश के कई शहरों में आसानी से उपलब्ध है। बरेली के आसपास के ग्रामीण इलाकों के लोग अलग-अलग शहरों और कस्बों में जाकर इस खास मिठास को पहुंचा रहे हैं। उनकी मेहनत और पारंपरिक विधि से तैयार की गई गजक ने बरेली की पहचान को दूर-दराज़ तक फैलाया है।

करारी मीठे से भरी बरेली की गजक (फोटो साभार: नाज़नी)

रिपोर्ट – नाज़नी, सुनीता

चित्रकूट की गलियों में भी एक सुरीली गाने की आवाज सुनाई देती है कुछ समझ आती है कुछ नहीं समझ आती। फिर भी लोग उस आवाज को सुनते ही दौड़ पड़ते हैं। अपनी जेबों में हाथ डालते हुए बच्चे आवाज़ सुनते ही मम्मी, पापा से पैसे मांगते हैं। बिना सुर ताल का गीत फिर भी लोग खींचे चले जाते हैं -जैसे गजक खुद अपनी मिठास के जादू से लोगों को खींच रहा हो।

“ले लो रे बाबू बढ़िया रे बाबू खस्ता करारी है”

यह कोई फिल्मी गाना नहीं होता, बल्कि लोक शैली की एक पुकार होती है। कई बार वे इसे गाकर, खींचकर, तान लगाकर ऐसे बोलते हैं जैसे कोई छोटा-सा सड़क का लोकगीत हो। यही उनकी मार्केटिंग है, और लोगों को अपनी ओर खींच लेने की यही उनकी कला बन गई है।
ये बहुत बड़े व्यापारी नहीं होते। आमतौर पर दो लोग साथ चलते हैं -दो पल्लों वाली डलिया को तराजू की तरह कंधों पर टांगे हुए। दोनों उस पल्ले का भार बराबर उठाते हैं और साथ-साथ गाते भी चलते हैं। फिर गलियों और सड़कों में उनकी आवाज़ गूंजती है, और देखते ही देखते भीड़ जुट जाती है।

गलियों में घूम घूम कर हाथ में गजक और तराजू लिए गजक बेच रहे हैं (फोटो साभार: सुनीता)

“10 रुपये में चार पीस” और “70 रुपये में ढाई सौ ग्राम गजक” -ऐसी पुकार के साथ वे अपनी मिठास का जादू बिखेरते हैं। स्वाद ऐसा कि लोग बार-बार खरीदें। दिवाली से लेकर होली तक बरेली से आए व्यापारी चित्रकूट की गलियों में डेरा जमाए रहते हैं।

फिल्मी पहचान से जुड़ा बरेली शहर

बरेली का नाम सुनते ही मशहूर गीत “झुमका गिरा रे” याद आ जाता है, जिसे फिल्म मेरा साया में फिल्माया गया था। “झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में” ने इस शहर को देश-विदेश में एक अलग पहचान दिलाई। आज भी यह गीत बरेली की सांस्कृतिक छवि का अभिन्न हिस्सा माना जाता है।

बरेली का सुरमा भी वर्षों से प्रसिद्ध रहा है। पुराने समय में यहां बना सुरमा दूर-दूर तक भेजा जाता था। आंखों की खूबसूरती बढ़ाने वाला यह सुरमा बरेली की पारंपरिक कारीगरी और शिल्पकला का प्रतीक है।

बरेली का इतिहास रोहिल्ला शासकों से जुड़ा रहा है और यहां की संस्कृति में मुगलकालीन प्रभाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यही कारण है कि यहां तिल, गुड़ और मेवों से बनने वाली मिठाइयों की समृद्ध परंपरा विकसित हुई। हाथ से कूटकर बनाई जाने वाली गजक ने धीरे-धीरे पूरे उत्तर भारत में अपनी खास पहचान बना ली।

