चित्रकूट का इतिहास सिर्फ मंदिरों पहाड़ियों और आश्रमों में नहीं बसता यह तालाबों में भी दर्ज है, जिनके पानी में समाज की समाजिक परतें घुली हुई हैं। यहां के तीन तालाब दुलहिन तालाब, बाबू तालाब और राड़न तालाब सिर्फ पानी का स्रोत नहीं थे, वे गाँव के रोज़मर्रा के जीवन, श्रम, परंपरा और जेंडर (लिंग) आधारित भेदभाव से जुड़ा इतिहास था।
रिपोर्ट – नाज़नी रिजवी, लेखन – सुचित्रा
तालाब को देखकर और उसके नाम से हम बस ये अनुमान लगाते हैं कि यह एक सिर्फ तालाब ही तो है लेकिन इसके पीछे के इतिहास को जानने की कोशिश नहीं करते हैं। चित्रकूट के ये तीन तालाब इस बात का प्रमाण है कि तालाबों का होना केवल पानी की ज़रूरत नहीं हुआ करता था बल्कि सामाजिक लिंग, जातिगत भेदभाव और रूढ़िवादी ढाँचों को भी दर्शाता था।
दुलहिन तालाब
दुलहिन तालाब का इतिहास कुछ इस तरह का है। यहां के तालाब में पहले के समय में सिर्फ महिलाएं नहाने आती थी। इसके पीछे का कारण यह है कि गाँव की महिलाएँ चाहे वे खेत में काम करती हों या घर में, दुलहिन तालाब में ही नहाती थीं। यह उन महिलाओं के लिए नहाने की सबसे सुरक्षित जगह मानी जाती थी। जहाँ पुरुषों की नजरों से बचकर उनके कामकाज को सीमित कर दिया जाता था।
दुलहिन तालाब का नाम भले ही सुन्दर लग रहा हो पर, यह शब्द खूबसूरती के साथ ये भी बताता है कि सदियों से महिलाओं को अलग ही रखा गया है। लोग इसे एक तरफ अच्छा मानते थे कि महिलाएं कम से कम यहां तो खुलकर बिना डर के नहा सकती थीं। दूसरी तरफ इसकी आलोचना भी की गई जब महिला और पुरुष सामान हैं तो सिर्फ महिलाओं को ही वहां नहाने की अनुमति क्यों है?
यहां के निवासी छक्का जिनकी उम्र 80 साल है उन्होंने ने बताया “हम 40 साल से यहां रहते हैं। पहले बिल्कुल जंगल था तो हम डिलौरा गाँव में रहते थे फिर यहां आकर रहने लगे। मेरा घर इस समय दोनों तलाब के बीचों बीच है। दुलहिन तलाब मेरे घर से 200 मीटर की दूरी पर है और उतना ही बाबू तलाब है। उन्होंने बताया एक समय था जब तरौंहा, डिलौरा, शेखन पुरवा और भी आसपास के पुरवा थे जहां के पुरूष बाबू तलाब में नहाते थे महिलाएं दुलहिन तलाब में लेकिन आज यह तालाब एक नाले और कूड़े के ढेर की तरह रह गया है जिस पानी ने कभी महिलाओं और पुरुषों की जिंदगी में पानी की कमी पूरी की थी।
बाबू तालाब पर पुरुषों का अधिकार
अभिराम नगर पुरवा की रहने वाली फूलकली बताती हैं कि वे वर्ष 2002 से यहाँ रह रही हैं। पहले बाबू तालाब का उपयोग जानवरों के पानी के लिए किया जाता था लेकिन अब उसमें बिल्कुल भी पानी नहीं बचा है और वह किसी काम का नहीं रह गया है।
पहले हम तरौंहा में रहते थे। वहाँ सभी पुरुष पुरुषों के तालाब में स्नान करते थे और सभी महिलाएँ दुलहिन तालाब में नहाती थीं लेकिन अब पानी की इतनी समस्या हो गई है कि यदि ये तालाब ठीक होते तो कम से कम कुछ काम आ जाते जैसे कपड़े धोने के लिए, जानवरों के पानी के लिए।
अब हालत यह है कि पानी के लिए इधर-उधर भटकना पड़ता है। एक किलोमीटर दूर से बार-बार पानी लाना पड़ता है जिससे बहुत परेशानी होती है।
पुरुषों के लिए बाबू तालाब और महिलाओं के लिए दुलहिन तालाब
बाबू तालाब के पास ही रहने वाले हेमराज पटेल बताते हैं कि ये तालाब राजाओं के समय में बनाए गए थे। परंपरा के अनुसार बाबू तालाब पुरुषों के लिए था जबकि दुलहिन तालाब महिलाओं के लिए बनाया गया था।
इतना ही नहीं, जब यहाँ दंगल होता था तो दर्जनों गाँवों के लोग इसमें भाग लेने और देखने आते थे। दंगल के बाद सभी पुरुष इसी बाबू तालाब में स्नान करते थे। महिलाओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो, इसलिए उनके लिए अलग से दुल्हनिया तालाब बनाया गया था।
इन तालाबों के आसपास किसानों के खलिहान और चरागाह हुआ करते थे। जब फसल तैयार होकर खलिहान में आती थी और उस समय मशीनें नहीं होती थीं तब किसान बैलों से अनाज निकालते थे। इसके बाद किसान अपने जानवरों को भी यहीं नहलाते थे और स्वयं भी स्नान करते थे।
