रिपोर्ट में शरिफ़ के रिश्तेदार मिनहाज़ ने बताया कि, “मैं समझ नहीं पा रहा कि यह किस तरह का सिस्टम है। हमने अपने परिवार का एक सदस्य खो दिया। हमने उन लोगों के खिलाफ़ शिकायत दर्ज की थी जिन्होंने शरिफ़ पर हमला किया, जिसकी वजह से उसकी मौत हुई, और अब पुलिस ने हमें ही आरोपी बना दिया है, बजाय इसके कि वे आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही करें।”
उन्नाव पुलिस ने शरिफ़ के परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों के खिलाफ़ प्राथमिक रिपोर्ट दर्ज की है। शरिफ़, वह मुस्लिम व्यक्ति थे जिनकी 15 मार्च 2025 को एक कथित हिंदू समूह द्वारा होली में रंग लगाने से मना करने के विरोध में पीट-पीट कर हत्या कर दी थी।
मक़तूब मीडिया द्वारा इस मामले पर की गई रिपोर्ट के अनुसार, 16 मार्च को कुल 117 लोगों के खिलाफ़ एफआईआर दर्ज की गई। इसमें शरिफ़ के परिवार के रिश्तेदार—मिनहाज, समीर और शादाब—सहित 100 अज्ञात लोग शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यह एफआईआर उन्नाव कोतवाली पुलिस स्टेशन के उपनिरीक्षक, राजेश दीक्षित की शिकायत पर दर्ज की गई है।
रिपोर्ट में शरिफ़ के रिश्तेदार मिनहाज़ ने बताया कि, “मैं समझ नहीं पा रहा कि यह किस तरह का सिस्टम है। हमने अपने परिवार का एक सदस्य खो दिया। हमने उन लोगों के खिलाफ़ शिकायत दर्ज की थी जिन्होंने शरिफ़ पर हमला किया, जिसकी वजह से उसकी मौत हुई, और अब पुलिस ने हमें ही आरोपी बना दिया है, बजाय इसके कि वे आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही करें।”
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117 लोगों पर क्यों हुई एफआईआर?
एफआईआर के अनुसार जिसकी एक कॉपी मक़तूब के पास भी है, बताया कि 15 मार्च की रात 11:45 बजे शरिफ़ की अंतिम यात्रा में बड़ी मात्रा में भीड़ इकठ्ठा हुई। उन्हें उन्नाव के जामा मस्जिद के पास एक क़ब्रिस्तान में दफ़नाया जाना था। जैसे ही यात्रा लखनऊ-कानपुर हाइवे पर पहुंची, कुछ समाज विरोधी लोग कथित रूप से नारे लगाने लगे।
“आईबीपी चौराहे पर मृतक के शव को सड़क के बीच में रख दिया गया, जिसकी वजह से हाइवे बंद हो गया। इससे जिला अस्पताल, रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड जाने वाले लोगों को परेशानी हुई। भीड़ को उकसाया जा रहा था। उच्च अधिकारी पहुंचे और स्थिति को संभाला, परिवार और रिश्तेदारों से बात की, इसके बाद शव को दफ़नाने के लिए ले जाया गया,” एफआईआर में लिखा गया।
इन धाराओं के तहत हुआ मामला दर्ज
मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 191(2), धारा 223, धारा 221, धारा 285 के तहत एफआईआर दर्ज की गई।
धारा 191(2) दंगे से संबंधित है। इसमें दोषी व्यक्ति को दो साल की सज़ा, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। धारा 223, जो एक सार्वजनिक अधिकारी द्वारा जारी किए गए आदेश की अवज्ञा से संबंधित है; धारा 49, उकसाने के लिए सजा निर्धारित करती है; धारा 221, सार्वजनिक अधिकारी के सार्वजनिक काम में रुकावट डालने को अपराध मानती है; और धारा 285, जो सार्वजनिक रास्ते में ख़तरा या रुकावट डालने से संबंधित है। इसका मतलब है कि अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक रास्ते में कोई भी ख़तरा पैदा करता है या वहां रुकावट डालता है, तो उसे सजा दी जा सकती है।
जांच अधिकारी, उपनिरीक्षक ब्रजेश कुमार यादव ने मक़तूब मिडिया से कहा कि अब तक किसी की गिरफ़्तारी नहीं हुई है।
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शरिफ़ के परिवार का आरोप
रिपोर्ट के अनुसार, 48 वर्षीय शरिफ़, उन्नाव के क़ासिम नगर के निवासी थे। वे दो महीने पहले सऊदी अरब से लौटे थे, जहां उन्होंने पिछले 12 सालों से पानी टैंकर चालक के रूप में काम किया था। वे अपनी पत्नी रौशन बानो (45), पांच बेटियों—जिनमें से दो की शादी हो चुकी है—और एक नाबालिग बेटे के साथ रहते थे।
मक़तूब से बात करते हुए, शरिफ़ के परिवार ने आरोप लगाया कि होली खेल रहे एक समूह ने उनके ऊपर रंग डाला और उनका पीछा किया। उन्हें इतनी बुरी तरह से मारा कि उनकी मौत हो गई। शरिफ़ के बेटी बुशरा ने कहा, “उन्हें पीट-पीटकर मार डाला गया।”
जबकि पुलिस के अनुसार पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट कहती है कि शरिफ़ की मौत दिल की धड़कने रुकने की वजह से हुई है।
यह मामला साधारण मौत का नहीं था जिस तरह से रिपोर्ट में बताया गया। बल्कि यह था कि किस तरह से बाहरी प्रतिक्रियाओं की वजह से शरिफ़ को मौत की तरफ़ ढकेला गया, जो पुलिस रिपोर्ट और बयानों से गायब है। हत्या सिर्फ तब नहीं मानी जाती जब किसी पर किसी चीज़ से वार किया जाए। हत्या, उसे भी कहा जाता है जहां व्यक्ति पर मानसिक और शारीरिक हिंसा की जाए और उससे उसकी मौत हो जाए, जैसे हमने यहां शरिफ़ के मामले में देखा।
( यह रिपोर्ट मूल रूप से मक़तूब मीडिया द्वारा की गई है व यह आर्टिकल केवल जानकारी के तौर पर प्रकशित रिपोर्ट से लिया गया है)
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