ईंट-भट्ठों पर काम करने वाले मजदूरों का जीवन कठिनाइयों और चुनौतियों से भरा हुआ है। इस बात का अनुभव मुझे तब हुआ जब मैंने जनवरी 2026 में कानपुर महानगर के आसपास स्थित ईंट भट्ठों पर काम करने वाले लोगों के जीवन को करीब से देखा। मुझे ‘उड़ान फेलोज’ के फील्ड सपोर्ट के तहत स्टोरी कवरेज करने का अवसर मिला था। वहाँ जाकर ईंट भट्ठों पर काम कर रहे प्रवासी मजदूरों, खासकर महिलाओं की ज़िंदगी को करीब से देखने के बाद मेरा एहसास और भी गहरा हो गया कि विकास की चमक भले ही कितनी तेज क्यों न हो, उसके पीछे छिपा अंधेरा उतना ही गहरा है।
रिपोर्ट – गीता देवी, लेखन – सुचित्रा
ईंट-भट्ठों पर बुनियादी जरूरतें गायब
तपती भट्टियों के बीच दिन-रात मेहनत करने वाले ये मजदूर उस सच्चाई के गवाह हैं। यहां न उन्हें इंसान की तरह रहने की बुनियादी सुविधाएँ मिलती हैं और न ही बीमार पड़ने पर इलाज। स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर ईंट भट्ठों पर कुछ भी उपलब्ध नहीं है -न प्राथमिक उपचार, न डॉक्टर और न ही दवाइयाँ।
ईंट-भट्टे पर काम कर रही महिला का प्रसव
वहां सबसे ज्यादा मन को झकझोर देने वाला दृश्य तब सामने आया जब काम कर रही महिला का सुविधाओं के अभाव में जमीन पर प्रसव हुआ। पुखरायां के विजय ईंट भट्ठे पर मैं एक चूल्हे के पास बैठी बिहार की रहने वाली एक महिला से बातचीत कर रही थी। तभी अचानक उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसी समय झुग्गी के अंदर से एक महिला की दर्दभरी चीख सुनाई दी। वह घबराकर बोली, “मेरी बहू को बच्चा होने वाला है, बाद में बात करूंगी।”
तभी मुझे एहसास हुआ कि यहाँ गर्भवती महिलाओं की डिलीवरी भी इन्हीं झुग्गी-झोपड़ियों के भीतर हो रही है -जहाँ न साफ फर्श है, न स्वच्छ पानी, न साफ-सफाई की कोई व्यवस्था और न ही किसी स्वास्थ्यकर्मी की मौजूदगी। चारों ओर मिट्टी और धुएँ से भरा माहौल और उसी झुग्गी के अंदर जमीन पर प्रसव पीड़ा से तड़पती एक महिला। इन सब हालतों में वह महिला अपने बच्चे को जन्म देती है। यह दृश्य सिर्फ एक परिवार की बेबसी नहीं था, बल्कि उस सामूहिक चुप्पी का प्रतीक था जिसमें हम समाज के तौर पर आँखें मूँदकर खड़े हैं।
मेरी आंखों के सामने एक महिला ने झुग्गी में, मिट्टी के फर्श पर बच्चे को जन्म दिया। उस समय उस महिला के चेहरे पर दर्द से ज्यादा डर था और मेरे भीतर गुस्से के साथ गहरी असहायता।
हमारे देश में अस्पताल में प्रसव को अनिवार्य बताया जाता है लेकिन इन महिलाओं के लिए न अस्पताल उपलब्ध है, न सुरक्षित घर और मानो इंसान होने का अधिकार भी नहीं।
यह मेरे लिए सिर्फ एक दृश्य नहीं था बल्कि सिस्टम की कमी और सरकारी दावों की वास्तविकता का प्रमाण था। प्रवासी मजदूरों के श्रम से हमारी इमारतें खड़ी होती हैं। उन्हीं इमारतों में हमें रहने, खाने और इलाज जैसी तमाम सुविधाएं मिलती हैं। लेकिन जिनकी मेहनत से यह सब संभव होता है, उनकी जिंदगी सरकारी आंकड़ों में भी कहीं दर्ज नहीं दिखती।
मजूदरों का स्वास्थ्य खतरे में
एक सामाजिक कार्यकर्ता और जागरूक नागरिक होने के नाते यह अनुभव मुझे भीतर तक झकझोर गया। यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि मजदूरों के साथ हो रहा गहरा अन्याय है। यदि अब भी प्रवासी मजदूरों के स्वास्थ्य और जीवन की सुरक्षा को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह हमारी सामूहिक अनदेखी का सबसे कड़वा प्रमाण होगा।
एक पत्रकार होने के नाते मैं अपनी कलम से उनका दर्द बयां कर सकती हूँ, उनकी आवाज़ बन सकती हूँ, लेकिन उन महिलाओं की पीड़ा को कम नहीं कर सकती। यही असहायता मुझे आज भी भीतर से बेचैन कर देती है।
सरकारी दावे और ज़मीनी हकीकत
कचोटते मन से मैं सोच रही थी कि हमारी सरकार बड़े-बड़े मंचों से स्वास्थ्य सेवाओं की सफलता की कहानियां क्यों सुनाती है। हर साल स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए भारी-भरकम बजट पेश किया जाता है। गांव-गांव में आशा कार्यकर्ता टीकाकरण करती हैं और दावा किया जाता है कि अब कोई भी महिला घर पर प्रसव नहीं करेगी।
टीकाकरण और पोषण आहार तक नहीं होता नसीब
