ट्रांसजेंडर समुदाय से जुड़े लोगों ने केंद्र सरकार के नए ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 के खिलाफ आवाज उठाई है। उनका कहना है कि यह बिल उनके अधिकारों को मजबूत करने के बजाय उन्हें पीछे धकेलने वाला है।
ट्रांसजेंडर कार्यकर्ताओं का कहना है कि बदलाव ऐसे हैं जैसे उन्हें फिर से पुराने दौर में ले जाया जा रहा हो। उन्होंने कहा कि समुदाय पहले ही काफी मुश्किलें झेल चुका है और अब दोबारा उसी हालात में जाना बेहद तकलीफ देने वाला है।
नए बदलावों को लेकर सबसे बड़ी चिंता यह जताई जा रही है कि ट्रांसजेंडर लोगों से अपनी पहचान खुद तय करने का अधिकार ही छीन लिया गया है। साथ ही “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” की परिभाषा भी बदल दी गई है। अब इसमें सिर्फ वही लोग शामिल माने जा रहे हैं जिनकी पहचान किन्नर, हिजड़ा, अरावनी या जोगता जैसी पारंपरिक सामाजिक श्रेणियों से जुड़ी हो या फिर वे लोग जिनमें शरीर के स्तर पर जन्म से ही कुछ अलग तरह के जैविक या हार्मोनल बदलाव हों। यानी आसान भाषा में कहें तो नई परिभाषा पहले से ज्यादा सीमित हो गई है और हर किसी की अपनी पहचान को उतनी आज़ादी नहीं देती।
बिल को लेकर ट्रांसजेंडर समुदाय में नाराज़गी
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन बिल 2026 को लेकर पूरे देश में ट्रांसजेंडर समुदाय में भारी नाराजगी और विरोध देखने को मिल रहा है। कई जगहों पर लोग सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं और इस बिल को वापस लेने की मांग कर रहे हैं जिसमें छत्तीसगढ़ भी शामिल है। उनका कहना है कि यह सीधे तौर पर उनके जीवन और अधिकारों से जुड़ा मुद्दा है। खासतौर पर पहचान पत्र के लिए मेडिकल जांच जैसी प्रक्रिया को लोग अपमानजनक और असहज बता रहे हैं। छत्तीसगढ़ की रवीना बरिहा जो सामाजिक और आधिकारिक मंत्रालय से जुड़ी हैं ने कहा कि “इस बिल में कई प्रावधान ऐसे हैं जो अमानवीय हैं और ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों को कमजोर करते हैं।” उनका कहना है कि पहले सुप्रीम कोर्ट ने हर व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान खुद तय करने का अधिकार दिया था लेकिन अब इस नए बिल में उस अधिकार को खत्म कर दिया गया है और पहचान को सिर्फ शारीरिक आधार पर सीमित किया जा रहा है जो सही नहीं है। समुदाय का यह भी मानना है कि यह बदलाव संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है क्योंकि इससे उनके सम्मान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर असर पड़ता है, इसलिए वे लगातार इसका विरोध कर रहे हैं।
जवाहरल लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में विरोध प्रदर्शन
16 मार्च 2026 की रात देश की प्रमुख यूनिवर्सिटी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में इस बिल के खिलाफ जोरदार विरोध प्रदर्शन हुआ। छात्रों ने पुतला जलाया और बिल वापस लेने के नारे लगाए। प्रदर्शन में शामिल एक शोध छात्र प्रत्यय (पीएचडी) ने कहा कि इस बिल की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें “खुद अपनी पहचान तय करने” का अधिकार खत्म कर दिया गया है। उन्होंने बताया कि 2019 के कानून में यह व्यवस्था थी कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति अपनी पहचान खुद तय कर सकता है जिससे न सिर्फ पारंपरिक समुदाय जैसे हिजड़ा और किन्नर बल्कि वे लोग भी अपनी पहचान बना सकते थे जो इन पारंपरिक ढांचे का हिस्सा नहीं हैं। लेकिन नए बिल में इस मूल सिद्धांत को ही हटा दिया गया है। उन्होंने आगे कहा कि साल 2014 में आए नालसा बनाम भारत संघ फैसला 2014 में ट्रांसजेंडर लोगों को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी गई थी लेकिन यह नया बिल उसी फैसले के खिलाफ जाता नजर आता है। इसलिए छात्र इस बिल का विरोध कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे।
