राशन में मिलने वाले अनाज में मोटा अनाज भी दिया जाता है लेकिन लोगों का कहना है कि इसे घर में लोग कम पसंद करते हैं। यूपी के चित्रकूट जिले के मऊ ब्लॉक के मुरका और सुरौधा गांव में राशन में मिले बाजरा को लेकर लोगों में नाराज़गी देखी जा रही है।
गर्मी का समय शुरू तो अब बाजरा क्यों?
गांव की रहने वाली शोभा का कहना है कि अब गर्मी का मौसम शुरू हो चुका है। ऐसे समय में राशन में बाजरा दिया जा रहा है जो इस मौसम में खाने में ठीक नहीं लगता। उनका कहना है कि यदि बाजरा ही देना था तो सर्दियों के मौसम में दिया जाना चाहिए था। जब इसे खाने की इच्छा भी होती है और यह मौसम के अनुसार भी उपयुक्त रहता है।
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शोभा के अनुसार जिन परिवारों के पांच यूनिट हैं। उन्हें दस किलो बाजरा, दस किलो गेहूं और पांच किलो चावल दिया जा रहा है। वह कहती हैं कि चावल में कटौती कर बाजरा बढ़ा दिया गया है। “हमारे बच्चे बाजरा खाते ही नहीं हैं, ऐसे में हम क्या करें? अगर बाजरा ही लेना पड़े तो दिक्कत है, नहीं तो हम इसे नहीं लेंगे।” उन्होंने नाराज़गी जताते हुए कहा।
गर्मी में बाजरा कोई नहीं खाता
मुरका गांव की रहने वाली रानी का कहना है कि उनके पास खेती-बाड़ी नहीं है। वे रोज कमाकर खाने वाले लोग हैं। उनके लिए कोटे का राशन ही सहारा होता है जिससे कुछ दिनों तक घर चल जाता है।
रानी कहती हैं – “इस महीने राशन में बाजरा दिया गया है लेकिन उसे खाने वाला कौन है? उनका कहना है कि पिछले साल भी गर्मियों के समय कोटे में बाजरा और ज्वार दिया गया था। मजबूरी में उन्होंने राशन तो ले लिया लेकिन उसे परिवार ने नहीं खाया और आखिरकार जानवरों को खिला दिया।
उनका यह भी कहना है कि बाजरे का आटा पिसवाकर रोटी बनाते हैं तो वह कड़ी और खुरदुरी बनती है, ठीक से खाई नहीं जाती। वह कहती हैं “इतनी सख्त रोटी होती है कि निगलना मुश्किल हो जाता है, फिर ऐसे अनाज के वितरण का क्या फायदा जिसे गरीब जनता खा ही न सके?”
रानी के अनुसार गर्मी के मौसम में बाजरा खाने से पेट में जलन और अन्य दिक्कतें भी होने लगती हैं। इसी कारण गांव में कई लोग राशन में बाजरा मिलने से असंतुष्ट हैं।
आज कल की पीढ़ी नहीं करती पसंद मोटा अनाज
मऊ ब्लॉक की रहने वाली अनीता बताती हैं कि वे लोग सर्दियों के मौसम में किसानों से बाजरा खरीदकर खाते रहे हैं। बाजरे का आटा पिसवाकर रोटी और चौसेला बनाते हैं। बाजरे का भात भी बनाकर खाते हैं। ठंड के दिनों में लोग बाजरा भूनकर या फुलाकर भी खाते हैं। उनके दादा-दादी (दाई-बाबा) आज भी इस तरह का खाना पसंद करते हैं।
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लेकिन अनीता कहती हैं कि आज के बच्चे बाजरा खाना पसंद नहीं करते। अब गर्मी आ गई है तो कोटे में जो बाजरा मिल रहा है। बाजरा कितना पुराना है, यह पता नहीं लेकिन उसमें से महक आती है। उनका कहना है “हम इसे नहीं खाएंगे। आप ही रख लीजिए भले ही हमें भूखा रहना पड़े।”
अधिकतर लोग राशन पर निर्भर