गंगा ईंट भट्ठे पर काम करने वाली महिलाओं का कहना है कि वे केवल पेट भरने और बच्चों का पालन-पोषण करने की मजबूरी में यहां काम करने आती हैं। गर्भवती महिलाओं का न तो नियमित टीकाकरण हो पाता है और न ही आंगनबाड़ी केंद्रों से मिलने वाला पोषण आहार उन्हें मिलता है, जो उनके और उनके होने वाले बच्चे के स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है।
भट्ठे पर छह महीने से लेकर पांच साल तक के कई छोटे बच्चे भी रहते हैं, जो दिनभर धूल-मिट्टी में खेलते रहते हैं। उन्हें भी पोषण आहार की आवश्यकता है और यह सुविधा सरकार की ओर से उपलब्ध है, लेकिन पलायन उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई है, जो उन्हें इन लाभों से दूर कर देती है।
ईंट भट्ठे का काम उनका रोजगार, स्थायी जगह नहीं
महिलाएं बताती हैं कि अपने राज्य और गांव में काम न मिलने के कारण वे हर साल पूरे परिवार के साथ काम की तलाश में पलायन करती हैं। इस कारण उनका नाम अपने क्षेत्र के आंगनबाड़ी केंद्रों में दर्ज नहीं हो पाता। यदि नाम दर्ज भी हो जाए, तो हर महीने इतनी दूर जाकर लाभ लेना संभव नहीं होता। राशन मिलता है, उससे अधिक खर्च किराया-भाड़े में हो जाता है। यही वजह है कि वे अपना नाम दर्ज नहीं करा पातीं और सरकारी योजनाओं से वंचित रह जाती हैं।
यदि उन्हें टीकाकरण करवाना होता है, तो वे अपने खर्च पर शहर जाकर अस्पताल में टीका लगवाती हैं। भट्ठे पर रहते हुए कोई स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण कई गर्भवती महिलाएं टीकाकरण नहीं करा पातीं।
वे अपनी ही बहन का उदाहरण देते हुए बताती हैं कि उनकी बहन पांच महीने की गर्भवती है, लेकिन अब तक उसे एक भी टीका नहीं लगा है।
कागजों पर तेजी से चलते हैं स्वास्थ्य संबंधित अभियान
स्वास्थ्य विभाग द्वारा चलाए जा रहे टीकाकरण कार्यक्रम -जैसे प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान और जननी सुरक्षा योजना। इनका उद्देश्य गर्भवती महिलाओं को निःशुल्क जांच, नियमित टीकाकरण और सुरक्षित प्रसव की सुविधा उपलब्ध कराना है। इसके बावजूद ईंट भट्ठों पर काम करने वाली महिलाओं तक ये सुविधाएं नियमित रूप से नहीं पहुंच पातीं। इसका मुख्य कारण है –
जागरूकता की कमी और भट्ठों तक स्वास्थ्य सेवाओं का न पहुंचना, आवश्यक दस्तावेज़ों का अभाव होना। चाहे आंगनबाड़ी से मिलने वाला पोषण आहार हो, टीकाकरण अभियान हो या प्रसव के समय अस्पताल तक पहुंचने की सुविधा -इनमें से कोई भी व्यवस्था वहां व्यवस्थित रूप से उपलब्ध नहीं है।
ईंट भट्ठों में काम करने वाली महिलाओं पर ज्यादा बीमार होने का खतरा
परिणामस्वरूप, ईंट भट्ठों में काम करने वाली महिलाओं और उनके बच्चों में कुपोषण, एनीमिया और गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है। यदि भट्ठों के आसपास आंगनबाड़ी केंद्र और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, तो स्थिति में काफी सुधार संभव है।
हालांकि, भट्ठा मालिक और मुनीम का कहना है कि कभी-कभार टीकाकरण के लिए टीम आती है, लेकिन अधिकांश मामलों में मजदूरों को इलाज के लिए स्वयं शहर जाना पड़ता है। गंभीर स्थिति होने पर ही वे साधन और डॉक्टर बुलवाते हैं। निजी डॉक्टर समय-समय पर आते रहते हैं, लेकिन सरकारी स्वास्थ्य विभाग की टीम नियमित रूप से भट्ठों पर नहीं पहुंचती।
जब स्वयं भट्ठा मालिक यह स्वीकार कर रहे हैं कि वहां स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ऐसे में समस्या का समाधान कैसे होगा।
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पुखरायां के अधिक्षक से जब स्वास्थ्य टीम के रोल को लेकर बात की गई, तो उन्होंने कहा कि ये जिम्मेदारी ब्लॉक स्तर पर पीएससी केंद्र होते हैं वहां की टीम कि होती है। वो टीम निरीक्षण करती होगी टीकाकरण भी होता होगा वही जानकारी दे सकते हैं।
ईंट भट्ठों पर काम करना वास्तव में चुनौतीपूर्ण और खतरा भरा है। इस तरह की खबरे मीडिया की नज़रों से भी गायब रहती हैं। इन लोगों की मेहनत से हम खुद का घर बना पाते हैं लेकिन उन्हें न तो सरकार से कोई सुविधा मिल पाती है और न ही ईंट भट्टे के मालिक उनके रहने और स्वास्थ्य के लिए कोई सुविधा दे पाते हैं। ईंट भट्ठों पर ऐसी बुनियादी जरूरतों का होना बहुत आवश्यक है।
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