अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा कि वे घरेलू कामगारों के कल्याण के लिए कोई उपयुक्त व्यवस्था बनाएं। कोर्ट के मुताबिक कानून बनाना सरकार और संसद का काम है न कि न्यायपालिका का।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि देश में औद्योगिक विकास को रोकने के लिए ट्रेड यूनियनवाद काफी हद तक जिम्मेदार रहा है। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी 2026 को सरकार को यह निर्देश देने से मना कर दिया कि घरेलू कामगारों को श्रम कानूनों के तहत “अनुसूचित रोजगार” में शामिल किया जाए। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस ज्योमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि आर्थिक और श्रम नीति जैसे मामलों में अदालत को बहुत सावधानी बरतनी होती है। कोर्ट ने माना कि घरेलू कामगारों को असुरक्षा और शोषण झेलना पड़ता है लेकिन यह भी साफ किया कि इस मुद्दे पर कोई अनिवार्य आदेश नहीं दिया जा सकता। हालांकि अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा कि वे घरेलू कामगारों के कल्याण के लिए कोई उपयुक्त व्यवस्था बनाएं।
अगर सरलता से समझें तो सुप्रीम कोर्ट में घरेलू सहायकों के लिए न्यूनतम वेतन तय करने और उसके लिए एक मजबूत कानून बनाने की मांग को लेकर जनहित याचिका दाखिल की गई थी। इस याचिका में कहा गया था कि घरेलू काम करने वाले लोगों को भी कानूनी तौर पर तय मजदूरी मिलनी चाहिए।
29 जनवरी 2026 को इस मामले पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर आगे सुनवाई करने से मना कर दिया। अदालत ने कहा है कि वह केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को यह आदेश नहीं दे सकती कि वे मौजूदा कानूनों में बदलाव करें या नया कानून बनाने पर विचार करें। कोर्ट के मुताबिक कानून बनाना सरकार और संसद का काम है न कि न्यायपालिका का।
ट्रेड यूनियनों पर अदालत की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने ट्रेड यूनियनों की भूमिका पर कड़ी टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि “झंडा यूनियनों” की प्रतिगामी नीतियों के कारण देश में कई उद्योग बंद हुए और औद्योगिक विकास रुका। कोर्ट ने कहा कि आक्रामक विरोध और हड़तालों का असर अंत में मजदूरों पर ही पड़ता है क्योंकि कारखाने बंद हो जाते हैं और लोगों की नौकरियां चली जाती हैं। मुख्य न्यायाधीश ने सवाल किया कि ट्रेड यूनियनों के जरिये कितने उद्योग वास्तव में सफल हुए हैं। उन्होंने कहा कि श्रमिकों का शोषण एक गंभीर समस्या है लेकिन उससे निपटने के तरीके भी सही होने चाहिए।
न्यूनतम वेतन और भरोसे के रिश्ते पर चिंता
इंडिया टुडे के अनुसार याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने मांग की कि घरेलू कामगारों को न्यूनतम वेतन तय काम के घंटे और सामाजिक सुरक्षा दी जाए। इस पर कोर्ट ने कहा कि अगर घरों में काम करने वालों के लिए सख्त नियम और न्यूनतम वेतन लागू किया गया तो इसके उलटे नतीजे भी हो सकते हैं। अदालत ने आशंका जताई कि लोग घरेलू कामगार रखना ही बंद कर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि इससे घरेलू कामगारों और परिवारों के बीच भरोसे का रिश्ता टूट सकता है और एजेंसियों के जरिए नियुक्ति बढ़ेगी जिससे मानवीय संबंध खत्म हो जाएंगे। कोर्ट ने यह भी चेताया कि ऐसे नियमों से मुकदमों की बाढ़ आ सकती है।
राज्यों से पहल करने की अपील
रामचंद्रन ने बताया है कि करीब 15 राज्यों ने घरेलू कामगारों को न्यूनतम वेतन के दायरे में शामिल किया है लेकिन कई राज्यों ने अब तक ऐसा नहीं किया है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि अगर राज्य इसे जरूरी मानते हैं तो उन्होंने अब तक कानून क्यों नहीं बनाया। अंत में सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और कहा कि कानून बनाना अदालत का काम नहीं है। अदालत ने उम्मीद जताई कि राज्य सरकारें घरेलू कामगारों की स्थिति सुधारने के लिए ठोस कदम उठाएंगी और उनकी शिकायतों पर गंभीरता से विचार करेंगी।
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