दंगल के बाद मिट्टी से लथपथ पहलवान भी इन्हीं तालाबों में नहाते थे। किसानों के लिए यह पानी केवल नहाने का साधन नहीं था बल्कि कड़ी धूप और दिनभर की मेहनत के बाद पसीना और थकान उतारने का सहारा भी था। कई किसान नहाते हुए अपने घर-परिवार और फसल से जुड़ी बातें साझा करते थे।
इस तरह ये तालाब गाँव के सामाजिक, सांस्कृतिक और कृषि जीवन का अहम हिस्सा थे।
इतिहास के पन्नों से गायब तालाब
आज वही बाबू तालाब और दुल्हनिया तालाब इतिहास से लगभग गायब हो चुके हैं। चारों ओर प्लॉटिंग हो चुकी है, अवैध बाउंड्री और निर्माण खड़े हो गए हैं, यहाँ तक कि तालाब तक पहुँचने के रास्ते भी मिटा दिए गए हैं। अब यह तालाब एक बड़े गड्ढे की तरह रह गया है। लगभग 8 बीघे में फैला यह तालाब अब मुश्किल से 3 बीघे में सिमट कर रह गया है।
यह सिर्फ पानी या तालाब की कमी नहीं है, बल्कि गाँव की सुंदरता, उसकी पहचान और तालाबों से जुड़ा पूरा इतिहास धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है।
दुलहिन तालाब का महत्व
अंबिका कुंज वार्ड की सदस्य हेमलता कुशवाहा बताती हैं कि बाबू तालाब और दुलहिन तालाब पहले शेखपुरा और डिलौरा क्षेत्र में आते थे लेकिन वर्ष 2023 के नगर पालिका चुनाव के बाद ये वार्ड नंबर 11 में शामिल हो गए जिसकी सदस्य वे स्वयं हैं। वे बताती हैं कि उनका मायका दुलहिन तालाब के पास ही है।
हेमलता कुशवाहा कहती हैं कि यदि इन तालाबों का विकास उनके अधिकार क्षेत्र में पहले होता और उन्हें इसके लिए बजट मिलता तो वे निश्चित रूप से इन तालाबों को फिर से जीवन देने का प्रयास करतीं। उन्होंने इन तालाबों का महत्व न केवल सुना है बल्कि स्वयं देखा भी है।
हेमलता कुशवाहा के अनुसार, दुलहिन तालाब महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था। यहाँ विवाहित महिलाएँ, सुहागिनें और युवतियाँ स्नान करती थीं। वहीं बाबू तालाब पुरुषों के लिए था, जहाँ गाँव के सभी पुरुष नहाते थे।
राड़न तालाब
राड़न तालाब उन महिलाओं के लिए था जो विधवा थीं। दुलहिन और बाबू तालाब के बीच लगभग आधा किलोमीटर की दूरी थी जबकि राड़न तालाब इन दोनों से लगभग एक किलोमीटर दूर स्थित था।
इन दोनों तालाबों से अलग था राड़न तालाब। यह तालाब उन महिलाओं के लिए था जो विधवा थीं। गाँव से लगभग एक किलोमीटर दूर, एकांत में स्थित यह तालाब अपने आप में एक गहरा सवाल था आख़िर क्यों विधवा महिलाओं को अलग स्नान करना पड़ता था? क्यों उनके शरीर को अपवित्र मान लिया जाता था? क्यों उनके दुख और पीड़ा के साथ समाज ने अलगाव भी जोड़ दिया?
राड़न तालाब पितृसत्ता के सबसे कठोर और क्रूर चेहरे को सामने लाता है जहाँ औरत सिर्फ़ औरत नहीं होती थी उसका वैवाहिक जीवन ही उसका भाग्य तय करता था।
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में भी राड़न तालाब नाम का एक तालाब है। एक ऐसा तालाब है जहां सिर्फ विधवा महिलाएं ही स्नान करती हैं। नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार 17वीं शताब्दी में विधवा महिला ने पक्का तालाब और भव्य मंदिर का निर्माण कराया था।
इन तीनों तालाबों के नाम ही यह उजागर करते हैं कि सदियों पहले समाज ने महिलाओं को अलग-अलग वर्गों में बाँटकर रखने की व्यवस्था बनाई थी। आज भले तालाब में पानी न होने की वजह से और समय के आधुनिक होने से तालाब पहले जैसा नहीं रहा हो लेकिन इन तालाबों को साफ़ करा कर पानी की व्यवस्था की जानी चाहिए ताकि यह तालाब आसपास के गाँवों को पानी दे सके।
आज कहा जाता है कि इलाका विकसित हो रहा है लेकिन जिन तालाबों ने कभी लोगों के जीवन को सींचा था, वे अब कूड़े, नालों और गड्ढों में बदल चुके हैं। यह तालाब लैंगिक भेदभाव का वास्तविक उदाहरण थी तलाब के इस कहानियों और इतिहास को आज सिर्फ आस पास के लोगों की जुबान के माध्यम से ही सुना जा सकता है।
चित्रकूट के ये तीनों तालाब हमें याद दिलाते हैं कि पानी सिर्फ़ पानी नहीं होता। वह समाज की सोच, सत्ता संरचना और भेदभाव को भी प्रतिबिंबित करता है। आज जब तालाब सूख रहे हैं तो केवल जल नहीं जा रहा है। जब इतिहास नहीं रहेगा तो न सवाल बचेंगे और न ही उनके जवाब मिलेंगे।
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