उत्तर प्रदेश के जिला कानपुर देहात के गौर गांव और नगर के बेंदा शेर पूर, और बांध जैसे कई गांवों में किसान आज भी पारंपरिक खेती को अपनाते हैं। यहां के किसान अपने खेतों में गोबर की खाद का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, जो न केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है बल्कि पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित मानी जाती है।
रिपोर्ट – गीता देवी, लेखन – सुचित्रा
बाजार में फसलों के तेजी से उत्पादन के लिए कई रासायनिक खाद यूरिया (Urea), डीएपी DAP, और केमिकल से बनाई गई खाद उपलब्ध है। इसके बावजूद कई किसान खेती के लिए प्राकृतिक रूप से तैयार खाद का इस्तेमाल करते हैं। किसानों का मानना है कि यूरिया और डीएपी जैसी रासायनिक खादों की तुलना में गोबर की खाद मिट्टी को बेहतर बनाती है। यह मिट्टी में जैविक तत्वों की मात्रा बढ़ाती है और लंबे समय तक फसल की पैदावार को बनाए रखने में मदद करती है। खासकर धान, गेहूं और दलहन जैसी फसलों में इसका उपयोग करने से मिट्टी की नमी बनाए रखने की क्षमता बढ़ जाती है जिससे सिंचाई की आवश्यकता भी कम हो जाती है।
इसके अलावा, पशुपालन भी किसानों के जीवन और अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसानों को आसानी से गोबर उपलब्ध हो जाता है जिससे उनकी लागत कम रहती है। इसी कारण इस क्षेत्र में जगह-जगह गोबर की खाद के बड़े-बड़े ढेर देखने को मिलते हैं।
खेती के लिए गोबर खाद के फायदे
बांदा जिले के बड़ोखर खुद गांव में रहने वाले किसान प्रेम सिंह ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से एमबीए किया है। उन्होंने कृषि पर कोई खास डिग्री नहीं ली लेकिन महात्मा गांधी ग्रामोदय विश्वविद्यालय चित्रकूट से रूरल डेवलपमेंट में मैनेजमेंट की पढ़ाई की है। आज वह जैविक विविधता वाली खेती कर रहे हैं। गोबर की खाद फसलों के लिए कितनी उपयोगी है कृषि विशेषज्ञ प्रेम सिंह ने बताया। उन्होंने कहा “धरती (खेत) का असल भोजन तो गोबर, सूखी पत्तियां, टहनियां ये सब जब गोबर में मिलाया जाता है तो ये कम्पोस्ट कहलाता है। तो इसमें छोटे सूक्ष्म जीवाश्म का भोजन बन जाता है, तो जो सूक्ष्म जीवाश्म पर्यावरण में होते वो इसमें पलते हैं। ये सूक्ष्म जीव गोबर और अन्य चीजों को सड़ाकर उसे ऐसे पोषक तत्वों में बदल देते हैं जैसे फॉस्फोरस, पोटाश, मैग्नीशियम और सल्फर। यही तत्व पौधों के लिए भोजन का काम करते हैं और पौधों को बढ़ने में मदद करते हैं। इससे जो फसल उगती है, वह ज्यादा अच्छी और पौष्टिक होती है। साथ ही, गोबर की यह खाद पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित और फायदेमंद होती है।”
केंचुआ से बना खाद भी फसलों के लिए फायेदमंद
गौर गांव के किसान महेश का कहना है कि उनके गांव के लगभग 80 परसेंट किसान है,जो खेती पर निर्भर है और पीढ़ियों से खेतों में गोबर की खाद का इस्तेमाल करते आ रहे हैं। उनके यहां सभी किसान अगस्त, सितंबर से गोबर की खाद को एक जगह इकट्ठा करना शुरू कर देते हैं और फिर मई, जून के महीने में जब खेत खली होते हैं तो उस खाद को खेतों में डालते हैं। गोबर की खाद खेतों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। इसके उपयोग से किसानों के मित्र कहे जाने वाले केंचुए बड़ी संख्या में पैदा होते हैं। ये केंचुए मिट्टी को अंदर से भुरभुरा और पोला बना देते हैं जिससे हवा और पानी का संचार बेहतर तरीके से हो पाता है।
केंचुआ खाद बनाने की प्रक्रिया
वर्मी कंपोस्ट खाद एक जैविक खाद है जिसे खासतौर पर केंचुओं की मदद से तैयार किया जाता है। इसे बनाने के लिए सबसे पहले छायादार स्थान पर एक गड्ढा या टंकी तैयार की जाती है, जिसमें सूखी पत्तियां, गोबर और रसोई का जैविक कचरा (जैसे सब्जियों के छिलके) की परतें बिछाई जाती हैं। इसके बाद उसमें नमी बनाए रखने के लिए पानी का हल्का छिड़काव किया जाता है और फिर केंचुओं को उसमें छोड़ दिया जाता है। केंचुए इन जैविक पदार्थों को खाकर उन्हें महीन, पोषक तत्वों से भरपूर खाद में बदल देते हैं, जो पौधों के लिए बहुत लाभकारी होती है। जिसे छानकर खेतों या बगीचों में उपयोग किया जाता है, लेकिन लेकिन जो किसान गोबर और रसोई का कचरा भी बाहर सड़क किनारे पेड़ों के नीचे डालते हैं वह भी धीरे-धीरे सड़ता है और खेतों के लिए फायदेमंद होता है
