खबर लहरिया Blog UP Bundelkhand : बुन्देलखण्ड में खिचड़ी का शगुन, परम्परा या रूढ़िवाद?

UP Bundelkhand : बुन्देलखण्ड में खिचड़ी का शगुन, परम्परा या रूढ़िवाद?

शादी तय होते ही अनेक रस्में निभाना अनिवार्य माना जाता है -गीत, दावतें, शगुन और उनके साथ जुड़ी कई ऐतिहासिक परम्पराएँ। इन्हीं में से एक बेहद पुरानी और महत्व रखने वाली परम्परा है लड़की के ससुराल पहली “खिचड़ी” भेजना। यानी खिचड़ी बनाने का सामान लड़की के ससुराल भेजा जाता है।

खिचड़ी बनाने का सामान और नए कपड़े की तस्वीर (फोटो साभार : नाज़नी)

रिपोर्ट व लेखन – नाज़नी रिजवी

बुन्देलखण्ड जितना सूखा, कठिन मौसम और आपदाओं के लिए जाना जाता है, उतना ही अपनी अनोखी संस्कृति और संवेदनशील सामाजिक संबंधों के लिए भी प्रसिद्ध है। यहाँ रिश्तों को सिर्फ निभाया नहीं जाता, बल्कि बड़े ही जतन, अपनापन और सम्मान से सजाया जाता है। शादी भी इन्हीं सामाजिक बंधनों का गहरा प्रतीक मानी जाती है।

शादी तय होते ही अनेक रस्में निभाना अनिवार्य माना जाता है -गीत, दावतें, शगुन और उनके साथ जुड़ी कई ऐतिहासिक परम्पराएँ। इन्हीं में से एक बेहद पुरानी और महत्व रखने वाली परम्परा है लड़की के ससुराल पहली “खिचड़ी” भेजना। यानी खिचड़ी बनाने का सामान लड़की के ससुराल भेजा जाता है।

14 जनवरी की मकर संक्रांति पर खिचड़ी

वैसे तो भारत के कई हिस्सों में जैसे बिहार, दिल्ली, उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाती है। इस दिन नए चावल और नई दाल से खिचड़ी बनाई जाती है। यह साधारण भोजन नहीं, बल्कि लोगों के एक साथ बैठकर प्रेम से खाने का प्रतीक है। इस दिन बरा, मुगौड़ा, पपड़िया जैसे कई व्यंजन भी बनते हैं।

यदि किसी लड़की की शादी तय हो गई हो, तो इसी अवसर पर पहली खिचड़ी लड़की के मायके से उसके होने वाले ससुराल भेजी जाती है।

खिचड़ी नहीं, भावनाओं की शुरुआत

कहते हैं कि पूस लगने से पहले यह खिचड़ी भेज दी जाती है। यह केवल दाल-चावल नहीं, बल्कि नए रिश्ते की स्वीकार्यता, भरोसे, प्रेम और सामाजिक जुड़ाव का संदेश होती है। परम्परा के तहत खिचड़ी के साथ दाल-चावल के अलावा – तेल, देसी घी, बेसन, चीनी, गुड़, विभिन्न दालें, गेहूं, चावल, और लड़के वालों के कपड़े भी भेजे जाते हैं। गुड़, हल्दी, नारियल व सुपारी भी शुभ मानकर भेजी जाती हैं।

खिचड़ी के लिए उड़द और मूंग दाल की तस्वीर (फोटो साभार : नाज़नी रिजवी)

परम्परा या बोझ?

हर समाज का इतिहास बताता है कि कुछ परम्पराएँ समाज को जोड़ती हैं, जबकि कुछ समय के साथ बोझ बन जाती हैं। खिचड़ी भेजने की परम्परा शुरुआत में आपसी प्रेम और अपनापन बढ़ाने के उद्देश्य से बनी थी। पर समय के साथ कई परिवारों के लिए यह सामाजिक दबाव और दिखावे में बदल गई है। जो परिवार सक्षम हैं, उनके लिए यह परम्परा ‘फैशन’ बन गई, लेकिन जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है, उनके लिए यह एक बोझ बन जाती है।

सवाल परम्परा के सही-गलत होने का नहीं है। सवाल यह है कि क्या हम इसे अपनी इच्छा से निभाते हैं या समाज के दबाव में? क्या यह प्रेम का प्रतीक है या “किसने क्या भेजा” वाली प्रतिस्पर्धा का हिस्सा?

जब परम्परा प्रेम से हटकर दबाव बन जाए, तब उसके परिवर्तन या विरोध की जरूरत स्वाभाविक हो जाती है। नई पीढ़ी इन्हीं सवालों को लेकर आगे बढ़ रही है परम्परा का सम्मान भी जरूरी है, और बोझ बनने वाली रूढ़ियों को छोड़ देना भी।

एक उदाहरण : हेमराज पटेल का अनुभव

चित्रकूट जिले के लोढवारा निवासी हेमराज पटेल की बेटी की शादी 24 फरवरी 2026 को है। पीढ़ियों से चली आ रही परम्परा के कारण वे भी पहली खिचड़ी भेजने की तैयारी कर रहे हैं।

हेमराज बताते हैं कि वे इस रस्म को नहीं निभाना चाहते थे, पर लड़की के होने वाले ससुराल से कहा गया – “चाहे एक-एक पाव दाल-चावल ही भेज दो, शगुन के तौर पर।”
ऐसे में उन्हें यह परम्परा निभानी पड़ी।

हेमराज की पत्नी ननकी कहती हैं “हमने कोई तैयारी नहीं की थी, पर उनकी इच्छा के अनुसार हमें व्यवस्था करनी पड़ी। 5 दिसंबर से पूस लग जाएगा, इसलिए शुभ काम 4 दिसंबर को ही करना है। घर में खेती-किसानी है, सो सरसों का तेल निकलवा लिया, घी भी घर का है, दाल-चावल-गेहूं भी अपने। बाकी जो सामान था वह बाजार से ले लिया। परिवार में चार लोग हैं, तो चार जोड़ी कपड़े खरीदे। शादी में इतना खर्च होता ही है, दस-बारह हजार और सही; आखिर यह ज़िंदगी भर का रिश्ता है।”

परम्पराएँ बदलने में हिचक क्यों?

किसी समाज की पहचान उसकी परम्पराओं से होती है। खिचड़ी का यह पर्व भी हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। परंतु सभ्यता का मूल सिद्धांत है – समय के साथ बदलाव। जिस परम्परा को जितनी सहजता से निभा सकें, उतना निभाना चाहिए; और जो परम्परा बोझ बन जाए, उसे छोड़ने में हिचक नहीं होनी चाहिए।

खिचड़ी : एक छोटा कटोरा, बड़ा संदेश

यदि खिचड़ी का शगुन रिश्तों को बनाए रखता है, तो यह हमारी सांस्कृतिक विरासत है।
और यदि यह बोझ बन जाए, तो यही सभ्यता हमें सिखाती है कि परम्परा दिल से निभाओ, दिखावे से नहीं।

बुन्देलखण्ड की यह परम्परा बताती है कि जैसे दाल-चावल मिलकर सादा और स्वादिष्ट भोजन बन जाता है, वैसे ही रिश्ते भी सादगी, अपनापन और ईमानदारी से निभाए जा सकते हैं। दिखावे पर टिके रिश्ते अनेक परम्पराओं में उलझ जाते हैं, लेकिन सादगी वाले रिश्ते लंबे समय तक टिकते और मजबूत होते हैं।

 

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