गजक के स्वाद के साथ रोजगार

आज बरेली में गजक एक सशक्त कुटीर उद्योग के रूप में विकसित हो चुकी है। सैकड़ों परिवार इस व्यवसाय से जुड़े हुए हैं और इसी से अपनी आजीविका चलाते हैं।
यहां के व्यापारी धार्मिक नगर चित्रकूट जैसे स्थानों पर भी पहुंचते हैं। दिवाली से लेकर होली तक वे वहीं डेरा जमाए रखते हैं और गली-गली घूमकर गजक बेचते हैं। अपनी मधुर पुकार और पारंपरिक अंदाज़ से वे लोगों को आकर्षित करते हैं और सर्दियों की मिठास हर घर तक पहुंचाते हैं।

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के गांव भौथा के राजबीर और राजाराम पिछले पांच वर्षों से चित्रकूट आकर गजक बेच रहे हैं। उनका कहना है कि वे हर साल दिवाली के समय चित्रकूट आते हैं और होली तक यहीं रहकर गली-गली घूमकर गजक बेचते हैं। वे बताते हैं कि बरेली की गजक प्रसिद्ध है और लोग इसे हर जगह पसंद करते हैं। इसी भरोसे वे यहां आए थे -सोचा कि बिकेगी तो अच्छा है, नहीं तो किसी और शहर चले जाएंगे।

राजबीर कहते हैं, “हम इस बार दूसरे शहर भी गए थे। वहां बिक्री ठीक-ठाक रही, लेकिन यहां जैसा रोजगार नहीं चला। हमें चित्रकूट का माहौल अच्छा लगा। हम दो लोग हैं और इसी काम से दो परिवारों का खर्च चलता है। यहां रोज़ लगभग एक हजार से पंद्रह सौ रुपये तक की बिक्री हो जाती है, जिससे हमारा गुजारा हो जाता है।”

राजबीर और राजाराम दोनों साथ मिलकर गजक बेच रहे हैं और भीड़ लगी हुई है। (फोटो साभार: सुनीता)

वे बताते हैं कि गजक बनाना बहुत कठिन नहीं है। मैदा, चीनी, तिल और खोया से यह तैयार की जाती है। खोया भरने के लिए चीनी और मैदा को ठीक से गर्म करना जरूरी होता है, ताकि परत आसानी से चढ़ाई जा सके।
राजबीर मुस्कुराते हुए कहते हैं, “जब हम गाते हुए गजक बेचते हैं, तो जहां तक हमारी आवाज पहुंचती है, वहां अपने आप भीड़ जुट जाती है।”

वे याद करते हैं कि पहले गुड़ और तिल को कूटकर बनाई जाने वाली गजक लोगों की पहली पसंद होती थी। आज भी कई लोग उसे पसंद करते हैं, लेकिन समय के साथ खान-पान में बदलाव आया है। अब नई पीढ़ी चीनी और खोया वाली गजक अधिक पसंद करने लगी है, जबकि गुड़ वाली गजक कम लोग लेते हैं।

यह केवल मिठाई की बिक्री नहीं, बल्कि मेहनत, परंपरा और विश्वास की कमाई है। छोटे व्यापारियों के लिए यह मौसम पूरे वर्ष की आमदनी का एक बड़ा सहारा बनता है।

कई शहरों को जोड़ती यह मिठास

बरेली की गजक सिर्फ एक स्वाद नहीं, बल्कि दो शहरों के बीच आर्थिक और सांस्कृतिक सेतु है। एक ओर बरेली के गजक कारीगरों को रोजगार मिलता है, तो दूसरी ओर अन्य शहरों के लोगों को सर्दियों की खास सौगात मिलती है। इस तरह यह परंपरा न केवल व्यापार को, बल्कि आपसी जुड़ाव को भी मजबूत करती है।

गजक का स्वाद लेते ग्राहक (फोटो साभार: सुनीता)

बरेली का सुरमा, “झुमका गिरा रे” जैसा मशहूर गीत और गजक की मिठास -ये सब मिलकर इस शहर को विशेष बनाते हैं। सच कहा जाए तो बरेली की पहचान केवल उसके बाजारों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी जीवंत परंपराओं और मेहनतकश कारीगरों में बसती है।

 

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