जब मिट्टी सख्त नहीं रहती तो पौधों की जड़ें आसानी से फैलती हैं और उन्हें अधिक पोषण मिलता है। केंचुए मिट्टी में मौजूद हानिकारक तत्वों को कम कर उसे और उपजाऊ बनाते हैं जिससे प्राकृतिक रूप से उर्वरता बढ़ती है।
किसान कहते हैं कि उनका अनुभव है कि जिन खेतों में नियमित रूप से गोबर की खाद का उपयोग होता है वहां की मिट्टी की गुणवत्ता साल-दर-साल सुधरती जाती है और फसल की पैदावार भी बेहतर होती है। यही कारण है कि इस क्षेत्र के किसान रासायनिक खाद की तुलना में गोबर की खाद को अधिक लाभकारी और टिकाऊ मानते हैं।
यूरिया और डीएपी खाद का फसलों पर असर
घाटमपुर तहसील के बेंदा गांव के किसान जयराम का कहना है कि वह खेतों में यूरिया और डीएपी का उपयोग पूरी तरह बंद नहीं करते लेकिन इसकी मात्रा बहुत कम रखते हैं। उनका मानना है कि रासायनिक खाद का अधिक इस्तेमाल मिट्टी की सेहत पर बुरा असर डालता है।
वे अपने अनुभव से बताते हैं कि रासायनिक खाद फसल को तुरंत बढ़ावा तो देती है लेकिन लंबे समय तक इसके ज्यादा इस्तेमाल से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता कम हो जाती है और वह कठोर हो जाती है। इससे फसलों की गुणवत्ता और उनकी सेहत पर भी असर पड़ता है।
इसके विपरीत, गोबर की खाद मिट्टी को धीरे-धीरे ही सही,लेकिन स्थायी रूप से मजबूत बनाती है और उसमें जरूरी पोषक तत्वों का संतुलन बनाए रखती है। गोबर की खाद से उगाई गई फसलें अधिक प्राकृतिक और सुरक्षित मानी जाती हैं।
पशु पालन भी और खाद भी
शेरपर गांव कि महिला किसान राजकुमारी बताती हैं कि उनके क्षेत्र में लगभग हर परिवार खेती के साथ-साथ पशुपालन को भी महत्व देता है। सभी के पास बड़ी संख्या में जानवर है। गाय-भैंसे पालने के दो फायदे है एक तो उन्हें दूध मिलता है और दूसरा उन्हें खाद मिल जाती है। वह बताती हैं कि उनके घर में 5 भैंसें हैं जिनसे हर रोज लगभग 10 तसला गोबर निकलता है,जो खाद के रुप में साल भर इक्कठा किया जाता है और फिर खेतों में डाला जाता है। खाद को खेतों में डालने के बाद फैलाया जाता है और फिर जब बारिश होती है तो वो खाद्य पानी में मिट्टी के साथ मिल जाती है। इसके बाद खेतों की जुताई करके फसल बोई जाती है।
बांध गांव कि माया कहती है,कि गोबर से बनने वाले कंडे वह केवल कुछ दिनों तक घरेलू ईंधन के लिए बनाती हैं जबकि बाकी गोबर को पूरे साल इकट्ठा करके खाद के रूप में इस्तेमाल करती हैं। इससे उन्हें खेतों के लिए बाहर से महंगी खाद खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती और मिट्टी की उर्वरता भी प्राकृतिक तरीके से बनी रहती है।
सालों काम आती है खाद
शेरपुर गांव के किसान अर्जुन सिंह यादव का कहना है कि उनके क्षेत्र में पानी की सुविधा होने के कारण बाहर महीने खेती होती है, जिससे वे अलग-अलग मौसमों में विभिन्न फसलें उगा लेते हैं। रासायनिक खाद मतलब युरिया और डीएपी का एक बीघे में बहुत खीच कर एक बोरी का इस्तेमाल करते हैं बांकी गोबर की खाद डालते हैं। इसकी वजह भैंस पाल उनके गांव में ज्यादा होता है और वह गोबर की खाद के काम आ जाता है। यहां के किसान केवल खेती पर ही नहीं बल्कि पशुपालन पर भी निर्भर रहते हैं।
वे दिन-रात मेहनत कर खेतों में अच्छी फसल तैयार करते हैं और साथ ही अपने पशुओं से मिलने वाले दूध को बेचकर आय भी बढ़ाते हैं। किसानों के अनुसार इस तरह उन्हें खेती और डेयरी, दोनों से लाभ मिलता है जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।
हालांकि वे यह भी मानते हैं कि यह सब आसान नहीं है। खेती के साथ-साथ पशुओं की देखभाल करना बहुत मेहनत भरा काम है जिसमें समय, श्रम और धैर्य—तीनों की जरूरत होती है। फिर भी बेहतर आय और जीवनयापन के लिए किसान इस मेहनत को जरूरी मानते हैं और पूरे मन से अपने काम में लगे रहते हैं।
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