लोकसभा में पास हुआ नया संशोधन बिल
दरअसल 12 मार्च को केंद्र सरकार ने लोकसभा में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन बिल, 2026 पेश किया। इस बिल को केंद्रीय मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार ने पेश किया। यह बिल 2019 के पुराने कानून में कई बदलाव करने की बात करता है खासकर ट्रांसजेंडर की परिभाषा, पहचान की प्रक्रिया और कुछ अपराधों को लेकर सख्त नियम जोड़ने पर जोर देता है। इस बिल में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब ट्रांसजेंडर व्यक्ति को अपनी पहचान खुद तय करने का अधिकार नहीं रहेगा और इसके लिए मेडिकल जांच की प्रक्रिया जरूरी कर दी गई है। साथ ही “ट्रांसजेंडर” की परिभाषा को सीमित कर दिया गया है जिसमें सिर्फ कुछ पारंपरिक पहचान या जैविक स्थितियों को ही शामिल किया गया है। इसके अलावा कुछ अपराधों के लिए सख्त सजा का प्रावधान भी जोड़ा गया है। सरकार का कहना है कि यह बिल कानून को स्पष्ट करने और सही लोगों तक उसका फायदा पहुंचाने के लिए लाया गया है।
परिभाषा में बदलाव
इस बिल में “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” की परिभाषा को बदल दिया गया है। अब इसमें मुख्य रूप से वही लोग शामिल माने जाएंगे जिनकी पहचान किन्नर, हिजड़ा, अरावनी, जोगता जैसी पारंपरिक सामाजिक श्रेणियों से जुड़ी है या फिर वे लोग जिनमें जन्म से ही शरीर या हार्मोन से जुड़ी अलग तरह की स्थिति होती है (इंटरसेक्स)।
इसके साथ ही बिल यह भी साफ करता है कि सिर्फ अपनी पहचान खुद महसूस करने वाले या अलग यौन रुझान रखने वाले लोग इस परिभाषा में नहीं आएंगे। यानी पहले की तुलना में अब यह दायरा थोड़ा सीमित कर दिया गया है।
पहचान पाने की प्रक्रिया अब आसान नहीं
इसमें पहले जहां कोई व्यक्ति अपनी पहचान खुद तय कर सकता था अब इस प्रक्रिया में मेडिकल जांच को जरूरी बनाया गया है। नए नियम के मुताबिक किसी को ट्रांसजेंडर पहचान का सर्टिफिकेट लेने के लिए जिला मजिस्ट्रेट (DM) के पास आवेदन करना होगा और इसके लिए एक मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट भी जरूरी होगी जिसमें चीफ मेडिकल ऑफिसर जैसे अधिकारी शामिल होंगे। उनके सुझाव के आधार पर ही DM सर्टिफिकेट जारी करेंगे। यानी अब पहचान का फैसला पूरी तरह व्यक्ति के हाथ में नहीं रहेगा।
सर्जरी और दस्तावेज बदलने के नियम
अगर कोई व्यक्ति जेंडर बदलने की सर्जरी कराता है तो अस्पताल को इसकी जानकारी प्रशासन को देनी होगी। इसके बाद व्यक्ति को मेडिकल सर्टिफिकेट लेकर जिला मजिस्ट्रेट के पास जाना होगा जहां से उसके जेंडर बदलने का आधिकारिक प्रमाण पत्र जारी किया जाएगा।
हालांकि एक राहत की बात यह है कि सर्टिफिकेट मिलने के बाद व्यक्ति अपने नाम और बाकी सरकारी दस्तावेजों में बदलाव कर सकता है।
कड़े कानून और सजा का प्रावधान
इस बिल में जबरन किसी को ट्रांसजेंडर बनाने अपहरण करने या शारीरिक नुकसान पहुंचाने जैसे मामलों में सख्त सजा का प्रावधान किया गया है। ऐसे अपराधों में 10 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा और लाखों रुपए का जुर्माना हो सकता है। खासतौर पर बच्चों के मामलों में सजा और ज्यादा कड़ी रखी गई है। इसके अलावा किसी को जबरदस्ती भीख मंगवाने या बंधुआ मजदूरी में धकेलने पर भी सख्त कार्रवाई की बात कही गई है। सरकार का कहना है कि ये बदलाव इसलिए किए जा रहे हैं ताकि सही लोगों तक कानून का फायदा पहुंचे और गंभीर अपराधों पर रोक लग सके।
ट्रांसजेंडर लोगों के लिए वैसे ही अपनी पहचान और अधिकारों की लड़ाई आसान नहीं रही है वे हर दिन समाज में खुद को साबित करने की कोशिश करते हैं। ऐसे में नए नियमों के साथ उनके सामने एक और चुनौती खड़ी होती दिख रही है जहां उन्हें अपनी पहचान के लिए फिर से साबित करना पड़ सकता है।
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