मऊ ब्लॉक की रहने वाली सुमन का कहना है कि वे लोग गरीब हैं और सरकारी राशन पर ही निर्भर रहते हैं। उनके अनुसार, इस मौसम में चावल की ज्यादा जरूरत होती है लेकिन चावल में कटौती कर बाजरा दिया जा रहा है।
सुमन का कहना है कि इस समय लगभग हर कोटे पर बाजरा आया है। उनका आरोप है कि हर साल राशन के साथ अलग-अलग सामान भी दे दिया जाता है – जैसे निरमा साबुन, मसाला या सोयाबीन बड़ी जिसके लिए अतिरिक्त पैसे देने पड़ते हैं। वे बताती हैं कि साबुन से कपड़े ठीक से साफ नहीं होते और मसाले की खुशबू भी अजीब लगती है जिससे खाना खाने का मन नहीं करता।
उनका सवाल है कि अगर दी जाने वाली सामग्री लोगों के उपयोग में ही न आए तो ऐसे वितरण का क्या फायदा।
बाजरा देना सरकार की अच्छी पहल
रमेश का कहना है कि बाजरा को राशन कोटा में शामिल किया जाना अच्छी पहल है लेकिन इसे खासकर सर्दियों के मौसम में वितरित किया जाए तो यह सेहत के लिए और भी फायदेमंद होगा। उनका कहना है कि बाजरे की खेती में कम पानी और कम खाद की जरूरत पड़ती है फिर भी धीरे-धीरे इसकी खेती कम होती जा रही है। पहले के समय में बड़े पैमाने पर बाजरे की खेती होती थी लेकिन अब यह कम हो गई है।
वे चिंता जताते हैं कि नई पीढ़ी मोटे अनाज को पहचानना भी भूलती जा रही है। आज के बच्चे मोटा अनाज खाना पसंद नहीं करते जबकि पहले लोग यही अनाज खाते थे और ताकतवर रहते थे। उस समय बीमारियां भी कम होती थीं और लोग लंबी उम्र तक जीते थे। आज तरह-तरह के खाद्य पदार्थों के कारण नई बीमारियां बढ़ रही हैं।
रमेश का कहना है कि लोगों को फिर से मोटे अनाज, खासकर बाजरे को अपनी रोजमर्रा की थाली में शामिल करना चाहिए क्योंकि यह सेहत के लिए लाभदायक है।
जो राशन आया है वही वितरण होगा – कोटेदार
मुरका के कोटेदार चन्द्रभान का कहना है कि सरकार की ओर से जो राशन उनके कोटे पर आता है वही वे वितरित करते हैं। इस बार चावल की मात्रा में कटौती हुई है और उसकी जगह बाजरा आया है।
उन्होंने बताया कि उनके यहां करीब साढ़े आठ सौ कार्डधारक हैं जिनमें लगभग ढाई सौ पात्र गृहस्थी कार्ड और पचपन अंत्योदय कार्ड शामिल हैं। गांव की कुल आबादी लगभग ढाई हजार है। इस बार प्रति यूनिट दो किलो बाजरा, दो किलो गेहूं और एक किलो चावल मिला है।
कुछ लोग बाजरा लेने से मना कर रहे हैं और कह रहे हैं कि वे इसे नहीं लेंगे लेकिन कोटेदार का कहना है कि सरकारी नियम के अनुसार जो राशन आया है उसका वितरण करना अनिवार्य है। अगर वे किसी को ज्यादा चावल दे देंगे तो बाकी लोगों को कैसे देंगे।
उन्होंने यह भी बताया कि निरमा साबुन और मसाला-बड़ी जैसी अन्य वस्तुएं हर महीने आती हैं। जो लोग सौ रुपये जमा करते हैं उन्हें ये सामान दिया जाता है और जो पैसा नहीं देते उन्हें यह नहीं मिलता। लेकिन बाजरा लेना सभी कार्डधारकों के लिए अनिवार्य है क्योंकि यह सरकारी राशन का हिस्सा है।
राशन में मिलने वाला अनाज समयानुसार नहीं मिलता जिसकी वजह से ग्रामीण नाराज रहते हैं। समय रहते यदि यह अनाज मिल जाता तो लोग इतने परेशान नहीं होते। राशन में मिलने वाले अनाज में अक्सर ऐसी शिकायत देखने को मिलती है।
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