मार्च की बेमौसम बारिश ने बुंदेलखंड के किसानों की तैयार फसलें बर्बाद कर दीं- गेहूं, चना, सरसों और मसूर सब चौपट। लेकिन यह सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही की भी कहानी है। खेतों में पानी भरा है, फसल सड़ रही है, लेकिन अब तक न सर्वे शुरू हुआ, न राहत पहुंची। छोटे किसान सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, जिनकी साल भर की आमदनी कुछ घंटों में खत्म हो गई। सवाल यह है कि जब नियम 33% नुकसान पर मुआवजा तय करते हैं, तो कार्रवाई में देरी क्यों? और जनप्रतिनिधि इस संकट के समय ज़मीन से गायब क्यों हैं?
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