चकजाफर माफी गांव में ग्राम पंचायत की इमारतों पर करोड़ों रुपये खर्च हो जाते हैं लेकिन मृतकों के अंतिम संस्कार के लिए कोई स्थायी जगह नहीं है। गांव में लोग अपने परिजनों का अंतिम संस्कार करने के लिए भटकने को मजबूर हैं।
रिपोर्टर – सुनीता देवी, लेखन – रचना
आज के समय में जहां विकास और सुविधाओं की बातें हर जगह की जाती हैं वहीं कई गांव ऐसे भी हैं जहां इंसान की मौत के बाद उसे अंतिम विदाई देने की बुनियादी व्यवस्था तक नहीं है। अस्पताल, सड़क और भवन तो बन रहे हैं लेकिन शव के अंतिम संस्कार के लिए जरूरी शमशान घाट जैसी जगह अब भी कई इलाकों में नहीं है। इसका सबसे बड़ा असर गरीब और कमजोर तबके पर पड़ता है जिन्हें अपनों को दफनाने या जलाने के लिए इधर-उधर भटकना पड़ता है। मौत के बाद सम्मानजनक अंतिम संस्कार हर व्यक्ति का अधिकार है लेकिन हकीकत में यह अधिकार कई गांवों में सिर्फ कागजों तक सीमित है।
चित्रकूट जिले के कर्वी ब्लॉक के चकजाफर माफी गांव में आज तक शमशान घाट नहीं बन पाया है। गांव वालों का कहना है कि ग्राम पंचायत की इमारतों पर करोड़ों रुपये खर्च हो जाते हैं लेकिन मृतकों के अंतिम संस्कार के लिए कोई स्थायी जगह नहीं है। हिंदू धर्म में दाह संस्कार को बहुत जरूरी माना जाता है क्योंकि इसे आत्मा की मुक्ति से जोड़ा जाता है। शमशान घाट को पवित्र स्थान माना जाता है जहां पंचतत्व में शरीर का विलय होता है। लेकिन इस गांव में लोग अपने परिजनों का अंतिम संस्कार करने के लिए भटकने को मजबूर हैं। बरसात के मौसम में हालात और भी खराब हो जाते हैं क्योंकि जहां थोड़ी-सी जमीन छोड़ी गई है वहां पानी भर जाता है।
महिलाओं और बुजुर्गों ने बताई अपनी पीड़ा
गांव के लोगों से बात करने पर की सोना नाम की ग्रामीण महिला बताती हैं कि वे पिछले 25 साल से यहां रह रही हैं लेकिन आज तक शमशान घाट नहीं बना। उनका कहना है कि सिर्फ एक विसुवा जमीन छोड़ी गई है जिसमें हमेशा पानी भरा रहता है।
ऐसे ही ग्रामीण महिला रानी बिट्टी कहती हैं कि 14 दिन पहले उनकी सास की मौत हुई थी। उस समय शव जलाने के लिए कोई जगह नहीं थी। गांव के पीछे जो जगह छोड़ी गई है वहां जाने का रास्ता तक नहीं है और चारों तरफ पानी भरा रहता है। मजबूरी में उन्हें शव को कर्वी बेड़ी पुलिया तक ले जाना पड़ा।
गोलका जो 76 वर्ष की हैं का कहना है कि तीन पीढ़ियां गुजर गईं लेकिन शमशान घाट की समस्या जस की तस बनी हुई है। जीवित रहते लोग परेशान हैं और मरने के बाद भी उन्हें सही जगह नहीं मिलती।
दलित परिवारों को सबसे ज्यादा दिक्कत
गांव के और महिलाओं में से सुनीता बताती हैं कि दलित बस्ती के लोगों को सबसे ज्यादा परेशानी होती है। बड़े लोगों के पास अपनी जमीन होती है जहां वे शव दफना देते हैं लेकिन गरीब और दलित परिवारों के पास कोई जमीन नहीं होती। उन्होंने कहा कि उनके समुदाय की आबादी करीब 500 है और अगर शमशान घाट बन जाए तो सबको राहत मिलेगी।
सवित्री का कहना है कि जिस जगह पर लोग अभी अंतिम संस्कार करते हैं वह बस्ती के बहुत पास है। गर्मी के मौसम में चिता की लपटें घरों तक पहुंच जाती हैं और आग लगने का डर बना रहता है। बरसात में पूरा रास्ता और श्मशान वाली जगह पानी से भर जाती है। ऐसे में लोग या तो बहुत दूर जाते हैं या फिर मजबूरी में शव को घर पर ही रखना पड़ता है
प्रशासन को दी गई शिकायत, फिर भी नहीं हुआ काम
गांव के सुग्रीम का कहना है कि शमशान घाट मृतकों का आखिरी घर होता है और हर गांव में इसका होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि चुनाव के समय नेता बड़े-बड़े वादे करते हैं लेकिन बाद में सब भूल जाते हैं।
गांव के प्रधान चिरौजी देवी के पति राजू ने बताया कि गांव में करीब 1700 वोटर और साढ़े तीन हजार की आबादी है। उन्होंने कई बार बैठक में लिखित रूप से शमशान घाट बनवाने की मांग रखी है। जनवरी 2026 में भी ब्लॉक में आवेदन दिया गया है और तीन जगह जमीन भी चिन्हित की गई है लेकिन अभी तक मंजूरी नहीं मिली।
गांव की सचिव गायत्री पांडे ने बताया कि उनके अधीन पांच गांव हैं और चकजाफर के लिए शमशान घाट का प्रस्ताव भेजा गया है। बजट पास होते ही काम शुरू किया जाएगा। गांव वालों का कहना है कि जब तक शमशान घाट नहीं बनेगा तब तक उन्हें हर मौत पर यही दर्द और परेशानी झेलनी पड़ेगी।
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