खबर लहरिया Blog UP Mahoba: महोबा की शादियां और उड़द के दाल के बड़े सिर्फ व्यंजन नहीं, सांस्कृतिक विरासत का उत्सव है

UP Mahoba: महोबा की शादियां और उड़द के दाल के बड़े सिर्फ व्यंजन नहीं, सांस्कृतिक विरासत का उत्सव है

बुंदेलखंड की धरती हमेशा से अपनी परंपराओं, रस्मों और त्यौहारों के अनोखे रंगों के लिए जानी जाती है। यहां मकर संक्रांति पर जहां उड़द की दाल के बड़े और मूंग के दाल के मंगोड़े हर घर की पहचान माने जाते हैं तो वहीं बुंदेलखंड का महोबा जिला एक और भी खास परंपरा को आज तक संजोए हुए है।

रिपोर्टिंग: श्यामकली, लेखन: गीता 

Women going to wash pulses

दाल धुलने जाती महिलाएं (फोटो साभार-श्यामकली)

 महोबा में  त्यौहार के अलावा शादी-विवाह के मौके पर भी उड़द की दाल के बड़े बनाने की सदियों पुरानी रिवाज है। अगर बड़े न बने तो मानो शादी की रस्में अधूरी 

women washing pulses

दाल धुलती महिलाएं (फोटो साभार-श्यामकली)

गुलाब रानी कहती हैं कि महोबा जिले में यह मान्यता है कि शादी तब तक पूरी नहीं मानी जाती जब तक घर में उड़द के दाल के बड़े न बने हों। यह बड़े सिर्फ खाने का हिस्सा नहीं हैं बल्कि शादी की एक अपनी रस्म भी है। तभी तो महिलाएं बड़े बनते हैं। बड़े बनाने की शुरुआत दाल पीसने से लेकर तलने तक एक सामूहिक रंग

washing lentils

दाल धुलती हुई (फोटो साभार-श्यामकली)

शादी से कुछ दिन पहले ही घरों के आंगन में एक तरह से खुशी और उत्सव का माहौल बनने लगता है। बड़े बनाने की प्रक्रिया रसोई का कोई साधारण काम नहीं बल्कि पूरे परिवार और पड़ोस की महिलाओं की भागीदारी से पूरा होने वाला सामूहिक काम होता है। तभी तो एक साथ महिलाएं दाल धुल रही हैं। अब बड़े बनाने के लिए तैयार दाल

ground pulses

पीसी हुई दाल (फोटो साभार-श्यामकली)

पुष्पा कहती हैं कि शादी- विवाह का माहौल भीड़ और उत्साह से भरा होता है। सुबह आंगन में एक साथ बैठ कर या नदी, तालाब में जाकर महिलाएं उड़द की दाल को धुलती है क्योंकि काफी ज्यादा मात्रा में दाल होती है। दाल धुलने के बाद पीसने की यह परंपरा आज भी है कि हाथ से ही सिलबट्टा में पीसी जाती है ताकि उसका स्वाद और भी अच्छा कायम रखा जा सके जो मिक्सी मशीन से नहीं मिलता।

मुल्ली बताती है कि दाल में मसाले मिलाने से लेकर उसके गोल-गोल बड़े बना कर तैयार करने तक हर महिला का अपना अलग अनुभव और कला झलकती है। जैसे कि बुजुर्ग महिलाएं शादी की इस रस्म से जुड़ी परंपरा के बारे में बताती हैं। बीच के उम्र की महिला आकार संभालती हैं और युवा लड़कियां पहली बार इस परंपरा को देखती और सीखती हैं।

ground pulses

पीसी हुई दाल (फोटो साभार-श्यामकली)

बड़े  पोती महिला(फोटो साभार-श्यामकली)

जब बड़े तलने का नंबर आता है तो पूरा आंगन एक खास खुशबू से महक उठता है। यह वो क्षण होता है जब बड़े की स्वादिष्ट महक से मुंह में पानी आ जाता है। हंसी भी आती है महिलाएं एक साथ इकठ्ठा बैठे काम के साथ गपशप और हँसी मजाक भी करती हैं और रस्म से जुड़े गाने भी गाती हैं। इन सभी आपसी सहयोगों के वातावरण से आंगन और भी चहक उठता है। स्वाद से ज्यादा रिश्तों को जोड़ता है ये माहौल

This crowd is a combination of relationships

रिश्तों का मेल है ये भीड़ (फोटो साभार-श्यामकली)

गुलाब रानी कहती हैं कि यह पूरा काम शादी में सिर्फ बड़े बनाने तक सीमित नहीं है। यह परिवार और समाज को जोड़ने वाली ऐसी रस्म है जिससे रिश्तों की गर्माहट और सामुदायिक एकता झलकती है जैसे कढ़ाही में बड़े तलते हुए झलक रही है। जो महिलाएं आज बड़े बना रही हैं वहीं महिलाएं कभी अपनी मां और दादी के साथ बैठकर यह परंपरा सीखा करती थीं। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी प्रेम, सम्मान और संस्कार के साथ आगे बढ़ती रहती है। कढ़ाई में बडे तलती महिलाएं 

बड़े तलने के से पूरे घर में फैली खूसबू(फोटो साभार-श्यामकली)

महोबा की शादियों में उड़द के बड़े को सिर्फ एक पकवान नहीं माना जाता यह घर की शुभ शुरुआत और नवविवाहितों के लिए आशीर्वाद और परिवार की सांस्कृतिक का प्रतीक भी होता है। इसलिए तो महिलाएं एक साथ सामुहिक होकर बड़े को पोती हैं। पुष्पा कहती है कि शादी में परोसा जाने वाला एक-एक बड़ा उस पूरे सामूहिक भावनाओं और परंपरा का संजोया हुआ स्वाद होता है, जिसे हर परिवार गर्व से निभाता है। क्यों खास हैं महोबा में उरद के दाल के  बड़े

The elders are ready, which are considered auspicious in marriage.

तैयार हैं बड़े जो शादी में शुभ माने जाते हैं (फोटो साभार-श्यामकली)

महोबा की यह परंपरा यह बताती है कि हमारे यहां खाने के व्यंजन सिर्फ स्वाद के लिए नहीं बनते बल्कि वे संस्कृति, विरासत और आपसी जुड़ाव के लिए भी होते हैं। उड़द के दाल के ये बड़े यही संदेश देते हैं कि रस्में सिर्फ निभाई नहीं जातीं उन्हें महसूस किया जाता है और महोबा की हर शादी में बड़े का बनना इस बात का प्रमाण है कि परंपराएं जितनी भी पुरानी हों उतनी ही खूबसूरत लगती हैं जैसे पहले लगती थीं।

 

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